माओवादी नेता माड़वी हिड़मा के कथित मुठभेड़ में मारे जाने के बाद देश भर में कई तरह की चर्चाएं चल रही हैं. मीडिया और सोशल मीडिया हिड़मा से जुड़ी ख़बरों से भरा पड़ा है. एक तरफ जहां सरकार और मीडिया का एक बड़ा तबका उन्हें खूंखार नक्सली बता रही है, जिसने कई हमलों को अंजाम दिया. वहीं, दूसरी ओर सोशल मीडिया पर आदिवासी समुदायों से जुड़े कई लोग हिड़मा को एक नायक के तौर पर पेश कर रहे हैं – जो उनके अधिकारों के लिए लड़ा और उनके जल-जंगल-जमीन को बचाने की कोशिश की.
जब माओवादियों के पूर्व नेता मल्लोजुला वेणुगोपाल उर्फ सोनू और वासुदेव राव उर्फ सतीश ने सरकार के सामने हथियारों के साथ सरेंडर किया था, तब भी यह सवाल उठा था कि वे आगे जिस रास्ते पर चलने का दावा कर रहे हैं, उसमें आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन का मुद्दा होगा या नहीं? हालांकि, अब तक इस पर न तो कोई स्पष्टता मिली है, न ही उनकी तरफ से कोई नया बयान आया है.
बहरहाल, सरकार ने माओवाद के खात्मे के लिए 31 मार्च 2026 की समयसीमा तय की है. इस अवधि के अंदर माओवाद या नक्सलवाद या उनकी विचारधारा पूरी तरह से खत्म होगी, या नहीं होगी, यह तो भविष्य ही बताएगा. लेकिन अब तक के परिणामों से इतना तो पता चलता है कि बस्तर या यूं कहें कि मध्य भारत के विशाल आदिवासी अंचल में माओवादी आंदोलन अब एक बड़ी ताकत के रूप में नहीं रह पाएगा.
सरकार कह रही है कि अब बस्तर में शांति आएगी, विकास की गति बढ़ेगी, गांव-गांव में बिजली, स्कूल, सड़क, अस्पताल, मोबाइल टॉवर जैसी सारी सुविधाएं आ जाएंगी. दूसरी ओर, आदिवासी समाज का एक तबका इस बात को लेकर चिंतित और आशंकित है कि उनके संसाधनों का अब क्या होगा. उनके जल-जगंल-जमीन की रक्षा कैसी होगी.
नक्सल उन्मूलन के नाम से बस्तर क्षेत्र में अब हर 3-5 किलोमीटर में एक पुलिस या अर्धसैनिक बलों का कैंप बैठाया गया है. अभी भी लगातार नए-नए कैंप खोले जा रहे हैं. ऐसे में, लोगों के मन में यह आशंका भी है कि नक्सलवाद खत्म होगा तो ये कैंप हट जाएंगे या नहीं, और नहीं हटते हैं तो अपने संसाधनों को बचाने के लिए क़ानूनी और शांतिपूर्ण आंदोलन करने का मौक़ा मिलेगा या नहीं.
अविभाजित बस्तर क्षेत्र, जो केरल राज्य से भी बड़ा है, उच्च कोटि के लौह अयस्क, बॉक्साइट, टिन, कोयला, कोरंडम, चूनापत्थर, ग्रेनाइट जैसी कई खनिज संपदाओं से भरपूर है. इन संपदाओं के दोहन के लिए बड़े कॉरपोरेट घराने काफ़ी अरसे से ताक में बैठे हैं. पिछले कुछ समय से खदानें तेजी से खुल रही हैं, या प्रस्तावित हैं.
रावघाट, आमदाई जैसी जगहों पर खदानों के कारण स्थानीय लोग काफ़ी परेशानियों का सामना कर रहे हैं. लोगों को डर है कि यह सिलसिला अब और ज़्यादा बढ़ सकता है. यह डर भी पैदा हो गया है कि उनके जल-जंगल-जमीन को अब मनमाने तरीके से लूटा जाएगा. और इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना भी उनके लिए मुश्किल हो सकता है.
अक्सर पूछा जाता है कि जब दंडकारण्य से नक्सलियों को हटा दिया जाएगा, इस बीहड़ जंगल की क्या तस्वीर बनेगी? इसका उत्तर माओवाद-प्रभावित गढ़चिरौली जिले में देखा जा सकता है. पिछले कुछ सालों से इस जिले में जैसे-जैसे माओवादी आंदोलन कमजोर होकर सिमटता जा रहा है, महाराष्ट्र सरकार ने खदानों और उद्योगों को बढ़ाने की प्रक्रियाएं तेज कर दी हैं.
