सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में केरल के छात्रों पर कथित हमले की निंदा की, कहा, नस्लीय भेदभाव अस्वीकार्य

बीते 24 सितंबर को लाल क़िले के पास कथित तौर पर कुछ लोगों ने केरल के छात्रों पर चोरी का आरोप लगाकर हमला किया था, उन्हें हिंदी में बोलने के लिए मजबूर किया गया और लुंगी (मुंडू, राज्य का एक पारंपरिक परिधान) पहनने के लिए उनका मज़ाक उड़ाया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बहुलवाद और एकता पर आधारित देश में नस्लीय भेदभाव के ऐसे कृत्य पूरी तरह से अस्वीकार्य हैं.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (11 नवंबर) को हाल ही में हुई उस घटना पर कड़ी आपत्ति जताई जिसमें राष्ट्रीय राजधानी में केरल के दो छात्रों पर कथित तौर पर हमला किया गया, उन्हें हिंदी में बोलने के लिए मजबूर किया गया और लुंगी (मुंडू, राज्य का एक पारंपरिक परिधान) पहनने के लिए उनका मज़ाक उड़ाया गया.

24 सितंबर को लाल किले के पास कथित तौर पर कुछ उपद्रवियों ने छात्रों पर चोरी का आरोप लगाकर हमला किया था, और कुछ पुलिसकर्मियों पर भी हमले में शामिल होने का आरोप है.

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि उन्होंने ख़बरों के माध्यम से इस घटना का संज्ञान लिया है और इस बात पर ज़ोर दिया कि बहुलवाद और एकता पर आधारित देश में नस्लीय भेदभाव के ऐसे कृत्य पूरी तरह से ‘अस्वीकार्य’ हैं.

जस्टिस कुमार ने कहा, ‘हमने हाल ही में अखबार में पढ़ा कि केरल के एक व्यक्ति का दिल्ली में लुंगी पहनने पर मज़ाक उड़ाया गया. यह उस देश में अस्वीकार्य है जहां लोग सद्भाव से रहते हैं… हम एक देश हैं.’

नस्लीय पूर्वाग्रह

अदालत 2014 में दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों को नस्लीय भेदभाव से बचाने के लिए दिशानिर्देश बनाने के निर्देश देने की मांग की गई थी. याचिका में ऐसी कई घटनाओं का हवाला दिया गया था, जिनमें अरुणाचल प्रदेश के छात्र नीडो तानिया की हत्या भी शामिल है, जिनकी 29 जनवरी, 2014 को दक्षिण दिल्ली में दुकानदारों ने पीट-पीटकर हत्या कर दी थी.

इससे पहले शीर्ष अदालत ने केंद्र को नस्लीय हिंसा और नफरती अपराधों की ऐसी घटनाओं की निगरानी और निवारक उपायों की सिफारिश करने के लिए एक समिति गठित करने का निर्देश दिया था. इसने इस बात पर भी ज़ोर दिया था कि ऐसी घटनाओं की सार्थक रोकथाम केवल विश्वविद्यालयों, कार्यस्थलों और समग्र समाज में व्यापक दृष्टिकोण परिवर्तन को बढ़ावा देने के प्रयासों से ही संभव है.

मंगलवार की सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर-जनरल के.एम. नटराज ने अदालत को सूचित किया कि पहले के निर्देशों के अनुपालन में एक निगरानी समिति का गठन पहले ही किया जा चुका है. हालांकि, याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए अधिवक्ता गाइचांगपो गंगमेई ने तर्क दिया कि नस्लीय भेदभाव और पूर्वोत्तर के लोगों के बहिष्कार की घटनाएं अभी भी जारी हैं.

केरल के छात्रों पर हाल ही में हुए हमले का ज़िक्र करते हुए जस्टिस कुमार ने टिप्पणी की कि ऐसी घटनाएं नस्लीय पूर्वाग्रह के निरंतर प्रचलन को दर्शाती हैं और नटराज से कहा कि सरकार को इस बारे में ज़्यादा चिंतित होना चाहिए.

गंगमेई ने पीठ को यह भी बताया कि निगरानी समिति, जिसकी तिमाही बैठक अनिवार्य है, नौ वर्षों में केवल 14 बार ही बैठक कर पाई है. इस दलील पर ध्यान देते हुए अदालत ने कार्यवाही स्थगित कर दी और याचिकाकर्ता को केंद्र की ताजा स्थिति रिपोर्ट पर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया.

इससे पहले, राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास ने दिल्ली पुलिस आयुक्त सतीश गोलचा को पत्र लिखकर दोनों छात्रों पर हुए ‘अमानवीय हमले, हिरासत में मारपीट और सांस्कृतिक अपमान’ की जांच की मांग की थी. उन्होंने आयुक्त से उच्च-स्तरीय जांच शुरू करने, ज़िम्मेदार लोगों की पहचान करने और छात्रों का सामान वापस लेने का आग्रह किया था.

पत्र में आरोप लगाया गया था, ‘सुरक्षा प्रदान करने के बजाय पुलिसकर्मियों ने भीड़ के साथ सांठगांठ कर ली… छात्रों को घसीटा गया, फाइबर की लाठियों से पीटा गया, कुचला गया, नंगा किया गया और बेहद अपमानजनक तरीके से अपमानित किया गया.’

हालांकि, दिल्ली पुलिस ने घटना का एक अलग विवरण प्रस्तुत किया था.

डीसीपी (उत्तर) राजा बंठिया ने द हिंदू को बताया था कि कुछ फेरीवाले भुगतान विवाद को सुलझाने के लिए दोनों छात्रों को पुलिस चौकी ले आए थे.

डीसीपी ने कहा था, ‘कुछ फेरीवाले कथित तौर पर बाज़ार में उनकी पिटाई करने के बाद उन्हें चौकी ले आए. फेरीवालों ने शिकायत की कि इन दोनों व्यक्तियों ने पहले कपड़े खरीदे थे, 4,000 नकद रुपये दिए थे, और उन्हें 10,000 रुपये का ऑनलाइन भुगतान दिखाया था, जो वास्तव में किया ही नहीं गया था. जब वे 24 सितंबर को फिर से बाज़ार गए, तो फेरीवालों ने उन्हें पहचान लिया, झगड़ा किया और उनके साथ मारपीट की.’