नई दिल्ली: मेरे घर में बच्चा बीमार है, उसकी दवाई के पैसे नहीं हैं. बीते तीन महीने से सरकार ने कोई पैसा नहीं दिया, काम और बढ़ा दिया है. कुछ बोलो तो नौकरी से निकालने की धमकी देते हैं, क्या सरकार को हमारी याद सिर्फ चुनाव के समय वोट के लिए आती है.
ये दर्द हरियाणा के एक मिड डे मिल कार्यकर्ता का है, जो अपने घर में अकेले कमाने वाली महिला हैं और बीते कई महीने से मानदेय न मिलने से परेशान हैं. वे अपने बीमार बच्चे को घर पर छोड़कर, आठ दिसंबर को प्रदेशव्यापी मिड डे मिल कार्यकर्ताओं के महापड़ाव प्रदर्शन में हिस्सा लेने पहुंची थीं, जिससे उन्हें उम्मीद है कि शायद उनका पैसा जल्दी मिल जाए.
हरियाणा के लगभग हर ज़िले में महिला स्कीम वर्कर्स, जिसमें आंगनबाड़ी, मिड डे मील और आशा कार्यकर्ता-सहायिका (जो आशा कार्यकर्ताओं की उनके काम में मदद करती हैं) शामिल हैं, अपनी मांगों को सरकार तक पहुंचाने की कोशिश कर रही हैं. इसी कड़ी में इन कार्यकर्ताओं ने 6-8 दिसंबर के बीच सड़क से लेकर केंद्रीय मंत्रियों और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सांसदों के कार्यालयों के बाहर धरना दिया, ज्ञापन सौंपे और डबल इंजन सरकार को उनके चुनावी वादों की याद भी दिलाई.
प्रदर्शन में शामिल कई मिड डे मील कार्यकर्ताओं ने द वायर हिंदी को बताया कि वे समाज के सबसे गरीब तबकों से काम करने आती हैं. फिर भी इस आसमान छूती महंगाई में उन्हें केवल सात हज़ार रुपये प्रतिमाह मिलता है और वो भी साल में सिर्फ दस महीने. इस पैसे में वे जैसे-तैसे गुजारा करने को मजबूर हैं. लेकिन सरकार उन्हें ये पैसे भी समय से नहीं दे रही. ऐसे में उनके पास प्रदर्शन करने के अलावा कोई रास्ता नहीं है.

‘नए लेबर कोड स्कीम वर्कर्स के लिए और मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं’
इस संबंध में सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन्स के हरियाणा महासचिव जय भगवान बताते हैं, ‘पूरे हरियाणा में करीब 30 हज़ार मिड डे मिल कार्यकर्ता हैं, जिन्हें अक्सर ही मानदेय को लेकर समस्याओं का सामना करना पड़ता है. कभी तीन, तो कभी छह महीने बाद इन्हें पैसे मिलते हैं. सालों से इस सरकारी योजना से जुड़ने के बावजूद इनके काम को लेकर कोई सुरक्षा नहीं है.’
जयभगवान आगे बताते हैं कि नए लेबर कोड स्कीम वर्कर्स के लिए और मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं. कहां तो ये लोग न्यूनतम वेतन और स्थाई करने की मांग कर रही हैं, और कहां अब सरकार नए कानून में इन सबकी धज्जियां उड़ा रही है. जब चुनाव आते हैं, तो सरकार महिलाओं को लेकर तमाम वादे कर देती है. बिहार में उनके खाते में चुनाव से पहले ही पैसे भी पहुंचा दिए गए, लेकिन जो महिलाएं सालों से सरकारी योजनाओं से जुड़ी हुई हैं. उनके लिए सरकार के पास कुछ नहीं है.
इस प्रदर्शन में शामिल आंगनबाड़ी कार्यकर्ता पुष्पा दलाल कहती हैं, ‘मोदी सरकार ने 2018 में हमारा मानदेय बढ़ाने का वादा किया था, जो आज तक नहीं मिला. सुप्रीम कोर्ट ने लंबी लड़ाई के बाद ग्रेच्युटी का हक़ दिया, वो भी अभी तक लागू नहीं हुआ. और ये सरकार महिला हितैषी होने का दावा करती है. ये सब चुनाव का खेल है.’
