नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश के मेरठ में एक मुस्लिम व्यक्ति द्वारा हिंदू परिवार के घर को खरीदने का सौदा एक नया विवाद बन गया है. स्थानीय हिंदू समूहों ने इसे लेकर पुलिस थाने और बाद में थापर नगर में स्थित घर के बाहर विरोध प्रदर्शन और हनुमान चालीसा का पाठ भी किया.
इस दौरान हिंदू संगठनों ने ‘हिंदुओं के पलायन’ को रोकने का संकल्प भी लिया. उन्होंने मांग की कि इस संपत्ति का पंजीकरण रद्द किया जाए और अगर इसे बेचा ही जाए, तो केवल किसी गैर-मुस्लिम व्यक्ति को ही बेचा जाए.
उल्लेखनीय है कि यह विवाद रविवार (30 नवंबर) को तब और बढ़ गया जब पास के गुरुद्वारे के बाहर स्कूटर सवार दो अज्ञात लोगों ने मांस के टुकड़े फेंक दिए.
स्थानीय हिंदुत्व नेता सचिन सिरोही के अनुसार, यह काम विधर्मियों (गैर-हिंदुओं के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक अपशब्द) का है.
इस संबंध में मेरठ पुलिस की अपराध शाखा के सहायक पुलिस अधीक्षक आयुष सिंह ने समाचार एजेंसी पीटीआई को बताया कि गुरुद्वारे के पास एक निर्माणाधीन इमारत से मांस मिला है.
उनके अनुसार, ‘शुरुआती जांच से यह पता चलता है कि अज्ञात लोगों द्वारा सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने के लिए जानबूझकर मांस फेंका गया है.’
बढ़ते तनाव और प्रशासन की ओर से शांति की अपील के बीच घर खरीदने वाले मुस्लिम व्यक्ति सईद अहमद को दिल का दौरा पड़ा, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाया गया. फिलहाल उनका इलाज मेरठ के एक अस्पताल में चल रहा है.
‘अपनी सारी जमापूंजी लगा दी’
दरअसल, 26 नवंबर को 40 वर्षीय सईद अहमद ने मेरठ के थापर नगर में वीना कालरा और उनके बेटे अनुभव कालरा से एक घर खरीदा.
उल्लेखनीय है कि थापर नगर एक पॉश कॉलोनी है, जहां ज़्यादातर सिख और हिंदू रहते हैं. सईद ने कालरा परिवार को उनकी मांग के अनुसार 1.46 करोड़ रुपये दिए और स्थानीय हिंदुत्ववादी समूहों के विरोध के बावजूद तुरंत अपने परिवार के साथ वहां रहने चले गए.
सईद के भाई शाहरोज़ ने द वायर को बताया, ‘इस प्रॉपर्टी को खरीदने के लिए उन्होंने भारी कर्ज लिया है. हमारे मोहल्ले में उनकी किसी से कोई दुश्मनी नहीं है. यह घर उनके पुराने व्यवसाय के पास था, इसलिए उन्होंने अपनी सारी जमापूंजी इस संपत्ति को खरीदने में खर्च कर दी.’
शाहरोज़ ने द वायर को बताया कि सईद और अनुभव के पिता नरेश (मकान के पूर्व मालिक), दोनों एक ही उद्योग में काम करते थे और किसी समय भाजपा से जुड़े रहे थे.
सईद के लिए यह एक फ़ायदेमंद सौदा था क्योंकि कालरा परिवार थोक दूध विक्रेता था. उनके भाई ने कहा, ‘उन्होंने सोचा था कि चूंकि वह बाहर जा रहे हैं, इसलिए उन्हें कालरा के पुराने ग्राहक मिल जाएंगे.’
कालरा परिवार के लिए भी यह उतनी ही फ़ायदेमंद स्थिति थी. अनुभव और वीना के एक हलफ़नामे के अनुसार, महीनों तक अपनी संपत्ति बेचने की कोशिश करने के बाद उन्होंने आखिरकार सईद को इसे बेचने का फैसला किया क्योंकि उन्होंंने इस घर के लिए उन्हें बढ़िया क़ीमत की पेशकश की थी.
इसमें कहा गया है कि कुछ लोगों ने मुसलमानों को संपत्ति बेचने पर आपत्ति जताई थी, लेकिन विक्रेता होने के नाते उन्हें ख़रीदार की पहचान से कोई आपत्ति नहीं है.
उनके मुताबिक, ‘यह हमारी निजी संपत्ति है और जो भी मांगी गई राशि देगा, हम इसे उसे बेच देंगे और हम तुरंत ख़रीदार को कब्ज़ा सौंप देंगे.’
‘मुसलमानों को न्याय नहीं’
हालांकि, संपत्ति की यह मामूली बिक्री अब एक सांप्रदायिक विवाद में बदल रही है और इलाके में कानून-व्यवस्था की भयावह स्थिति पैदा हो गई है.
शाहरोज़ ने बताया कि संपत्ति की चाबियां तीन महीने से स्थानीय विधायक अमित अग्रवाल के पास थीं, क्योंकि कालरा परिवार को उम्मीद थी कि विधायक उन्हें अच्छा सौदा दिलाने में मदद कर सकते हैं. जब वह बिक्री नहीं करवा पाए, तो सईद ने अनुभव को पैसे देकर घर ले लिया.
इस मामले के संबंध में द वायर ने स्थानीय विधायक अमित अग्रवाल से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन वे टिप्पणी के लिए उपलब्ध नहीं हुए.
शाहरोज़ ने आगे बताया, ‘हमने अभी तक कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई है, लेकिन अगर मेरे भाई को कुछ हुआ, तो सचिन सिरोही ज़िम्मेदार होंगे. ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि मुसलमानों को कोई न्याय नहीं मिल रहा है.’
(इस ख़बर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)
