नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने संसद में कहा है कि ‘वायु प्रदूषण के कारण ही होने वाली मौतों या बीमारियों का सीधा संबंध स्थापित करने के लिए देश में कोई ठोस राष्ट्रीय आंकड़ा उपलब्ध नहीं है.’ ऐसे समय में जब देश के कई शहरों और विशेष रूप से राष्ट्रीय राजधानी में प्रदूषण गंभीर चिंता और खराब स्वास्थ्य का कारण बना हुआ है.
दिल्ली की हवा में प्रदूषकों का स्तर बढ़ने को लेकर लोगों ने विरोध प्रदर्शन किए, जिन्हें कानून-व्यवस्था एजेंसियों ने सख्ती से दबा दिया. इस बीच, विरोध प्रदर्शन के दौरान माओवादी समर्थक नारे लगाने के आरोप में गिरफ्तार किए गए दिल्ली यूनिवर्सिटी के 10 छात्रों को ज़मानत मिल गई है.
तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओ’ब्रायन के एक प्रश्न के जवाब में स्वास्थ्य राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने कहा कि ‘वायु प्रदूषण सांस संबंधी रोगों और उनसे जुड़ी बीमारियों के लिए एक बड़ा (ट्रिगरिंग) कारक है.’
ओब्रायन ने पूछा था कि क्या स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री यह बताने की कृपा करेंगे कि — (क) क्या यह तथ्य है कि 2022 में देश में पीएम 2.5 के कारण 17 लाख से ज़्यादा लोगों की मौत हुई.
(ख) क्या यह भी तथ्य है कि बाहरी वायु प्रदूषण के कारण जीडीपी का लगभग 9.5 प्रतिशत नुकसान हुआ
(ग) पिछले पांच सालों में वायु प्रदूषण से हुई मौतों का राज्य/केंद्र शासित प्रदेश-वार सरकार का आधिकारिक अनुमान
(घ) क्या सरकार ने वायु प्रदूषण से हुए आर्थिक नुकसान का आकलन किया है, यदि हां तो उसका विवरण
(ङ) क्या पीएम 2.5 के असर को कम करने के लिए समयबद्ध लक्ष्यों के साथ कोई योजना बनाई गई है, यदि हां तो उसका विवरण?
जवाब में जाधव ने कहा, ‘देश में ऐसा कोई ठोस डेटा उपलब्ध नहीं है, जिससे वायु प्रदूषण के कारण ही होने वाली मौतों/बीमारियों का प्रत्यक्ष संबंध स्थापित किया जा सके. वायु प्रदूषण सांस संबंधी रोगों और संबंधित बीमारियों के लिए एक बड़ा कारण है.’
इसके बाद उन्होंने मानव शरीर पर वायु प्रदूषण के असर के लिए कई वजहों को जिम्मेदार ठहराया और कहा, ‘वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य पर प्रभाव कई वजहों का मिलाजुला असर होता है, जिसमें खाने की आदतों, काम की आदतों, सामाजिक-आर्थिक स्थिति, चिकित्सकीय इतिहास, प्रतिरोधक क्षमता, आनुवंशिकता आदि शामिल हैं.’
जाधव ने वायु प्रदूषण से निपटने के लिए केंद्र सरकार द्वारा उठाए गए ‘कई कदमों’ की सूची दी. इसमें राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन एवं मानव स्वास्थ्य कार्यक्रम (एनपीसीसीएचएच) के क्रियान्वयन का हवाला दिया गया, जिसके तहत वायु प्रदूषण से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं के लिए ‘हेल्थ एडॉप्टेशन प्लान’ और सभी 36 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के लिए जलवायु परिवर्तन और मानव स्वास्थ्य पर ‘राज्य कार्य योजना’ बनाया गया है.
सरकार ने कहा, ‘इस राज्य-विशिष्ट कार्य योजना में वायु प्रदूषण पर एक समर्पित अध्याय शामिल है, जिसमें इसके प्रभाव को कम करने के लिए हस्तक्षेप सुझाए गए हैं.’
केंद्र सरकार ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को जारी स्वास्थ्य मंत्रालय की जन-स्वास्थ्य सलाहों का भी उल्लेख किया, जिनमें ‘वायु प्रदूषण के प्रभाव को कम करने के तरीके’ सुझाए गए हैं, साथ ही विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून), स्वच्छ नीले आकाश के लिए अंतरराष्ट्रीय स्वच्छ वायु दिवस (7 सितंबर) और राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस (2 दिसंबर) जैसे अवसरों पर राष्ट्रीय जन-जागरूकता अभियानों का भी उल्लेख किया.
सरकार ने यह भी दावा किया कि उसने कार्यक्रम प्रबंधकों, चिकित्सा अधिकारियों और नर्सों, नोडल अधिकारियों, महिलाओं और बच्चों से जुड़े कर्मियों, ट्रैफिक पुलिस, आशा जैसी फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं आदि के लिए ‘समर्पित प्रशिक्षण मॉड्यूल’ विकसित किए हैं.
साथ ही, वायु प्रदूषण से जुड़ी बीमारियों पर संचार सामग्री, राज्य-स्तरीय प्रशिक्षकों के लिए क्षमता निर्माण कार्यशालाएं, अर्ली वार्निंग सिस्टम, स्वच्छ भारत मिशन और प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना का भी हवाला दिया गया, जिसका उद्देश्य ‘स्वच्छ खाना पकाने का ईंधन उपलब्ध कराकर महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य की रक्षा करना’ है.
सरकार ने अपने जवाब में यह भी कहा कि पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 2019 में राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम) शुरू किया है, जो देशभर में वायु प्रदूषण के स्तर को कम करने की राष्ट्रीय स्तरीय रणनीति है.
बता दें कि हाल ही में ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज (जीबीडी) के नवीनतम आंकड़ों के विश्लेषण में सामने आया था कि वायु प्रदूषण दिल्लीवासियों के लिए स्वास्थ्य का सबसे बड़ा खतरा बना हुआ है, जो 2023 में होने वाली सभी मौतों का लगभग 15% हिस्सा है.
इससे पहले ‘लांसेट काउंटडाउन ऑन हेल्थ एंड क्लाइमेट चेंज’ की नौवीं रिपोर्ट में बताया गया कि साल 2022 में भारत में वायु प्रदूषण से जुड़ी 17.18 लाख से अधिक मौतें हुईं, यह संख्या 2010 की तुलना में 38 फीसदी अधिक है.
यह रिपोर्ट उस समय सामने आई, जब दिल्ली-एनसीआर एक बार फिर जहरीली हवा की चपेट में है, और आंकड़े बता रहे हैं कि राजधानी की हवा में सांस लेना रोजाना 10 सिगरेट पीने जितना खतरनाक हो गया है.