खदान के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई और पहाड़ों में खनन से पर्यावरण को भारी नुकसान हो रहा है. खनन से निकलने वाले गंदे लाल पानी और गंदी धूल से हवा और पानी बुरी तरह प्रदूषित हो रहे हैं.
स्थानीय लोगों के अनुसार, खनन की वजह से आदिवासियों की आजीविका बुरी तरह से प्रभावित हो रही है. उनके खेत खदान से निकलने वाली मिट्टी से पटकर बेकार हो रहे हैं. उसमें अब फसल मुश्किल से उगती है. स्थानीय लोग बताते हैं कि खदान खुलने के बाद इस इलाके की आदिवासियों युवतियों के साथ यौन शोषण की घटनाएं बढ़ रही हैं. खदानों में काम करने के लिए बड़े पैमाने पर बाहर से लोग आते हैं. यहां की महिलाएं उनके घरों में बर्तन, झाडू-पोंछा जैसे काम करने के लिए जाती हैं, और उनका यौन शोषण होता है.
200 सालों से ज़्यादा पुराना है बस्तर का संघर्ष
दरअसल बस्तर में संघर्ष की परंपरा माओवाद से भी ज़्यादा पुराना है. बस्तर में माओवादी आंदोलन पिछले साढ़े चार दशकों से चल रहा है, लेकिन यहां के आदिवासियों के संघर्षों का इतिहास तो पिछले 200 वर्षों से भी ज्यादा का है. इस भूमि पर शासन–प्रशासन, प्राकृतिक संसाधन, आदिवासी अधिकारों और राजनीतिक हस्तक्षेप को लेकर लगातार संघर्ष होते रहे हैं.
बस्तर में मराठा राजाओं के खिलाफ 1774–1779 में आदिवासियों ने हथियार उठाया था, जिसे हल्बा विद्रोह के नाम से जाना जाता है. यह विद्रोह बस्तर में बाहरी लोगों (मराठाओं) के हस्तक्षेप के खिलाफ था. बस्तर के लिखित इतिहास में यही पहला बड़ा संगठित संघर्ष होने का प्रमाण मिलता है.
इसके बाद अंग्रेजों के साथ सांठगांठ करने वाले मराठा राजाओं के ख़िलाफ 1825 में, यानी प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से तीन दशक पहले ही, परालकोट विद्रोह हुआ था. इस विद्रोह का नेतृत्व वहां के स्थानीय आदिवासी जमींदार गेंदसिंह ने किया था. यह विद्रोह अबूझमाड़ के उत्तरी इलाके और वर्तमान कांकेर जिले में हुआ था. परोक्ष रूप से ही सही, इसे बस्तर के आदिवासी समुदाय का प्रारंभिक स्वतंत्रता संघर्ष माना जाना चाहिए.
जब अंग्रेजों द्वारा रेल लाइनें बिछाने में इस्तेमाल के लिए बड़े पैमाने पर साल के पेड़ों की कटाई की जा रही थी, तब बस्तर के आदिवासियों ने 1859 में विद्रोह किया था. जिसे कोया विद्रोह के नाम से जाना जाता है. इस विद्रोह को दबाने के लिए ब्रिटिश शासन ने फौज भेजा था.
उसके बाद जब 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश सरकार ने बस्तर के जंगलों पर कानूनी तौर कब्ज़ा करना शुरू किया था, तब 1876-1877 में यहां के आदिवासियों ने ब्रिटिशों के खिलाफ हथियार उठाए थे. यह विद्रोह जबरन लगान और कर, जंगलों पर नियंत्रण करने वाले ब्रिटिश कानूनों, पारंपरिक स्वशासन में हस्तक्षेप के खिलाफ हुआ था, जिसे मुरिया विद्रोह के नाम से जाना जाता है. यह संघर्ष अबूझमाड़ और आसपास के इलाकों तक फैला था.

हालांकि ब्रिटिश सरकार ने इसे जल्द ही दबा दिया. यह बस्तर के आदिवासी स्वाधीनता संघर्ष में एक महत्वपूर्ण अध्याय बन गया.
