नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में हवा के बाद अब पानी की गुणवत्ता ने भी लोगों को चिंता बढ़ा दी है. हाल ही में जारी हुई केंद्रीय भूजल बोर्ड की वार्षिक भूजल गुणवत्ता रिपोर्ट 2025 में सामने आया है कि 2024 में देश में यूरेनियम-दूषित भूजल नमूनों का तीसरा सबसे बड़ा हिस्सा दिल्ली शहर का था.
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, मानसून से पहले और बाद के पानी के परीक्षण की रीडिंग में यूरेनियम की मात्रा दिल्ली में भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) की 30 पार्ट्स प्रति बिलियन (पीपीबी) की सीमा से अधिक थी.
उल्लेखनीय है कि रिपोर्ट में राष्ट्रीय तुलना राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से एकत्र किए गए 3,754 भूजल नमूनों पर आधारित है.
दिल्ली में मानसून के बाद एकत्र किए गए 15.66% नमूनों में यूरेनियम की मात्रा सुरक्षित सीमा से अधिक पाई गई. वहीं, मानसून से पहले की अवधि में 13.25% नमूनों में उच्च दूषण (contamination) पाया गया.
राजधानी में उत्तरी दिल्ली, उत्तर-पश्चिमी, पश्चिमी दिल्ली और दक्षिण पश्चिम दिल्ली, रोहिणी, भलस्वा झील क्षेत्र, नांगली राजपुरा की स्थिति ज्यादा गंभीर है.
रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब और हरियाणा के बाद यूरेनियम की मात्रा के मामले में दिल्ली तीसरे स्थान पर है.
इस संबंध में स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यूरेनियम-दूषित भूजल के लंबे समय तक इस्तेमाल से गुर्दे खराब हो सकते हैं, रासायनिक विषाक्तता हो सकती है और कैंसर से जुड़े प्रभावों का खतरा बढ़ सकता है.
वहीं, एक्टिविस्ट बताते हैं कि प्राकृतिक यूरेनियम युक्त चट्टानों जैसे भूवैज्ञानिक कारकों और अत्यधिक दोहन के कारण यह प्रदूषण बढ़ रहा है, क्योंकि कम होते भूमिगत जलाशय का बोरवेल के ज़रिए और गहराई तक दोहन किया जा रहा है.
पंजाब में स्थिति सबसे गंभीर
रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रीय स्तर पर यह समस्या पंजाब में सबसे गंभीर है, जहां मानसून के बाद की अवधि में 62% नमूने सुरक्षित सीमा से ऊपर पाए गए, जबकि 53% नमूने मानसून से पहले ही दूषित हो गए थे. अन्य हॉटस्पॉट में राजस्थान, चंडीगढ़, छत्तीसगढ़, राजस्थान और चंडीगढ़ शामिल हैं. हालांकि इनके स्तर अलग-अलग हैं.
दिल्ली के लिए ये निष्कर्ष उन इलाकों के लिए सीधा खतरा पैदा करते हैं जो अभी भी अपनी दैनिक ज़रूरतों के लिए ट्यूबवेल पर निर्भर हैं, खासकर उन आवासीय कॉलोनियों के लिए जो अभी तक पाइप से पानी की आपूर्ति से जुड़ी नहीं हैं.
जल विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि भूजल में कमी के कारण कुएं चट्टानों की परतों में और गहरे धंस रहे हैं जिनमें रेडियोएक्टिव तत्व मौजूद हैं, जिससे निकाले गए पानी में यूरेनियम की मौजूदगी बढ़ रही है.
जल कार्यकर्ता पंकज सिंह बताते हैं, ‘रिपोर्ट में जन स्वास्थ्य की रक्षा के लिए तत्काल सरकारी हस्तक्षेप की मांग की गई है, जिसमें वैज्ञानिक उपचार विधियों को लागू करना, साथ ही ट्यूबवेल आपूर्ति की कड़ी निगरानी और समय-समय पर जांच शामिल है. पिछले साल राज्यसभा में दिए गए एक जवाब में बताया गया था कि प्रदूषण 10% था. अब यह लगभग 15% है और यह चिंताजनक है.’
सिंह ने दिल्ली के उपराज्यपाल और मुख्यमंत्री को लिखे पत्रों में इस पैमाने के बारे में बताया है और चेतावनी दी है कि दिल्ली जल बोर्ड द्वारा 5,500 ट्यूबवेल और रैनी कुओं के माध्यम से प्रतिदिन आपूर्ति किए जाने वाले 45 करोड़ लीटर पानी की तत्काल जांच और निगरानी की जानी चाहिए.
उन्होंने राजधानी में स्थित 5,500 से ज़्यादा भूजल स्रोतों की त्वरित और सुव्यवस्थित गुणवत्ता जांच की आवश्यकता पर ज़ोर दिया.
हरियाणा में भी इस तरह के प्रदूषण में तेज़ वृद्धि दर्ज की गई- मानसून से पहले 10% प्रदूषण से बढ़कर मानसून के बाद 23.75% हो गया. हालांकि, पहले के मसौदों में टाइपिंग की गलती से यह गलत अंकित हो गया था.
कार्यकर्ताओं ने बताया कि चंडीगढ़, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में अभी भी औसत प्रदूषण देखा जा रहा है.
अखिल भारतीय स्तर पर, मानसून से पहले 6.71% नमूनों में यूरेनियम की मात्रा सीमा पार हो गई थी, जो मानसून के बाद मामूली रूप से बढ़कर 7.91% हो गई, जो देशव्यापी मौसमी वृद्धि का संकेत है.
इसके विपरीत, रिपोर्ट में कहा गया है कि गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और नागालैंड, मिज़ोरम और मणिपुर जैसे पूर्वोत्तर राज्यों में दूषण कम या सीमित रहा.
