यह हार एक विराम है
जीवन महासंग्राम है
तिल-तिल मिटूंगा पर दया की भीख मैं लूंगा नहीं…
क्या हार में क्या जीत में
किंचित नहीं भयभीत मैं
संघर्ष पथ पर जो मिले, यह भी सही वह भी सही…
चाहे हृदय को ताप दो
चाहे मुझे अभिशाप दो
कुछ भी करो, कर्त्तव्य पथ से किंतु भागूंगा नहीं
वरदान मांगूंगा नहीं…!
बहुत से लोग अभी भी भूले नहीं होंगे: कवि हृदय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने संघर्ष के दिनों से लेकर राज्यारोहण तक के दिनों तक हिंदी के ‘विद्रोही’ कहलाने वाले कवि शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की उपर्युक्त पंक्तियां इतने मौकों पर और इतनी बार उद्धृत कीं कि अनेक लोग इसे उनकी ही रची काव्य पंक्तियां समझने लगे.
ऐसा शायद इसलिए हुआ कि इस देश के अब तक के किसी भी अन्य प्रधानमंत्री या राजनेता ने कभी अपने संघर्ष पथ को किसी कवि की पंक्तियों से इस तरह जोड़कर परिभाषित नहीं किया. फिर तो उनकी इस परिभाषा को अलग से रेखांकित किया ही जाना था. लेकिन बात रेखांकित करने तक ही नहीं यह गई.
खबरों के अनुसार, वह यहां तक जा पहुंची कि कुछ साल पहले मनाली (हिमाचल प्रदेश) में माल रोड पर अटल की प्रतिमा लगाई गई और उसके नीचे शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की ‘क्या हार में, क्या जीत में…’ शीर्षक पंक्तियां अंकित की गईं तो उनके साथ उनके रचयिता का नाम ही नहीं दिया गया. तब कुछ लोगों ने इसे शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ के साथ अत्याचार बताया तो कुछ और लोगों ने कहा कि ऐसा इसलिए किया गया ताकि जिसको जो भी समझना हो समझ ले.
अटल बिहारी वाजपेयी के गुरु
लेकिन इस सिलसिले में बात को ठीक से समझने का रास्ता यह जानने की दिशा से होकर जाता है कि जब ‘सुमन’ मध्य प्रदेश में ग्वालियर स्थित विक्टोरिया कालेज (अब लक्ष्मी बाई महाविद्यालय) में पढ़ाते थे तो अटल बिहारी वाजपेयी उस में छात्र थे. समय के साथ दोनों के गुरु-शिष्य संबंध प्रगाढ़ हुए तो अटल उनके प्रिय शिष्य हो गए और वे उनके सबसे प्रिय कवि. गुरु का उनका दर्जा तो स्वाभाविक ही था.
बहरहाल , दोनों के गुरु-शिष्य संबंध को इस रूप में भी देखा जा सकता है कि अटल ने स्वयं कवि कर्म शुरू किया तो ‘सुमन’ की इस टिप्पणी के आरंभ में उल्लिखित ‘वरदान मांगूंगा नहीं’ की ही तर्ज पर अपनी प्रसिद्ध ‘हार नहीं मानूंगा’ रचना रची थी. इतना ही नहीं, वे छिपाते भी नहीं थे, बल्कि पूरी ईमानदारी से स्वीकारते थे कि उनकी कविताओं पर ‘सुमन’ की बहुत गहरी छाप है-खासकर ओज वाली कविताओं पर.
2002 में आज के ही दिन (27 नवंबर) सुमन का निधन हुआ तो अटल प्रधानमंत्री थे और उन्होंने उनको श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा था कि ‘सुमन’ हिंदी कविता के सशक्त हस्ताक्षर भर नहीं, अपने समय की सामूहिक चेतना के संरक्षक भी थे. क्योंकि उन्होंने अपनी रचनाओं में न केवल अपनी भावनाओं का दर्द व्यक्त किया, बल्कि अपने युग के मुद्दों पर निर्विवाद रचनात्मक टिप्पणियां भी कीं.
अपने कई और समकालीनों की नजर में भी सुमन निरे कवि नहीं, बल्कि खरे विचारक और चिंतक भी थे. उन्होंने कई विश्वविद्यालयों व महाविद्यालयों में प्रोफेसर और कुलपति के रूप में भी अपनी सेवाएं दीं. यह और बात है कि उन्हें खुद को विद्वान मानने से सख्त परहेज़ था और वे कहा करते थे कि जहां तक विद्वता की बात है, मैं उसका पाला भर छू पाया हूं.
