‘हमें सिलाई सिखाने के नाम पर ले गए थे’: पूर्व माओवादी स्त्रियों ने कहा, ‘धोखे से कराया गया रैंप वॉक’

छत्तीसगढ़ के रायपुर में राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर हुए एक फैशन शो की रैंप वॉक में पूर्व माओवादी महिलाओं ने हिस्सा लिया था. सरकार इसे अपनी सफलता की तरह पेश कर रही है, लेकिन पूर्व माओवादी महिलाओं का कहना है कि उन्हें सिलाई प्रशिक्षण के नाम पर धोखे से सुकमा से रायपुर ले जाया गया और वहां रैंप वॉक की ट्रेनिंग देकर इस कार्यक्रम में शामिल करवाया गया.

नॉर्थईस्ट डायरी: असम-मेघालय सीमा पर कुलसी बांध परियोजना के ख़िलाफ़ प्रदर्शन, रद्द करने की मांग

इस हफ्ते नॉर्थ ईस्ट डायरी में असम, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम और मेघालय के प्रमुख समाचार.

सरकारी आयोजनों में आदिवासी नृत्य: संस्कृति का सम्मान या दिल बहलाने का तमाशा?

विश्व आदिवासी दिवस पर विशेष: देश के सबसे बड़े नेता के सामने हज़ारों आदिवासियों से उनका पारंपरिक नृत्य करवाने की मानसिकता ब्रिटिश काल से जुड़ती है, जब आदिवासी समुदायों को ‘मुख्यधारा’ से अलग देखा जाता था, और उनके पहनावे व कला को 'प्रदर्शनी' की तरह पेश किया जाता था. आज सरकारी आयोजनों में आदिवासियों को एक जैसी पोशाक पहनाकर नचवाना, उसी औपनिवेशिक मानसिकता का विस्तार है.

यूसीसी पर अमित शाह का बयान: आश्वासन और आशंकाओं के बीच आदिवासी अधिकारों का सवाल

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का कोई प्रावधान आदिवासी समुदायों पर लागू नहीं होगा. हालांकि, आदिवासी संगठनों के बीच इस क़ानून को लेकर लंबे समय से आशंकाएं बनी हुई हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या केवल राजनीतिक आश्वासन पर्याप्त हैं, या आदिवासी अधिकारों की संवैधानिक और क़ानूनी सुरक्षा को लेकर स्पष्ट गारंटी की आवश्यकता है.

असम सीएम की सौ एफआईआर की धमकियों पर हर्ष मंदर बोले- अल्पसंख्यकों के लिए काम करता रहूंगा

सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने असम सीएम हिमंता बिस्वा शर्मा के ‘मिया मुस्लिमों’ – यानी बांग्ला भाषी मुसलमानों – पर की गई विवादास्पद टिप्पणियों के लिए दिल्ली के हौज़ खास थाने में शिकायत दर्ज कराई थी. इसके जवाब में शर्मा ने मंदर के ख़िलाफ़ सौ केस दर्ज कराने की बात कही है. इस पर मंदर ने कहा कि इन धमकियों का उनके काम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा. वह बुलंदी से काम करेंगे.

माओवादी कमज़ोर, माइनिंग मज़बूत: विकसित होने की दौड़ में दांव पर बस्तर के जंगल

माओवाद ख़त्म किए जाने के सरकारी दावों के बीच छत्तीसगढ़ का आदिवासी बहुल बस्तर क्षेत्र अब निवेश का नया केंद्र बनकर उभर रहा है. हालांकि स्थानीय आदिवासी उनके जंगल और ज़मीन छिन जाने को लेकर आशंकित हैं.

देश, इस बरस: विकसित भारत में बदहाल रेलवे

2025 में विभिन्न दुर्घटनाएं हुईं और रेलवे भी इससे अछूता नहीं रहा. भारत जैसे देश में रेलवे सिर्फ एक परिवहन व्यवस्था नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक जीवन की धुरी है. उसकी बदहाली महज़ एक व्यवस्था की नाकामी नहीं, बल्कि आम जनता के विश्वास और अधिकारों पर चोट है.

जब बस्तर नक्सल मुक्त हो जाएगा, तब क्या होगा?