इसी तरह रूपा बताती हैं कि आंगनबाड़ी केंद्रों में बड़ी संख्या में पद खाली पड़े हैं लेकिन सरकार कोई भर्ती नहीं कर रही. जो महिलाएं काम कर रही हैं, उन्हीं पर काम का बोझ बढ़ा दिया जा रहा है. आंगनबाड़ी केंद्रों पर राशन तक उपलब्ध नहीं है, सारी खाना-पूर्ती सिर्फ कागज़ों पर करवाई जा रही है.

‘सरकार सारे काम डिजिटल मोड में चाहती है, लेकिन उसके लिए कोई सुविधा नहीं दे रही’
बिजनेश का कहना है कि सरकार सारे काम डिजिटल मोड में करवाना चाहती है, लेकिन उसके लिए कोई सुविधा नहीं दे रही. पोषण ट्रैकर ऐप स्मार्ट फोन में खुलते हैं, लेकिन सरकार ने जो फोन कार्यकर्ताओं को उपलब्ध करवाए हैं, उनमें ये सही से काम ही नहीं कर पाते. कार्यकर्ता अपने घर से पैसे लगाकर फोन ले रही हैं. किसी ऐप या ऑनलाइन काम के संबंधी उन्हें कोई बेसिक ट्रेनिंग भी नहीं दी गई.’
बिजनेश आगे बताती हैं, ‘जब आंगनबाड़ी कार्यकर्ता फील्ड में काम करने जाती हैं, तो लाभार्थी उन्हें ओटीपी नहीं देते, ये सोचकर कि हमारे बैंक खाते के साथ कोई फ्रॉड न हो जाए. इसके अलावा 30-40 मिनट के बीच में एक फोटो कैप्चर होता है, लाभार्थी इतना समय नहीं देना चाहते. आंगनबाड़ी केंद्रों पर राशन और सिलेंडर की सुविधा समय से नहीं आती, जिसके चलते हम कार्यकर्ता लोगों के गुस्से का भी शिकार होते हैं.’
आंगनबाड़ी कार्यकर्ता सहायिका यूनियन के अनुसार, हरियाणा में करीब 25 से 26 हज़ार आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हैं. वहीं, 24 से 25 हज़ार सहायिकाएं हैं. इनमें आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को जहां 14 हज़ार के करीब मानदेय मिलता है, वहीं सहायिकाओं को करीब 7 हज़ार का भुगतान किया जाता है. इसमें 2,700 रुपये कार्यकर्ताओं को और 1,350 रुपये सहायिकाओं को केंद्र सरकार की ओर से दिए जाते हैं. बाकी राशि राज्य सरकार भुगतान करती है.

मिड डे मिल और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के साथ ही राज्य की आशा कार्यकर्ताओं की भी स्थिति खराब है. ये कार्यकर्ता सिलसिलेवार तरीके से विरोध प्रदर्शन और हड़तालें करती रही हैं, लेकिन इनका आरोप है कि पहले मनोहरलाल खट्टर और नायब सिंह सैनी दोनों ही सरकारों में सिवाय आश्वासन के अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है.
इस संबंध में आशा कार्यकर्ता लक्ष्मी बताती हैं, ‘हम सभी महिलाएं सालों से स्वास्थ्य सेवा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. लेकिन हमें न तो स्थाई कर्मचारी का दर्जा मिलता है और न ही उचित मानदेय. मोदी सरकार ने 1,500 रुपये की प्रोत्साहन राशि बढ़ोतरी की बात कही थी, वो भी अभी तक नहीं मिल पाई है. इसके साथ ही ऑनलाइन काम का बोझ और बढ़ा दिया गया है, जिसके लिए न तो डिजिटल उपकरण और न ही उचित डेटा की सेवाएं उपलब्ध हैं.
एक अन्य आशा कार्यकर्ता सीमा कहती हैं कि वे कई सालों से अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन में शामिल हो रही हैं, लेकिन सरकार के कानों में जूं तक नहीं रेंग रही है. जब चुनाव आते हैं, सरकार वादे भी ले आती है, लेकिन जीतने के बाद आशाकर्मियों की कोई बात तक सुनने को तैयार नहीं होता.
