दिल्ली की ज़हरीली हवा: सुरक्षित सीमा से तीन गुना नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, एक्यूआई डेटा ग़ायब

नवंबर की शुरुआत से दिल्ली में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO₂) का स्तर रिकॉर्ड ऊंचाइयों पर है- सीपीसीबी की सीमा से तीन गुना और डब्ल्यूएचओ मानक से दस गुना ज़्यादा. वाहनों से निकलने वाला धुआं इसका मुख्य कारण है. दूसरी तरफ, दिल्ली के 39 प्रदूषण मॉनिटर्स में से किसी ने भी अक्टूबर माह में लगातार डेटा नहीं दिया है.

दिल्ली के एनओ2 प्रदूषण का 81% कारण वाहनों से निकलने वाले उत्सर्जन हैं. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: दिल्ली की हवा में घुली एक और जहर का आंकड़ा अब सामने हैं. नवंबर की शुरुआत से शहर भर में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (एनओ2) का स्तर अभूतपूर्व ऊंचाइयों पर पहुंच गया है. यह केवल सांख्यिकीय आंकड़ा नहीं है; यह दिल्लीवासियों के फेफड़ों के लिए खतरे की घंटी है.​

हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक, इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट (टी3) पर एनओ2 की साढ़े तीन घंटे की रीडिंग चौंकाने वाली थी- 240 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर (µg/m³). यह केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की सुरक्षित सीमा 80 µg/m³ का तीन गुना है और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की अंतरराष्ट्रीय सीमा 25 µg/m³ का लगभग दस गुना है. पर एयरपोर्ट अकेली आपदा नहीं है.

आईटीओ (दिल्ली के सबसे व्यस्त चौराहों में से एक) में 221 µg/m³, दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस में 210 µg/m³, लोधी रोड पर 181 µg/m³, और मुंडका में 178 µg/m³ दर्ज किए गए. ​

वाहनों का ‘राज’: 81 फीसदी प्रदूषण

विशेषज्ञों के अनुसार, दिल्ली के एनओ2 प्रदूषण का 81% कारण वाहनों से निकलने वाले उत्सर्जन हैं. हर दिन सड़कों पर दौड़ने वाले लाखों गाड़ियां – कारें, बाइकें, ऑटो रिक्शा, बसें, ट्रकों की भीड़ – सीधे हवा में जहर घोलती है.

आईआईटी दिल्ली के प्रोफेसर मुकेश खरे का विश्लेषण स्पष्ट है, ‘एनओ2 मुख्यतः पेट्रोल जलने से निकलता है, और यह भारी ट्रैफिक का संकेत है. एयरपोर्ट के पास भी इसका स्तर अधिक है क्योंकि वहां विमान टेक-ऑफ और लैंडिंग के समय भारी मात्रा में एनओ2 छोड़ते हैं.’​

गर्मियों में, सूरज की किरणें और तेज हवाएं इस गैस को तितर-बितर कर देती हैं. लेकिन सर्दियों में? तब परिस्थितियां बिल्कुल उल्टी हो जाती हैं. कमजोर हवाएं, कम सूरज, ठंडी हवा – ये सभी प्रदूषकों को हवा में ‘जकड़कर’ रख देते हैं.

‘एनवायरोकैटलिस्ट’ के संस्थापक और लीड एनालिस्ट सुनील दहिया बताते हैं, ‘जब चौराहों पर या उद्योगों के पास हवा नहीं चलती और तापमान कम रहता है, तो एनओ2 के पीक लेवल और भी ऊंचे हो सकते हैं.’

सांस लेना हुआ खतरनाक!

एनओ2 की अधिक मात्रा सीधे श्वसन तंत्र को नुकसान पहुंचाती है. अस्थमा, श्वसन संक्रमण, खांसी, सीने में दर्द, और सांस लेने में तकलीफ- ये सब संकेत हैं कि शहर की जहरीली हवा ने अपना असली रूप दिखाना शुरू कर दिया है. शॉर्ट-टर्म एक्सपोजर से भी लोगों को सांस की समस्या आती है. लेकिन दीर्घकालीन संपर्क? वह तो फेफड़ों को स्थायी नुकसान पहुंचाता है.

नवंबर की शुरुआत से, इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर 132 घंटे तक एनओ2 सुरक्षित सीमा से ऊपर रहा. नॉर्थ कैंपस पर 128 घंटे, नज़फगढ़ पर 118 घंटे, मुंडका पर 93 घंटे, और लोधी रोड पर 81 घंटे का यही हाल रहा. इसका मतलब है कि जो लोग इन इलाकों में रहते हैं, काम करते हैं, या गुजरते हैं, उन्होंने सीधे तौर पर विषाक्त वायु को अपने अंदर खींचा.