देश में माओवाद के ख़त्म होने की चर्चाएं तेज़ हैं, और दावा किया जा रहा है कि यह विकास की शुरुआत है. लेकिन माओवाद प्रभावित क्षेत्रों का आदिवासी समाज अपने जल-जंगल-ज़मीन को लेकर चिंतित है. खनन, सैन्य कैंपों के विस्तार और संसाधनों पर बढ़ते कॉरपोरेट दावों के बीच उनके अधिकारों और भविष्य की सुरक्षा पर बड़े सवाल खड़े हैं.

बस्तर से फ़िलीपींस तक – वही ख़ूबसूरत जंगल और वही आदिवासी संघर्ष

दुनिया भर में सरकारें और निजी कंपनियां मूलवासियों को उनके जल-जंगल-जमीन से बेदखल करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं. और उन्हीं आदिवासियों को पर्यटकों के मनोरंजन की वस्तु बना दिया जा रहा है.

मोस्ट वांटेड या आदिवासी नायक? माओवादी नेता माड़वी हिड़मा के अंतिम संस्कार के लिए उमड़े लोग

माड़वी हिड़मा पुलिस के दस्तावेज़ों में मोस्ट वांटेड नक्सली था, लेकिन आम लोगों के लिए हीरो था, जिसने अपने जल-जंगल-जमीन के लिए हथियार उठाया था. ग्रामीण आरोप लगा रहे हैं कि हिड़मा को मुठभेड़ में नहीं, बल्कि हिरासत में लेकर मारा गया है.  

आंध्र प्रदेश: कथित मुठभेड़ में चर्चित माओवादी नेता माड़वी हिड़मा की मृत्यु

हिड़मा माओवादियों की सेंट्रल कमेटी के युवा सदस्य थे और दंडकारण्य स्पशेल जोनल कमेटी के सचिव बनने वाले पहले आदिवासी नेता थे. उनकी मृत्यु माओवादी पार्टी के उस धड़े के लिए बहुत बड़ा झटका है, जो सशस्त्र संघर्ष जारी रखना चाहता है.

दो गुटों में बंटे माओवादी: एक चाहता है शांति और आत्म-समर्पण, दूसरे ने कहा-आप अपने हथियार हमें सौंप दो

मओवादियों के बीच गहरे मतभेद पनप चुके हैं. अगर एक गुट हथियार डालना चाहता है, दूसरा कह रहा है कि अपने हथियार पुलिस को देने के बजाय हमें सौंप दो, नहीं तो हमारे लड़ाके आपसे छीन लेंगे.

माओवादी हथियार नहीं त्याग रहे, तेलंगाना राज्य कमेटी ने किया अफ़वाहों का खंडन

माओवादियों की तेलंगाना राज्य कमेटी ने पार्टी प्रवक्ता अभय उर्फ सोनू के हालिया बयान से उपजे उन कयासों पर विराम लगा दिया है कि पार्टी हथियारबंद संघर्ष को त्यागकर और हथियार डालने जा रही है. कहा कि यह किसी एक नेता की व्यक्तिगत राय हो सकती है, पार्टी का मत नहीं है.

क्या माओवादी संगठन दो गुटों में विभाजित हो चुका है? क्या एक गुट हथियार डाल रहा है?

अगर माओवादी हथियार डाल देते हैं, तो उनके आगामी क्रियाकलाप क्या होंगे? क्या वे किसी राजनीतिक दल के साथ जुड़ जाएंगे, जिन्हें वे अब तक प्रतिक्रियावादी और बुर्जुआ कहते आ रहे हैं, या अपनी नई पार्टी बना लेंगे?

गढ़चिरौली में बढ़ती माइनिंग, नष्ट होता आदिवासी जीवन

हमने अपनी पिछली ख़बर में माओवादियों के बाद उभरते दंडकारण्य के बदलते चेहरे को गढ़चिरौली के माध्यम से दिखाया था. जैसे-जैसे माओवादी आंदोलन सिमटता जा रहा है, आदिवासी इलाकों में माइनिंग कंपनियां आ रही हैं. यह क़िस्त इस प्रक्रिया के पर्यावरण और सामाजिक जीवन पर पड़ते प्रभाव की पड़ताल करती है.

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