यूपी: बांग्लादेशियों को अवैध रूप से भारत लाने के आरोपी भाजपा नेता को हाईकोर्ट से मिली ज़मानत

2023 में उत्तर प्रदेश एटीएस द्वारा दर्ज एक केस में भाजपा युवा मोर्चा के पदाधिकारी बिक्रम रॉय समेत कई अन्य पर बांग्लादेशी नागरिकों को अवैध तरीके से देश में लाकर उनके फ़र्ज़ी पहचान पत्र बनाने का आरोप लगाया गया था. अब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अन्य आरोपियों को पहले मिली बेल का हवाला देते हुए रॉय को ज़मानत दे दी है.

इलाहाबाद हाईकोर्ट. (फोटो साभार: विकीपीडिया/Vroomtrapit)

नई दिल्ली: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोमवार (3 नवंबर) को भाजपा युवा मोर्चा के एक पदाधिकारी- बिक्रम रॉय को जमानत दे दी. उन पर बांग्लादेशी नागरिकों का फर्जी पहचान पत्र तैयार करने और उन्हें अवैध रूप से सीमा पार कराने का आरोप है. यह केस 2023 में उत्तर प्रदेश एटीएस (एंटी-टेररिस्ट स्क्वाड) द्वारा दर्ज किया गया था.

अदालत ने रॉय  को समानता के आधार पर (पैरिटी) जमानत दी है, क्योंकि इस मामले के कई अन्य आरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी है.

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस राजेश सिंह चौहान और अभदेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) अधिनियम, 2008 की धारा 21(4) के तहत दायर रॉय की अपील को स्वीकार किया.

रॉय ने जुलाई 2024 और फरवरी 2025 में एनआईए विशेष न्यायाधीश, लखनऊ द्वारा जमानत याचिका खारिज किए जाने के आदेश को चुनौती दी थी.

कोर्ट ने कहा कि इसी केस के अन्य सह-आरोपियों (अबू सालेह मंडल, अब्दुल अवल, अब्दुल्ला गाजी और कफीलुद्दीन) को पहले ही हाईकोर्ट की समन्वित पीठ (कोऑर्डिनेट बेंच) द्वारा जमानत दी जा चुकी है. इसी तरह इस मामले से जुड़े आदिल-उर-रहमान को भी पिछले महीने जमानत मिल चुकी है.

एफआईआर के मुताबिक, सभी अभियुक्त रोहिंग्या नागरिकों को भारत में बसाने में मदद कर रहे थे और इसके बदले अवैध रूप से पैसे लेते थे, और उन पैसों का इस्तेमाल ‘भारत-विरोधी गतिविधियों’ में कर रहे थे. लेकिन जो चार्जशीट दाखिल की गईं, उनमें एनआईए अधिनियम के तहत कोई अपराध शामिल नहीं था, और अभियुक्त पहले ही करीब दो साल से जेल में बंद थे.

हाईकोर्ट ने पिछले आदेशों में यह भी टिप्पणी की थी कि विदेशी अधिनियम, 1946 की धारा 14C के तहत इस अपराध के लिए अधिकतम सजा पांच साल है और कोई ऐसा साक्ष्य नहीं है जिससे यह लगे कि जमानत मिलने पर आरोपी ट्रायल को प्रभावित करेगा.

रॉय और आदिल-उर-रहमान ही ऐसे दो आरोपी थे जिन पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 370 (मानव तस्करी) यानी एनआईए अनुसूचित अपराध के तहत आरोप लगाया गया था.

रॉय की ओर से अधिवक्ता ताहा चिश्ती ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश का हवाला दिया, जिसमें इसी केस के सह-आरोपी शेख नज़ीबुल हक़ को दो साल से हिरासत में रहने और ट्रायल लंबा चलने की संभावना के आधार पर जमानत दी गई थी.

रॉय की ओर से यह भी दलील दी गई कि वह एक रिक्शा चालक है, जिस पर केवल इतना आरोप है कि उसने कुछ लोगों को बांग्लादेश सीमा से पश्चिम बंगाल तक पहुंचाया, जबकि उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है.

सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने पाया कि रॉय को भी समान आधार पर जमानत दी जानी चाहिए और इस प्रकार उन्हें राहत दे दी गई.