नई दिल्ली: अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के बीच शांति वार्ता शुक्रवार (7 नवंबर) को गतिरोध के साथ समाप्त हो गई.
रिपोर्ट के अनुसार, अफ़ग़ानिस्तान की तालिबान सरकार ने इस बातचीत के असफल होने के लिए इस्लामाबाद के ‘गैर-ज़िम्मेदाराना और असहयोगी’ रवैये को ज़िम्मेदार ठहराया.
मालूम हो कि दोनों पड़ोसी देशों के प्रतिनिधियों ने गुरुवार को तुर्की में एक संघर्षविराम समझौते को सुनिश्चित करने के लिए मुलाकात की थी, जिस पर वे 19 अक्टूबर को सीमा पर हुई झड़पों में दोनों पक्षों के हताहत होने के बाद सहमत हुए थे.
तालिबान प्रवक्ता ज़बीहुल्लाह मुजाहिद ने इस बातचीत के बेनतीज़ा रहने के लिए पाकिस्तान को दोषी ठहराया है
मुजाहिद ने कहा, ‘बातचीत के दौरान पाकिस्तानी पक्ष ने अपनी सुरक्षा की सारी ज़िम्मेदारी अफ़ग़ान सरकार पर डालने की कोशिश की, जबकि उसने अफ़ग़ानिस्तान या अपनी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी लेने की कोई इच्छा नहीं दिखाई.’
हालांकि, वार्ता विफल होने के बावजूद प्रवक्ता ने कहा कि सीमा पर सीज़फायर की स्थिति कायम रहेगी.’
मुजाहिद ने कहा कि संघर्षविराम में ‘कोई समस्या नहीं है’, और उन्होंने कतर और तुर्की को उनकी मध्यस्थता के लिए धन्यवाद दिया.
पाकिस्तान ने वार्ता के बारे में क्या कहा है?
पाकिस्तान के स्वतंत्र जियो न्यूज़ चैनल को दिए एक साक्षात्कार में पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा कि ‘जैसा कि हम कह रहे हैं, वार्ता समाप्त हो चुकी है.’
हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि जब तक अफ़ग़ान पक्ष इसका उल्लंघन नहीं करता, तब तक संघर्षविराम जारी रहेगा.
दोनों देशों ने तुर्की में चल रही वार्ता का विवरण साझा नहीं किया है.
इससे पहले गुरुवार को पाकिस्तान के सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार ने संकेत दिया था कि दोनों देशों के बीच शांति वार्ता विफल हो रही है.
उन्होंने कहा था कि अफ़ग़ानिस्तान आतंकवाद पर लगाम लगाने के अपने वादों को पूरा करने में ‘अब तक विफल’ रहा है.
अताउल्लाह तरार के अनुसार, ‘पाकिस्तान अपने लोगों और अपनी संप्रभुता की सुरक्षा के लिए सभी आवश्यक विकल्पों का प्रयोग जारी रखेगा.’
पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान तनाव के पीछे क्या है?
दरअसल, पिछले महीने पाकिस्तानी सेना और अफ़ग़ान तालिबान बलों के बीच भीषण संघर्ष देखने को मिला था, जो 2021 में काबुल में तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद से दोनों पड़ोसियों के बीच सबसे घातक संघर्ष था.
कभी सहयोगी रहे इन देशों के बीच तनाव तब बढ़ गया, जब इस्लामाबाद ने काबुल से तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की, जो अफगान तालिबान से घनिष्ठ रूप से जुड़ा एक अलग समूह है.
उल्लेखनीय है कि टीटीपी इस्लाम की एक कठोर व्याख्या लागू करना चाहता है, खासकर पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में, जो अफगानिस्तान की सीमा से लगा है.
पाकिस्तान सरकार के अनुसार, यह समूह अफगान धरती से बेखौफ होकर अपनी गतिविधियां चलाता है, जबकि अफगान तालिबान इस आरोप से इनकार करता है.
ज्ञात हो कि हाल के वर्षों में टीटीपी आतंकवादियों ने पाकिस्तानी सुरक्षा बलों पर हमले तेज़ कर दिए हैं.
इस साल संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में पाया गया है कि टीटीपी को ‘वास्तविक अधिकारियों से पर्याप्त सैन्य और संचालनात्मक सहायता मिलती है,’ यह रिपोर्ट काबुल में तालिबान सरकार का ज़िक्र करती है.
इन दो पड़ोसी देशों के बीच घनिष्ठ ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और लोगों के बीच आपसी संबंध भी हैं.
गौरतलब है कि पिछले 40 वर्षों में युद्धग्रस्त देश से भागे लाखों अफ़गानों ने पाकिस्तान में शरण ली है. लेकिन झड़पों के बाद पाकिस्तान ने देश में अफ़गान प्रवासियों पर कार्रवाई तेज़ कर दी है.
