बिहार चुनाव में नयी बहार, भोजपुरी गीत बने जातिगत राजनीति का औज़ार

बिहार चुनाव में जातिगत और स्त्री-विरोधी गीतों का भरपूर प्रयोग हो रहा है, जो समाज की विभाजन रेखा और तीखी कर रहा है. चूंकि जाति आधारित राजनीति के लिए ऐसे गाने मुफ़ीद है, इसलिए कोई दल या संगठन इसके खिलाफ नहीं बोलता.

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(इलस्ट्रेशन: द वायर हिंदी)

बिहार विधानसभा के चुनाव प्रचार में बजते जातियों पर आधारित गानों ने नये प्रश्न खड़े किये हैं. यह गाने नये नहीं हैं लेकिन जिस तरह बड़े नेताओं ने इन्हें वैधानिकता दी, उससे लगता है कि क्या राजनीति ने समाज को विभाजित करने का नया तरीका खोज लिया है?

दूसरे चरण के मतदान के पहले भभुआ में चुनावी सभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भोजपुरी के एक लोकप्रिय गाने का जिक्र किया- ‘मारम सिक्सर के छव गोली छाती में रे..’ (सीने में छह गोली मारने से संबंधित) इस गीत को टुनटुन यादव और शिल्पी राज ने गाया है. यूट्यूब पर अबतक इसे तीन करोड़ से ज्यादा लोगों ने देख लिया है. यह गाना यादव समाज के वर्चस्व का गुणगान करता है और जिस तरह प्रधानमंत्री ने इसे उठाया, साफ़ है कि वे इस बिरादरी के अपने विरोधी नेताओं पर, यानी लालू यादव और तेजस्वी यादव पर निशाना साध रहे थे.

भोजपुरी के लोकप्रिय गीतों में जातीय श्रेष्ठताबोध, भेदभाव, हिंसा, वर्चस्व और स्त्री विरोध का स्वर अक्सर सुनाई दिया है. विगत कुछ वर्षों से ये गाने जातीय हिंसा की जमीन तैयार कर रहे हैं. शादी-ब्याह या धार्मिक उत्सव में भी जातीय वर्चस्व वाला गीत पूरे जोर-शोर से बजाए और सुनाए जाते हैं. यह गाने बहुकोणीय टकराव के लिए उर्वर वातावरण बनाते रहे हैं.

और अब इनका उपयोग चुनावी मैदान में हो रहा है. लेकिन यह गौर करना होगा कि

भोजपुरी गानों में जातीय श्रेष्ठता के बोध कराने वाले लोगों में कोई भी जाति पीछे नहीं है. सवर्ण, पिछड़े वर्ग, अति पिछड़े वर्ग और दलित जातियों से ताल्लुक रखने वाले गायक/गायिकाओं में भी अहंकार और हिंसा का स्वर साफ सुनाई देता है. इस जातीय श्रेष्ठता और वर्चस्व के केंद्र में अक्सर स्त्री होती है.

रितेश पांडेय और इंदु सोनाली के संयुक्त स्वर में ‘पांडेय जी का बेटा हूं, चुम्मा चिपक के लेता हूं…’ शीर्षक से एक गीत खूब लोकप्रिय हुआ. गीत दावा करता है कि पांडेय जी का बेटा सरेआम चूम लेता है. उसके बाद उसी तर्ज पर लगभग अन्य जातियों के गायकों ने गीत बनाए और गाये.

रितेश पांडेय परिवर्तन के बड़े दावे करने वाली जनसुराज पार्टी के टिकट पर रोहतास के करहगर विधानसभा सीट से चुनावी मैदान में हैं. उनका अगला गाना देखें:

‘हल्का में मत ले बाभन के, बर्बाद कर देम… जवना हाथ ले कराई ब्याह, ओहि हाथे श्राद्ध कर देम.’ रितेश इस गीत के माध्यम से अन्य जातियों को बता रहे है कि ब्राह्मण को हल्के में न लें. जैसे हम ब्याह जैसे शुभ कार्य कराने की दक्षता रखते हैं, अंतिम संस्कार भी कर देंगे.

