मैंने रामचंद्र गुहा की कई पुस्तकें पढ़ी हैं और उनकी प्रतिभा की चमक से चमत्कृत हुआ हूं. उनका धैर्य, उनकी खोजी प्रवृत्ति, छोटी-छोटी जानकारियों से करिश्मा पैदा करना, मुझे हमेशा चकित करता रहा है. वे इन तथ्यों से कई अनसुलझे, अनजाने रहस्यों को खोलते हैं. मसलन, वे ‘द कॉर्नर ऑफ़ अ फॉरेन फील्ड’ में कई ऐसे रहस्यों को खोलते हैं कि क्रिकेट का मैदान तक मुस्कुरा उठता है.
महात्मा गांधी के सचिव प्यारेलाल के पास रखे ख़जाने के लिए कई वर्ष धीरता से प्रतीक्षा करना और प्राप्त होने पर उन्हें क्रमबद्ध करने में वर्षों लगाना कोई मामूली काम नहीं है. एक धीरोचित नायक ही यह कर सकता है.
गांधी पर लिखी उनकी पुस्तकें उनकी निष्पक्ष दृष्टि और बेबाक वर्णन का प्रमाण है. वे इतिहास को छेड़े बग़ैर उसके अनछुए अनजान तथ्यों को जोड़कर एक प्रांजल सत्य को पाठकों के सामने रख देते हैं. सबसे खूबसूरत बात यह कि वे अपनी तरफ से कोई दावा प्रस्तुत नहीं करते. न ही किसी प्रकार का दिशा निर्देश देते है. तथ्य-परक और प्रभावी लेखन की ईमानदार कोशिश गुहा की किताबें हैं.
लेकिन उनके द्वारा लिखी नृत्तवशास्त्री वेरियर एल्विन की जीवनी ‘सेवेजिंग द सिविलाइज्ड’ के कुछ अंश पढ़कर मुझे धक्का लगा – वे अंश जहां वे महान चित्रकार जे स्वामीनाथन को एल्विन से प्रेरित हुआ बताते हैं. यही नहीं, वे आगे यह भी लिखते हैं कि स्वामीनाथन ने आदिवासी कला को संजोने के लिए जो अनूठा उपक्रम किया था, वह भी कहीं न कहीं एल्विन से प्रेरित था.
पुस्तक का अंग्रेज़ी शीर्षक रोचक और ईमानदार है. आदिवासियों के सभ्य समाज को तथाकथित ‘सभ्यता’ के नाम पर सभी तरह की मिशनरियों ने, जो किसी भी धर्म या विचारधारा के नाम पर हों, पूरी ताकत, कुटिलता, चालाकी से ‘जंगली’ बनाने का काम किया है, और आज भी कर रही हैं. लेकिन इस किताब का हिंदी अनुवाद ‘सभ्यता के कोने’ मुझे अपूर्ण लगा. यह किताब की आत्मा को नहीं थामता.
स्वामीनाथन की थॉमस हार्डी से तुलना ठीक नहीं
अनुवाद पर बाद में आते हैं, सबसे पहले मैं इस किताब के प्रति अपनी आपत्तियां दर्ज करता हूं.
पहला, गुहा प्रस्तावित करते हैं कि स्वामीनाथन ‘थामस हार्डी के कार्यों में डूबे हुए’ थे. विलक्षण चित्रकार स्वामीनाथन की अंग्रेज लेखक थॉमस हार्डी से तुलना ठीक नहीं है. स्वामीनाथन और हार्डी में एक बड़ा फर्क है कि स्वामीनाथन रेखीय विकास की अवधारणा को नहीं मानते थे, जबकि थॉमस हार्डी इस पर भरोसा करते थे. स्वामी और थॉमस हार्डी में शायद सिर्फ एक संबंध है कि जिस वर्ष जनवरी में हार्डी की मृत्यु हुई उसी वर्ष जून में स्वामी का जन्म हुआ.
हार्डी का काम इंग्लैण्ड के देहातों से संबंधित था, स्वामीनाथन ने मध्यप्रदेश के बीहड़ जंगलों और गांवों में काम किया था. किंतु दोनों की तुलना नहीं हो सकती. उन्नीसवीं सदी के इंग्लैण्ड का देहात आज भी मध्यप्रदेश के जंगलों में बसे गांव के मुकाबले बेहद सम्पन्न और सुविधाजनक होगा.
एल्विन को पढ़ने से पहले स्वामी आदिवासी जीवन की ओर मुड़ गए थे
दूसरा, गुहा लिखते हैं कि स्वामी को एल्विन की पुस्तक ‘द ट्राइबल आर्ट ऑफ मिडल इण्डिया’ ने प्रेरित किया था. सच यह है कि एल्विन से गुजरने से पहले स्वामी आदिवासी जीवन और कला से परिचित हो चुके थे.