नाम सुमन और काम…
उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा काशी हिंदू विश्वविद्यालय से पूरी की थी और इस शिक्षा के लिए खुद को विश्वविद्यालय के संस्थापक महामना मदनमोहन मालवीय का ऋणी मानते थे. बाद में उन्हें उज्जैन के विक्रम विश्वविद्यालय में नियुक्ति मिली तो कहते थे कि वे काशी से महामना का ऋण चुकता करने उज्जैन पहुंचे हैं. अन्य जगहों पर भी वे काशी हिंदू विश्वविद्यालय से अर्जित अपने ज्ञान को अपने पर महामना का ऋण बताते और कहते थे कि क्या पता, वे इस जीवन में यह ऋण चुकता भी कर पाएंगे या नहीं.
प्रसंगवश, 1916 में पांच अगस्त को वे उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के झगेरपुर नामक गांव में पैदा हुए तो परिजनों ने उनका नाम शिवमंगल रखा था. बाद में कवि कर्म के लिए उन्होंने इसमें ‘सुमन’ उपनाम जोड़ लिया.
हालांकि, कई आलोचकों की नज़र में यह उपनाम निराश व हताश मानव समुदाय के दिल व दिमाग को झकझोरने वाली उनकी ओजभरी देशभक्ति व राष्ट्रीयता की कविताओं की प्रकृति के सर्वथा विपरीत था. उनके उस तेवर के भी विपरीत, जिसके लिए उनको ‘विद्रोही कवि’ कहा जाता है.
दरअसल, उन्होंने अपनी अनेक रचनाओं में अपने समय की असमानता, ऊंच-नीच, भेदभाव व अन्याय पर आधारित व्यवस्था को ‘जर्जर’ कहकर उसके विरुद्ध विद्रोह व संघर्ष की बात कही है. एक जगह तो उन्होंने उस पर बाज बनकर झपटने की बात भी कही है, ताकि शोषितों को धरती व आकाश उससे मुक्त हो सकें.
अपनी युवावस्था में जहां वे कार्ल मार्क्स और उनकी विचारधारा से प्रभावित थे, वहीं महात्मा गांधी की सादगी, संयम और शिक्षाओं से भी. स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान एक बार उनका क्रांतिकारियों से साबका पड़ा तो उन्होंने उनकी भी मदद की.
इस सिलसिले में एक दिलचस्प बात बताई जाती है. यह कि क्रांतिकारियों को उनकी सहायता की आवश्यकता पड़ी तो उनकी ओर से उनकी आँखों पर पट्टी बांधकर उन्हें एक अज्ञात स्थान पर ले जाया गया.
वहां उनकी आंखों की पट्टी खोली गई तो उन्होंने पाया कि उनके सामने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के सेनापति चंद्रशेखर आज़ाद खड़े हैं. आज़ाद ने उन्हें एक रिवॉल्वर दी और कहा कि जब वे दिल्ली जाएं तो वह रिवॉल्वर साथ लेते जाएं और उनके एक क्रांतिकारी साथी को दे दें.
उन्होंने बेहिचक यह काम करना स्वीकार कर लिया और किया भी. बाद में यह बात गुप्त नहीं रह सकी तो गोरी सरकार का अमला उनके पीछे पड़ गया. उनके खिलाफ वारंट भी ज़ारी किया गया, लेकिन वे विचलित नहीं हुए.
मानवता के पैरोकार
यह और बात है कि बाद में उनको क्रांतिकारिता के बजाय मानवता अच्छी लगने लगी और वे राष्ट्रीयता का स्थान भी मानवता के बाद ही मानते रहे. वे लिख भी गए हैं कि ‘मैं अपने को किसी विशेष चिंतनधारा या वाद से नहीं जोड़ता और प्रवृत्ति की दृष्टि से मूलतः रोमांटिक हूं.’
हां, काल प्रवृत्तियों के लिहाज से कभी उनको छायावादी कहा जाता है और कभी प्रगतिवादी. शायद इसलिए कि वे इन दोनों वादों के बीच के पुल की भूमिका में थे. उनका समय छायावाद के अवसान और प्रगतिवाद के आगाज का समय था.