रितेश पांडे इस तरह के इकलौते उम्मीदवार नहीं हैं. भोजपुरी के सुपर स्टार गायक-अभिनेता खेसारी लाल यादव छपरा विधानसभा सीट से राजद के उम्मीदवार हैं. खेसारी लाल यादव का गाना है, ‘कइले कबूल फूल हो जइबे कली/इहा अहिरे के चलल बा अहिरे के चली…’. इस गीत में गायक नायिका को बता रहा है कि यहां अहीर यानी यादव जाति ही वर्षों से वर्चस्वशाली है, उसका ही दबदबा चलेगा. छपरा में खेसारीलाल यादव के सामने बीजेपी की ओर से छोटी कुमारी मैदान में हैं. पहले चरण में यहां मतदान हो चुका है.

भोजपुरी के चर्चित गायक पवन सिंह का गाना ‘प्रखंड हो या जिला, बाबुआने से हिला’ विभिन्न उत्सव में बजाया जाता है. बिहार में राजपूत जाति को बाबू साहब या बबुआन कहने का चलन है. गायक बता रहा है कि जिला और प्रखंड की प्रशासनिक व्यवस्था बाबू साहब से डरती है.

पवन सिंह को बीते लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने आसनसोल से टिकट दिया था, जिसे लौटा कर वे काराकाट लोकसभा से निर्दलीय लड़े और दूसरे स्थान पर रहे.

हाल में केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने आरा के वीर कुंअर सिंह स्टेडियम में रैली की. वहां कुछ गायक मौजूद थे, जिनमें ‘हई पासवान रंगदार खानदानी’ गाने वाले पासवान स्टार नामक रमेश रेशमिया मौजूद थे. वे लोकजनशक्ति पार्टी (रामविलास) के भोजपुर जिला के सांस्कृतिक प्रकोष्ठ के जिलाध्यक्ष हैं.

उनसे पूछा गया-‘आप अपने गीत से अपनी जाति की छवि को बिगाड़ नहीं रहे हैं,’ उन्होंने कहा: ‘मैं अपने गीत से सिर्फ अपनी जाति को मुख्यधारा से जोड़ रहा हूं. मैं अपने गीतों में किसी अन्य जाति की शिकायत नहीं करता हूं, बल्कि अपनी जाति को प्रमोट करता हूं.’

मर्दवादी वर्चस्व के गीत

बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंस से भोजपुरी सिनेमा पर शोध कर रही और दीघा विधानसभा से भाकपा माले की उम्मीदवार दिव्या गौतम कहती हैं, ‘जाति और महिला दोनों ही एक दूसरे से जुड़े हुए हैं. किसी जाति की महिला पर यौन हमला उस जाति की इज्जत पर हमला समझा जाता है.’

वे आगे कहती हैं, ‘भोजपुरी एल्बमों में इसी मर्दवादी जातिवादी वर्चस्व को दिखाया जाता है. महिलाओं को कमोडिटी की तरह देखा जाता है. गाने के बोल से लेकर कैमरा मूवमेंट तक मेल गेज ही दर्शाता है. ये एल्बम पुरुषों द्वारा पुरुषों के लिए बनाए जाते हैं.’

क्या राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों के पास जातीय वर्चस्व और स्त्री-विरोधी गीतों के खिलाफ कोई एजेंडा है? पटना स्थित वरिष्ठ रंगकर्मी अनीश अंकुर कहते हैं, ‘जाति आधारित राजनीतिक गोलबंदी जातीय गौरव को उभारने का काम करती है, जिसे पुख्ता बनाने के लिए सांस्कृतिक प्रक्रिया का सहारा लिया जाता है.’

वे आगे कहते हैं कि जाति आधारित राजनीति के लिए यह गाने मुफ़ीद है, इसलिए ऐसा नहीं लगता कि कोई दल या संगठन इसके खिलाफ मोर्चाबंदी करेगा.

इस तरह बिहार की राजनीति को दूषित करने के लिये एक और मोर्चा तैयार हो गया है.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)