स्वामीनाथन बेहद पढ़े-लिखे इन्सान थे. उन्होंने शिमला में बीते अपने बचपन में ही समग्र डार्विन और शेक्सपीयर पढ़ डाला था. पिता संस्कृत के विद्वान थे. वे उन्हें बचपन में ही कालिदास और अन्य संस्कृत के कवियों की रचनाएं सुनाया करते थे. स्वामी जब हनीमून के लिए बैतूल के जंगलों में गए, उनका सामना कोरकू जनजाति से हुआ. उन्होंने देखा कि सांप द्वारा काटे हुये बच्चे को एक ओझा अपनी मंत्र शक्ति से बचा लेता है. फिर एक मटके में क़ैद उस सांप को आज़ाद कर देता है और वह साँप जंगल में वापस चला जाता है.

इस घटना ने उनके सोचने-समझने की दिशा बदल दी. उन्हें अहसास हुआ कि शहर के एक समानान्तर संसार भी है जो उतना ही सभ्य, सक्षम और सन्तुष्ट है, जिसे हम असभ्य और अंधविश्वासी मानते हैं. सिर्फ़ इस कारण कि वह हमारे पढ़े-लिखे अंधविश्वासों को नहीं मानता, हम उसे जंगली कहते हैं.
गुहा स्वामी पर पड़े इस प्रभाव को अनदेखा कर गए. एल्विन को पढ़ने से पहले स्वामी आदिवासी जीवन की ओर मुड़ गए थे.
गुहा एक और चूक करते हैं. इस बार वे परधान गौण्ड कलाकार जनगढ़ सिंह श्याम की कला की गलत व्याख्या करते हैं. जनगढ़ की प्रतिभा को किस तरह स्वामी ने पहचाना और इस युवक को पाटनगढ़ गांव से भोपाल लाये, यह सर्वविदित है.
लेकिन गुहा कुछ तथ्यात्मक चूक करते हैं. वे लिखते हैं कि स्वामीनाथन ने विद्यार्थियों को ‘जंगलों और ऊंचे स्थान पर भेज दिया’ और खुद पाटनगढ़ की ओर रवाना हुये. ‘यहां उन्होंने एक घर को उड़ते पक्षियों और आदिवासी देवियों के सबसे विविध चित्रों से सजा हुआ पाया. ये जनगढ़ के काम थे,’ गुहा लिखते हैं.
यह ग़लत सूचना है. दरअसल हुआ यह था कि स्वामीनाथन भारत भवन के रूपंकर संग्रहालय के लिए आदिवासी लोक कलाकृतियां जुटा रहे थे. इस सिलसिले में उन्होंने एक अनूठा प्रयोग किया था. उन्होंने युवा कला विद्यार्थियों के छः दल बनाए, और एक वरिष्ठ कलाकार के नेतृत्व में मध्यप्रदेश के विभिन्न जिलों में उन्हें भेजा.
एक ग्रुप का नेतृत्व विवेक टेम्बे कर रहे थे. यह दल मण्डला पहुंचा. इस दल को पाटनगढ़ गांव में जनगढ़ द्वारा बनाए गए मिट्टी के शिल्प मिले थे. जनगढ़ के घर की दीवारों पर उड़ते हुये पक्षियों के चित्र नहीं थे.
इस दल ने जनगढ़ को रंग और कागज़ दिए, उन पर जनगढ़ ने उनके लिए हनुमान का एक चित्र उकेरा था. यह चित्र अभी भी विवेक के पास है. फिर उन्होंने जनगढ़ के कुछ मूर्तिशिल्प रूपंकर संग्रह के लिए खरीदे थे.

स्वामीनाथन ने इन दलों द्वारा लायी गयी तमाम कलाकृतियों में से जनगढ़ की मूर्तियों में छिपी उसकी प्रतिभा को पहचाना और फरवरी 1982 में भारत भवन के शुभारम्भ के बाद मार्च-अप्रैल माह में जनगढ़ से मिलने पाटनगढ़ एक जीप से गए, जिसमें उनके साथ युवा कलाकार अनिल कुमार भी था.
जीप के ड्राइवर मतीन के अनुसार जब वे पाटनगढ़ पहुंचे, और नीचे सड़क पर उन्होंने किसी से जनगढ़ के बारे में पूछताछ की, तो वह थोड़ी देर बाद एक लड़के को लेकर आया. यह लड़का जनगढ़ था. स्वामीनाथन ने उससे पूछा – हमारे साथ भोपाल चलोगे?
जनगढ़ तुरन्त जीप में बैठ गया – चलिए.
स्वामीनाथन ने कहा घर पर बता दो, उसने कहा उसकी कोई ज़रूरत नहीं.
गौर करें पाटनगढ़ वही गांव था जहां एल्विन कई वर्षों तक रहे थे और जहां उनकी पत्नी लीला का जन्म हुआ था.