स्मॉग के प्रकोप से गाजियाबाद भी अछूता नहीं है. शनिवार की सुबह शहर की एक सड़क. (फोटो: पीटीआई)

‘डेटा का ब्लैकआउट’: क्या हम असल प्रदूषण जानते भी हैं?

यहां एक और गहरी समस्या है. दीपावली की रात 12 बजे के बाद दिल्ली में लगे 39 प्रदूषण मॉनिटर में से 28 बंद हो गए. यह पहली दीपावली थी जब चार साल बाद ‘ग्रीन पटाखों’ के साथ जश्न मनाया गया. इससे पहले 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने सभी पटाखों पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया था.

द प्रिंट के द्वारा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के विश्लेषण में यह सामने आया कि यह डेटा सिर्फ दीपावली की रात ही गायब नहीं था, बल्कि पूरे अक्टूबर महीने के वायु गुणवत्ता के आंकड़ों को ध्यान से देखा जाए, तो पता चलता है कि दिल्ली के किसी भी स्टेशन ने इस महीने में लगातार पीएम2.5 के स्तर की निगरानी नहीं की.

चांदनी चौक में 224 घंटे, पंजाबी बाग में 123 घंटे और नजफगढ़ में 100 घंटे. ये वो घंटे हैं जब अक्टूबर महीने में हवा में मौजूद जहरीले प्रदूषक पीएम2.5 का डेटा वायु गुणवत्ता मॉनिटरिंग स्टेशनों पर दर्ज नहीं हुआ.

आनंद विहार और वज़ीरपुर के मॉनिटरिंग स्टेशनों का डेटा सबसे बेहतर रहा- अक्टूबर के कुल 744 घंटों में से सिर्फ 4 से 7 घंटे का पीएम2.5 डेटा नहीं मिला. वहीं ओखला और द्वारका के स्टेशनों पर यह डेटा 40 से 46 घंटे तक उपलब्ध नहीं था.

इसका मतलब है कि इस ‘डेटा ब्लैकआउट’ की वजह से दिल्ली की आधिकारिक प्रदूषण रीडिंग हमेशा से ही असली प्रदूषण से कम दिखती है.

सेंसर की विफलता या सुविधाजनक ‘ब्लैकआउट’?

विशेषज्ञ तीन संभावनाएं बताते हैं. पहली: सेंसर खराब हो गए हैं और ठीक से काम नहीं कर रहे. दूसरी: डेटा को सर्वर तक पहुंचाने में तकनीकी समस्या है. तीसरी— और यह सबसे चिंताजनक है – जब प्रदूषण एक निश्चित स्तर को पार कर जाता है, तो सेंसर खुद को ‘बंद’ कर लेते हैं.

लेकिन यह अपने आप हो रहा है या जानबूझकर किया जा रहा है, यह अज्ञात है.’

‘डेटा ब्लैकआउट’ सवालों पर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड मौन है. सीपीसीबी की वेबसाइट पर सिर्फ एक सामान्य नोट है कि ‘तकनीकी समस्याएं,’ ‘बिजली की कटौती,’ और ‘रखरखाव की समस्याएं’ डेटा प्रवाह को प्रभावित कर सकती हैं.

थिंक टैंक और विशेषज्ञ साफ कहते हैं कि दिल्ली की आधिकारिक प्रदूषण रीडिंग असल स्थिति से बेहतर दिख रही है. जब डेटा गायब है, तो एक्यूआई गणना में उन प्रदूषित घंटों को नहीं गिना जाता. इसका परिणाम? शहर को अधिक ‘साफ’ दिखाया जाता है, जबकि वास्तव में लोग जहर भरी हवा में सांस ले रहे होते हैं.

इस ‘डेटा ब्लैकआउट’ का एक और खतरनाक पहलू है?

जीआरएपी (Graded Response Action Plan) का सक्रिय होना एक्यूआई पर निर्भर करता है. अगर दिल्ली की आधिकारिक एक्यूआई कम दिख रही है (क्योंकि डेटा गायब है), तो सरकार सख्त कदम नहीं उठाएगी. मास्क, स्कूल बंद, कारखानों पर रोक – ये सभी देरी से लागू होंगे. और तब तक, दिल्लीवासियों के फेफड़े ‘पूरी कीमत’ दे चुके होंगे.