इसके बाद आता है 1910 का भूमकाल विद्रोह, जिसे बस्तर का सबसे प्रसिद्ध और व्यापक आदिवासी संघर्ष होने का गौरव हासिल है. इस विद्रोह का नेतृत्व धुरवा आदिवासी समुदाय के गुंडाधूर ने किया था. भूमकाल विद्रोह अंग्रेजों के शोषण और उनके अन्यायपूर्ण नीतियों के खिलाफ चला था. ब्रिटिश सरकार की वन नीतियां, बेगारी प्रथा (जबरन काम करवाना) और आदिवासियों को उनके जल, जंगल और जमीन से वंचित करना इस विद्रोह के प्रमुख कारण थे.
इसके अलावा अंग्रेजी सरकार द्वारा आदिवासी संस्कृति में दखल देना भी एक वजह बना, जिसमें मांझी-मुखिया परंपरा, गोटूल व्यवस्था, देवस्थान, देवी-देवताओं के अधिकारों पर हस्तक्षेप आदि थे.

भूमकाल आंदोलन को केवल एक विद्रोह नहीं बल्कि बस्तर की सांस्कृतिक–राजनीतिक चेतना का पुनर्जागरण भी माना जाता है. यह आंदोलन पूरे बस्तर राज्य (आज के बस्तर, दंतेवाड़ा, सुकमा, कोंटा, बीजापुर, कांकेर, नारायणपुर, कोंडागांव जिलों) तक फैला था. इसे मध्य भारत का सबसे बड़ा आदिवासी विद्रोह भी माना जाता है.
आज़ादी के बाद बस्तर में सामाजिक, सांस्कृतिक, आदिवासी अधिकार, जंगल–भूमि अधिकार और संसाधनों को लेकर छोटे-बड़े कई आंदोलन हुए थे, जो आज भी चल रहे हैं. बस्तर की पहचान ही अन्याय का प्रतिरोध, पारंपारिक स्वशासन और संसाधनों पर अधिकार की लड़ाइयों से जुड़ी है.
1950 के दशक से ज़मीन और जंगल पर अधिकार को लेकर आंदोलन हुए थे. इसका मुख्य कारण संविधान लागू होने के बाद 1956 में पारित भारतीय वन अधिनियम था. इस कानून के साथ ही बस्तर के वनों पर वन विभाग का नियंत्रण हो गया. दरअसल यह कानून असल में ब्रिटिश ज़माने के वन कानून, 1927 का ही विस्तार था. आदिवासी जो पहले खुद को अपने जंगल और ज़मीन का अधिकारी मानते थे, इस कानून ने उन्हें एक प्रकार से अपने ही जंगलों में पराया या चोर बना दिया.
1966 में बस्तर के आख़िरी राजा प्रवीर चंद्र भंजदेव को आदिवासी अधिकारों के लिए लड़ने की वजह से जान गंवानी पड़ी थी. 1950–60 के दशकों में ज्यों-ज्यों वन कानून, राजस्व नीतियां और बाहरी ठेकेदारों का दबदबा बढ़ने लगा था, त्यों-त्यों आदिवासी अपने जंगल–जमीन पर अधिकार खोने लगे थे. ऐसे समय में प्रवीर चंद्र भंजदेव ने आदिवासी समाज के पक्ष में आवाज उठाई थी. सरकारी नीतियों का खुलकर विरोध किया था.
25 मार्च, 1966 को जगदलपुर के महाराजा महल में हुई पुलिस की गोलीबारी में प्रवीर चंद्र भंजदेव की मौत हो गई. आधिकारिक रूप से इसे पुलिस कार्रवाई कहा गया, लेकिन बस्तर के लोगों की स्मृति में यह घटना एक राजनीतिक हत्या की तरह दर्ज है.

शायद आजाद भारत में आदिवासियों के अधिकारों के लिए संवैधानिक तरीके से लड़ते हुए सत्ता के हाथों अपनी जान गंवाने वाले वह पहले बस्तरवासी थे.
ऐसे तो बस्तर में आदिवासी अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, आदिवासी कार्यकर्ताओं पर सरकारी हिंसा के कई उदाहरण हैं.