अगले वर्ष जनगढ़ के चाचा की मृत्यु के बाद मैं उसके साथ पाटनगढ़ गया. तीन दिन जनगढ़ के साथ उसी के घर में ठहरा. मैंने वहां उड़ते पक्षियों या आदिवासी देवियों के चित्र किसी दीवार पर नहीं देखे. न ही गांव में किसी भी घर की दीवार पर कोई चित्र देखा.
इसकी वजह थी कि परधान गौण्ड चित्र नहीं बनाते थे. वे संगीतकार थे. चूंकि जनगढ़ विलक्षण था, वह उन देवी-देवताओं को चित्रित करने लगा जो आदिवासी गीतों में वर्णित थे – वह भी भारत भवन आने के बाद जहां उसे बहुतायत से रंग-कागज़ उपलब्ध थे.
मृत्यु के बाद जनगढ़ मिथक बन गया
जब कोई व्यक्ति मिथ बन जाता है तब उसके बारे में अनेक काल्पनिक कहानियां बनने लगती हैं. जनगढ़ द्वारा जापान में आत्महत्या कर लेने के बाद उसे एक मिथ में तब्दील कर दिया गया.
एक समय जनगढ़ ही नहीं, स्वामीनाथन द्वारा आदिवासी कला को समकालीन कला की तरह प्रस्तुत करने के हर प्रयास को अनेक कलाकारों ने बेदर्दी से ठुकराया था, उसका मजाक बनाया था. स्वामीनाथन ने जब जनगढ़ की एक प्रदर्शनी दिल्ली में 1983 में आयोजित की, अधिकांश कलाकार उसे देखने तक नहीं आए.

जनगढ़ की मृत्यु के बाद उनमें से अनेक कलाकारों ने ताबड़तोड़ लेख लिखकर यह जतलाने की कोशिश की कि वे जनगढ़ के बेहद नजदीक थे और उन्होंने पहले ही उसकी छिपी प्रतिभा को पहचान लिया था. जनगढ़ के इस मिथ बन जाने के कारण अनेक झूठी-सच्ची कहानियों ने जन्म ले लिया, जिनमें से कुछ शायद रामचन्द्र गुहा के पास आ गयीं.
जनगढ़ की मृत्यु पर गुहा लिखते हैं कि ‘कहा जाता है कि परिवार से दूर रहकर अकेलापन सह रहे जनगढ़ पर उनके मेजबान ने दीवारों को भरने के लिए बड़े कैनवास जल्द से जल्द भरने का दबाव बनाया था, जिससे जनगढ़ परेशान हो गए थे.’
जनगढ़ को लेकर यह प्रचलित मिथक है, लेकिन यह गलत है. मैं खुद जापान के उस निगाता गांव में गया हूं जहां कभी जनगढ़ गया था और जहां उसकी मृत्यु हुई थी. वहां मिथिला संग्रहालय भी है. मैं दस-बारह दिन वहां रहा हूं. संग्रहालय के निदेशक तोकियो हासेगावा से मिला हूं, जो मेरे भी मेजबान थे. जनगढ़ द्वारा बनाए जा रहे अन्तिम और अधूरे चित्र को देखा, और उस जगह को भी जहां जनगढ़ ने आत्महत्या की. मेरे अनुभव के अनुसार ऐसा कुछ नहीं था कि वह किसी दबाव में काम कर रहा हो. मिस्टर हासेगावा ऐसे व्यक्ति भी नहीं लगे जो किसी से जबरदस्ती काम करवायें.
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि जनगढ़ फेलोशिप पर तीन बार जापान गए थे, लेकिन 2001 के अपने अन्तिम प्रवास के दौरान उन्होंने आत्महत्या कर ली.
गुहा ने वेरियर एल्विन की जीवनी लिखने के लिए कड़ी मेहनत की है, सैकड़ों सन्दर्भों को परखा है. लेकिन स्वामीनाथन और जनगढ़ के प्रकरण के लिए उनका शोध थोड़ा कमजोर दिखाई देता है. क्या यह चूक इसलिए हुई कि हिन्दुस्तान के अधिकांश लेखक अन्य कलाओं को कमतर आंकते हैं? वे अपने कर्म को गम्भीर समझते हैं, लेकिन बाकी कलाओं को इतना महत्त्व नहीं देते?
अन्त में, दो शब्द अनुवाद के बारे में. इस अनुवाद की भाषा साहित्यिक न होकर पत्रकारिता वाली है, जिसमें रिर्पोटिंग का भाव अधिक है. इसलिए पाठ कई जगह नीरस और उबाऊ हो गया है. गुहा की अन्य किताबें मैंने अंग्रेजी में पढ़ी हैं. उनमें भाषा की प्रांजलता मनमोहक है. शायद इस जीवनी की मूल अंग्रेजी किताब भी प्रवाहमयी होगी, लेकिन यह अनुवाद कहीं बेहतर और सरस हो सकता था.