एक आलोचक ने जहां उनके बारे में लिखा है कि अन्याय के प्रति विद्रोह, निराशा के प्रति आक्रामकता और मानव क्षमताओं की महिमा बखानती उनकी कविताएं सोती हुई मनुष्यता के लिए जागरण का गीत हैं, तो दूसरे आलोचक का कहना है कि उनके नाम में ‘सुमन’ अवश्य है लेकिन उनकी कल्पनाओं में मनुष्य सुमन जैसा कोमल नहीं है.
सुमनों-पुष्पों के सौंदर्य के उत्कर्ष की बेला बसंत भी उनकी कल्पना में किसी जंगी तैयारी के समान है: जब सजी वसंती बाने में बहनें जौहर गाती होंगी/ कातिल की तोपें उधर, इधर नवयुवकों की छाती होगी/तब समझूंगा आया बसंत.
उनके बारे में बताने की इससे भी बड़ी बात यह है कि वे जिस भी शहर में रहते, उसके साहित्य प्रेमियों में ही नहीं, जनसामान्य में भी घुल-मिलकर ‘सबके प्यारे सुमन जी’ बन जाते थे. तब उनसे मिलने आने वाले किसी अजनबी को रिक्शे वालों को यह बता देना भर काफ़ी होता था कि उसे सुमन जी के घर जाना है.
एक बार कानपुर में उनके एक कार्यक्रम के बाद कुछ पत्रकारों ने उनसे बात करनी चाही और आयोजकों ने यह कहकर मना करना चाहा कि सुमन जी थके हुए हैं, तो उन्होंने स्वयं आगे आकर कह दिया था कि ‘नहीं-नहीं, मैं थका हुआ नहीं हूं. पत्रकार तात्कालिक साहित्य के निर्माता हैं और उनसे दो चार पल बात करना मुझे अच्छा लगता है.’
2002 में 27 नवंबर को दिल के दौरे ने उनसे उनकी सांसें छीन लीं और उन्होंने इस संसार को अलविदा कहा तो उनकी झोली पद्मश्री व पद्मभूषण के साथ देव पुरस्कार, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार व शिखर सम्मान और भारत भारती आदि से भरी हुई थी.
1974 का साल उनके लिए इस लिहाज से बहुत सौभाग्यशाली रहा था कि इस साल उनको पद्मश्री, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, साथ ही साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुए.
आगे चलकर 1999 में उनको पद्मभूषण से तो इससे पहले 1958 में उस समय के प्रतिष्ठित देव पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. इनके अतिरिक्त 1993 में उनको शिखर सम्मान तो 1993 में भारत भारती पुरस्कार मिला था.
चलना हमारा काम है
गौरतलब है कि अपनी एक रचना में उन्होंने विश्वास व्यक्त किया था कि ‘कवि मिट जाता लेकिन उसका उच्छ्वास अमर हो जाता है, मिट्टी गल जाती पर उसका विश्वास अमर हो जाता है.’
निस्संदेह, कवि-सामर्थ्य में इस अगाध विश्वास से भी जीवन के महासंग्राम में ‘गति प्रबल पैरों में भरी’ और ‘चलना हमारा काम है’ जैसी घोषणाएं करते हुए अनथक जूझते उनके कवि की शक्ति का ही पता चलता है :
गति प्रबल पैरों में भरी
फिर क्यों रहूं दर-दर खड़ा
जब आज मेरे सामने
है रास्ता इतना पड़ा
जब तक न मंज़िल पा सकूं,
तब तक मुझे न विराम है,
चलना हमारा काम है.
जीवन अपूर्ण लिए हुए
पाता कभी खोता कभी
आशा निराशा से घिरा,
हंसता कभी रोता कभी
गति-मति न हो अवरुद्ध,
इसका ध्यान आठो याम है…
इस विशद विश्व-प्रहार में
किसको नहीं बहना पड़ा
सुख-दुख हमारी ही तरह,
किसको नहीं सहना पड़ा
फिर व्यर्थ क्यों कहता फिरूं,
मुझ पर विधाता वाम है…
मैं पूर्णता की खोज में
दर-दर भटकता ही रहा
प्रत्येक पग पर कुछ न कुछ
रोडा अटकता ही रहा
पर हो निराशा क्यों मुझे?
जीवन इसी का नाम है…
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