1992 में तत्कालीन मध्य प्रदेश सरकार जब बैलाडीला में डिपाज़िट नंबर 5 को किसी निजी कंपनी को सौंपना चाह रही थी, तो आदिवासियों ने विरोध किया. उनके समर्थन में आए बस्तर के पूर्व कलेक्टर बीडी शर्मा पर जगदलपुर के कलेक्टर कार्यालय के सामने पुलिस और भाजपा के कार्यकर्ताओं ने चप्पलों की माला डालकर, उन्हें अपमानित किया था और उन्हें जबरन जीप में डालकर हिरासत में लिया गया था.
इसके दो दशक बाद अप्रैल 2011 में सलवा जुडूम के लोगों और पुलिस बलों द्वारा ताड़मेटला, तिम्मापुरम और मोरपल्ली – इन तीन गांवों को जलाए जाने के आरोप सामने आए थे, तब उसकी मौके पर जांच करने गए स्वामी अग्निवेश को दोरनापाल के पास रोककर पीटा गया था.
बस्तर में हो रहे मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों पर मुखरता से आवाज़ उठाने वाली कार्यकर्ता सोनी सोरी को भी 2011 में गिरफ्तार किया गया था और पुलिस हिरासत में उन पर क्रूरता बरते जाने के आरोप सामने आए थे. सुप्रीम कोर्ट को भी इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा था. फिर 2012 में उन पर एसिड एटैक भी हुआ था, जिसके लिए सोनी ने पुलिस को जिम्मेदार होने का आरोप लगाया था.
अक्टूबर 2024 में सरकार ने आदिवासी अधिकारों के लिए संवैधानिक तरीके से संघर्ष कर रहे ‘मूलवासी बचाओ मंच’ पर प्रतिबंध लगा दिया और उसके अध्यक्ष रघु मिड़यामी सहित कई कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया, जो अभी भी जेल में हैं.
सरकार द्वारा 30 अक्टूबर, 2024 को जारी एक परिपत्र कहा गया था कि यह एक गैरकानूनी और विकास विरोधी संगठन है. आदेश में कहा गया है कि यह संगठन केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में चलाए जा रहे विकास कार्यों और इनके संचालन के लिए स्थापित किए जा रहे पुलिस कैंपों का विरोध कर रहा और जनता को भड़का रहा है.
जबरन भू-अधिग्रहण और विस्थापन के ख़िलाफ आंदोलन
इन जनादोलनों के बीच 1960 के दशक में बैलाडीला लौह खदान के खिलाफ लोगों ने आंदोलन किया था. इस परियोजना के पहले चरण में टिंडेपार, करकाटोला, बचेली, किरंदुल जैसे गांवों के आसपास बड़े पैमाने पर जंगल काटे गए थे और भूमि अधिग्रहित की गई थी. 1970 के दशक में भी लगातार विरोध प्रदर्शन होते रहे. अब भी उसके विस्तार को लेकर वहां के आदिवासी और स्थानीय लोग आंदोलन कर ही रहे हैं.

कांकेर जिला, केशकाल क्षेत्र के कुवेमारी में बॉक्साइट खदान खोलने का प्रस्ताव सबसे पहले 1980 के दशक में लाया गया था. उस प्रस्तावित खदान से दर्जनों गांव प्रभावित होने वाले थे. इसलिए लोगों ने खुद को संगठित किया और आंदोलन का रास्ता अपनाया जिससे वह खदान फिर कभी नहीं खुल पाया.
इसी तरह 1970 के दशक से बोधघाट बहुद्देश्यीय परियोजना दक्षिण बस्तर (दंतेवाड़ा-बीजापुर) में इंद्रावती नदी पर प्रस्तावित थी. सरकार के प्रारंभिक अनुमान के मुताबिक, इस परियोजना के लिए 13,783 हेक्टेयर ज़मीन की ज़रूरत होगी और 28 गांव पूरी तरह से डूब जाएंगे और 14 गांव आंशिक रूप से प्रभावित होंगे. 2,000 से ज़्यादा परिवार बेघर हो जाएंगे. इसलिए स्थानीय लोगों ने इसका विरोध किया.
इसके अलावा, बड़ा बांध होने की वजह से इससे पर्यावरण को भारी नुकसान होने वाला था. 1979 के आसपास हुए प्रारंभिक सर्वे के दौरान आदिवासी समाज ने कड़ा विरोध जताया था. बाद में 1985-1995 के बीच दोबारा इसे शुरू करने की कोशिशें हुईं तो ग्राम सभाओं के जरिए लोगों ने विरोध करना शुरू किया. सर्वे दलों को गांवों में घुसने नहीं दिया गया.