सीमा बताती हैं कि कोरोना के दौरान सभी आशा कार्यकर्ताओं ने फ्रंटलाइन वर्कर्स के तौर पर काम किया था, हमें अपने उत्कृष्ट काम के लिए डब्लूएचओ द्वारा ‘ग्लोबल हेल्थ लीडर’ का पुरस्कार भी दिया गया. मोदी सरकार ने ताली-थाली बजवाई, लेकिन हमारी और हमारे काम दोनों की सुरक्षा के लिए कुछ नहीं किया. अक्सर आशाओं से अपने काम के अलावा बाकी विभागों के काम भी करवाए जाते हैं. काम के सिलसिले में आने-जाने का कोई खर्च नहीं दिया जाता. काम से निकालने की धमकी और दी जाती है.

‘आशाओं के बढ़ते काम के बोझ के चलते नियमित काम प्रभावित’
आशा वर्कर यूनियन की अध्यक्ष सुनीता के अनुसार, ऑनलाइन काम टेक्निकल काम का हिस्सा है. आशाओं को भर्ती करते समय और न ही आज, ऐसी कोई ट्रेनिंग दी गई है. ये हमारे काम का हिस्सा नहीं है. अन्य काम करने के चक्कर में आशाओं के नियमित काम प्रभावित हो रहे हैं और इसका नतीजा है कि प्रदेश में जच्चा-बच्चा यानी मां और नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया जा रहा. इनके मौत के मामले बढ़ रहे हैं, जो काफी चिंताजनक है. इसके अलावा इनमें खून की कमी देखी जा रही है.’
सुनीता बताती हैं कि हरियाणा सरकार ने 2023 में आशाओं के हड़ताल के दौरान जो 73 दिन के पैसे काटे थे, वे अभी तक आशाओं को दिए नहीं गए हैं. इसके अलावा केंद्र सरकार का कहना है कि आशा कार्यकर्ताओं के मानदेय में 1500 रुपये की बढ़ोतरी की गई है, लेकिन ये धरातल पर लागू नहीं है.
संगठन के मुताबिक, हरियाणा में करीब बीस हज़ार आशा कार्यकर्ता हैं, जिन्हें सरकार स्वैच्छिक सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता मानती है. इन्हें अपने कार्य के आधार पर 8 से 9 हज़ार के बीच में पारिश्रमिक दिया जाता है. इसमें केंद्र सरकार की ओर से 2000 रुपये मिलते हैं, जबकि राज्य सरकार 4,100 रुपये स्थाई तौर पर देती है. बाकी इनके काम यानी प्रसूति, टीकाकरण आदि के आधार पर लाभ दिए जाते हैं.
आशा कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार ने इनके भुगतान से जुड़ा एक ऐप भी कई साल पहले शुरू किया था, लेकिन ये आज तक ठीक तरीके से काम में नहीं लाया जा सका है.
गौरतलब है कि हरियाणा में ये स्कीम वर्कर्स बच्चों की शिक्षा, पोषण और स्वास्थ्य से जुड़े महत्वपूर्ण काम देखती हैं, जो केंद्र सरकार की योजनाओं से संबंधित हैं. इन कार्यकर्ताओं का कहना है कि बीते दस साल से मोदी सरकार ने मिड डे मिल और पांच साल से आंगनबाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं के मानदेय में कोई बढ़ोतरी नहीं की है. राज्य सरकार ने भी सिर्फ नाम के लिए मामूली से बढ़ोतरी की है, जो नाकाफ़ी है.
गौरतलब है कि ये सभी कार्यकर्ता बीते लंबे समय से स्थाईकरण, मानदेय बढ़ोतरी, महंगाई भत्ता, वर्दी का पैसा, एरियर, केंद्रों का किराया, ग्रेच्यूटी, एक्सग्रेसिया, पीएफ सहित सभी सामाजिक सुरक्षा लाभ आदि की मांग कर रही हैं. इनका आरोप है कि राज्य सरकार लगातार इसे नज़रअंदाज़ करती रही है. कई प्रदर्शन और हड़ताल के बावजूद बीते सालों में सरकार ने इनके काम का बोझ तो लगभग दोगुना कर दिया है, लेकिन इंसेंटिव आज भी इन्हें वही पुराने वाले दिए जा रहे हैं.
