नई दिल्ली: सरकार ने संसद को बताया है कि पिछले पांच वर्षों में कितनी आरटीआई अर्ज़ियां बिना जवाब लौटाई गईं या जिनमें जानकारी देने से मना किया गया, इस बारे में कोई डेटा उपलब्ध नहीं है, क्योंकि केंद्रीय सूचना आयोग ऐसा डेटा इकट्ठा नहीं करता.
राज्यसभा में एक लिखित प्रश्न में तृणमूल कांग्रेस के सांसद ऋतब्रत बनर्जी ने पूछा था कि पिछले पांच वर्षों में आरटीआई क़ानून, 2005 के तहत कितनी अर्ज़ियां दायर हुईं, कितनी अर्ज़ियां खारिज की गईं, कितनी अर्ज़ियां बिना जवाब रहीं या जिनमें सूचना नहीं दी गई, और साल दर साल कितनी अर्ज़ियों का जवाब दिया गया, इसका विवरण क्या है.
बिना जवाब रह गईं या जिनमें सूचना देने से मना किया गया, ऐसी अर्ज़ियों की संख्या से जुड़े सवाल के जवाब में कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन राज्य मंत्री तथा प्रधानमंत्री कार्यालय में मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि ‘केंद्रीय सूचना आयोग ने सूचित किया है कि वे ऐसा कोई डेटा संकलित नहीं करते.’
हालांकि, अपने जवाब में सिंह ने दायर, खारिज और उत्तर दी गई आरटीआई अर्ज़ियों का आंकड़ा उपलब्ध कराया. उन्होंने बताया कि कुल 17,50,863 आरटीआई अर्ज़ियां दायर हुईं, 67,615 खारिज की गईं और 14,30,031 का जवाब दिया गया.
सिंह ने यह भी बताया कि वर्ष 2022-2023 में 16,38,784 आरटीआई अर्ज़ियां दायर हुईं, जिनमें से 52,662 खारिज हुईं और 13,15,222 का जवाब दिया गया.
वर्ष 2021-2022 में कुल 14,21,226 अर्ज़ियां दायर हुईं, जिनमें से 53,733 खारिज हुईं और 11,31,757 का जवाब दिया गया.
उनके जवाब में बताया गया कि 2020-2021 में 13,33,802 और 2019-2020 में 13,74,315 आरटीआई आवेदन दायर किए गए थे. 2019-20 में 10,86,657 आवेदनों का जवाब दिया गया, जबकि उस वर्ष कितने आवेदनों के जवाब दिए गए, इसका विस्तृत डेटा उपलब्ध नहीं है.
इस तरह केंद्र सरकार ने यह डेटा उपलब्ध नहीं कराया कि किन-किन आरटीआई आवेदनों में जानकारी देने से मना किया गया.
यह मुद्दा हाल ही में इसलिए चर्चा में आया क्योंकि डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट, 2023 को पिछले महीने चरणबद्ध तरीके से लागू करने के लिए अधिसूचित किया गया है. इस कानून की धारा 44(3), आरटीआई एक्ट की धारा 8(1)(j) में संशोधन करती है, जिसके तहत अब सभी व्यक्तिगत जानकारी को सार्वजनिक करने से छूट मिल जाती है.
इसके अलावा, केंद्रीय सूचना आयोग 14 सितंबर से सिर्फ दो सूचना आयुक्तों के साथ काम कर रहा है, जबकि मुख्य सूचना आयुक्त और आठ सूचना आयुक्तों के पद खाली पड़े हैं.
पारदर्शिता के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस स्थिति ने ऐसा माहौल बना दिया है जो आरटीआई कानून के मूल उद्देश्य को ही कमजोर कर देता है.