उसके बाद 1995-2005 के बीच दंतेवाड़ा और बीजापुर इलाके में आदिवासी संगठनों ने पहली बार इस परियोजना के खिलाफ संगठित आंदोलन शुरू किया. अलग-अलग गांवों में इसके खिलाफ प्रस्ताव पारित किए गए. ऐसा भी कहा जाता है कि शायद माओवाद का बढ़ता प्रभाव भी इस आंदोलन के मजबूत होने की एक वजह था.
2006 में पारित वन अधिकार अधिनियम से भी लोगों के संघर्ष को कानूनी आधार मिल गया. कई गांवों के ग्राम सभाओं ने परियोजना के खिलाफ प्रस्ताव पारित किए. बिना ग्राम सभा के अनुमति के परियोजना को अवैध बताया गया. 2015 में जब फिर से परियोजना के लिए सर्वे का काम शुरू करने की कोशिश की गई तो बड़े पैमाने पर लोग इसके विरोध में उतरे. कई जगहों पर बैठकें आयोजित कर विरोध प्रस्ताव पारित किए गए. सर्वे टीमों को कई बार वापस लौटना पड़ा.
अब जून 2025 में लगभग पांच दशकों से लंबित बोधघाट परियोजना को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फिर से हरी झंडी दे दी है.
इसी तरह बस्तर के लोहंडीगुड़ा में प्रस्तावित स्टील/स्पंज-आयरन परियोजना को लेकर वहां के स्थानीय लोग लंबे समय तक लड़ाई लड़ी.
साल 2005 में टाटा स्टील ने छत्तीसगढ़ सरकार के साथ एक एमओयू किया था, जिसके तहत लोहंडीगुड़ा में एक बड़ा स्टील प्लांट स्थापित किया जाना था. इस परियोजना के लिए लगभग 2,000 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण किया गया था, जिससे 1,700 से अधिक किसान प्रभावित हुए थे. तब तत्कालीन छत्तीसगढ़ सरकार पर पेसा कानून, ग्रामसभा के नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए झूठी ग्राम सभाओं का आयोजन करवाने के आरोप लगे थे.
स्थानीय लोगों के विरोध के कारण आखिरकार कंपनी को 2016 में इस परियोजना को वापस लेना पड़ा. बाद में सरकार ने अधिग्रहण की गई भूमि किसानों को वापस कर दी.
रावघाट लौह खदान
उत्तर बस्तर के कांकेर और नारायणपुर जिलों के पहाड़ियों में फैले इस खदान की खोज 1983 में की गई थी, लेकिन स्थानीय आदिवासियों और माआवोदियों के विरोध के कारण इसे शुरू होने में लगभग तीन दशक लग गए. शुरूआत में यानी 1990 के दशक में वहां के आदिवासियों ने ही विरोध शुरू किया था. बाद में पीपुल्सवार पार्टी (अब भाकपा-माओवादी) उस आंदोलन में शामिल हो गई.
इसके बाद इलाके में बड़े पैमाने पर पुलिस और सुरक्षा बलों के कैंप स्थापित किए गए, तब जाकर खनन गतिविधियां 2020 में शुरू हुईं.
उत्तर बस्तर के कांकेर और नारायणपुर ज़िले में फैली रावघाट की पहाड़ियों में लौह अयस्क के छह ब्लॉक हैं, जिनमें 712.48 मिलियन टन लौह अयस्क होने का अनुमान है.
बस्तर का आदिवासी समुदाय अपने अधिकारों को लेकर हमेशा से सजग रहा है. उनके लिए लड़ता भी रहा है. जल-जंगल-जमीन को बचाने और विस्थापन से बचने का उनका लंबा संघर्ष अब एक अहम मोड़ पर आ गया है. क्योंकि माओवाद के ख़ात्मे के नाम पर अब बस्तर एक युद्ध भूमि बन गया है. फिलहाल इस युद्ध में सरकार जीतती हुई नज़र आ रही है. लेकिन इस जीत के मायने आदिवासियों के लिए क्या होंगे?
पारंपरिक स्वशासन और संसाधनों पर अधिकार के लिए पिछले दो सदियों से भी ज्यादा समय से चलते आ रहे उनका प्रतिरोध और उनकी ख्वाहिशों का क्या होगा? इन सवालों का जवाब भविष्य ही बताएगा.
