‘बंदे मातरम’ पर बहस के बाद नेहरू का क़द कहीं अधिक बड़ा हो गया है

1937 में कांग्रेस की कार्यसमिति द्वारा बंदे मातरम के एक अंश को (ही) स्वीकार करने से जुड़ी छिद्रान्वेषण से भरी वे सभी अतार्किक बातें स्वत: समाप्त हो जानी चाहिए थीं, जिनका सहारा लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत सप्ताह इस गीत के डेढ़ सौ वर्ष पूरे होने के सिलसिले में लोकसभा में नेहरू को खलनायक बनाने के लिए उनके प्रति दुर्भावनाओं का एक और खेल खेलने की विफल कोशिश की.

PM visits the exhibition organised to commemorate 150 years of the national song “Vande Mataram” at the Indira Gandhi Indoor Stadium, in New Delhi on November 07, 2025.

(वंदे मातरम के मूल बांग्ला स्वरूप को ध्यान में रखते हुए लेख में बंदे मातरम शब्द प्रयुक्त किया गया है.)

‘कुछ मुसलमानों द्वारा बंदे मातरम का विरोध किए जाने का कोई सवाल नहीं है और हममें से ज्यादातर लोगों पर यहां इस बात का कोई असर नहीं है. …(लेकिन क्या किया जाए कि) हममें से ज्यादातर लोग बड़ी शिद्दत से महसूस करते हैं कि मौजूदा संदर्भ में बंदेमातरम राष्ट्रगान बनाने के लिए सर्वथा अनुपयुक्त है….हां, जहां तक जन-गण-मन को राष्ट्रगान बनाए जाने का सवाल है तो मामला निश्चित तौर पर संविधान सभा ही तय करेगी….बंदे मातरम हमारी आजादी की लड़ाई से जुड़ा हुआ गीत है और रहेगा. इसे इसी के अनुरूप सम्मान दिया जाएगा.’

1948 में 15 जून को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ये बातें पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बिधानचंद्र राय को उस पत्र में लिखी थीं, जो राय द्वारा तीन दिन पहले 12 जून को उन्हें भेजे गए पत्र का जवाब था.

दरअसल, उस वक्त मध्य प्रांत के बाद पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बिधानचंद्र राय भी ‘बंदे मातरम’ को राष्ट्रगान बनाने के पक्ष में उठ खड़े हुए थे और इसे बंदे मातरम का पक्ष बहुत मजबूत हो जाने के रूप में देखा जा रहा था. इस कारण और कि राय ने नेहरू को अपने उक्त पत्र में यह लिखने से भी परहेज़ नहीं किया था कि भले ही कुछ मुसलमान इसका विरोध करें, तब भी बंदे मातरम को ही राष्ट्रगान बनाया जाए.

उनका यह लिखना इस अर्थ में बहुत स्वाभाविक था कि ‘बंदे मातरम’ में इस्तेमाल अधिकतर प्रतीक बंगाल से ही संबंधित थे और कई लोगों के अनुसार वह ‘बंगाल का राष्ट्रगान’ होने के लिए सर्वथा उपयुक्त था. ऐसे में, राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में, स्वाभाविक ही, बिधानचंद्र राय उसे लेकर बहुत भावुक थे. नेहरू ने इस बात को समझते हुए बिना देर किए राय को जवाबी पत्र में उक्त बातें तो लिखीं ही थीं, यह भी लिखा था कि राष्ट्रगान (का मामला) संघर्ष और रिश्ते को दिखाने वाली उन चीजों से अलग है, जिनका ‘बंदे मातरम’ प्रतिनिधित्व करता है.

उन्होंने लिखा था:

राष्ट्रगान विजय और उससे मिली संतुष्टि का प्रतीक होना चाहिए, न कि अतीत के संघर्ष का. राष्ट्रगान मुख्य रूप से संगीत है न कि शब्द. इसका संगीत ऐसा होना चाहिए, जो जोश दिलाए और जिसे संतोषजनक ढंग से पूरी दुनिया में कहीं भी बजाया जा सके….राष्ट्रगान को देश की तुलना में विदेश में ज्यादा बजाया जाना होता है. हमारे हर दूतावास को, विदेश कार्यालय को इसे बजाना होता है…(इस लिहाज से) जन-गण-मन हमारे खास प्रयास के बिना ही सुर्खियों में आ गया है….जहां तक बंदे मातरम की भाषा का सवाल है, तो ज्यादातर लोग इसे समझ नहीं पाते. निश्चित तौर पर मैं भी इसे समझ नहीं पाता.

(आखिरी दो वाक्य कितने प्रामाणिक हैं, इसे इस तथ्य से समझ सकते हैं कि आज की तारीख में बंदे मातरम को राष्ट्रगान बनाने के अनेक प्रचंड समर्थक भी, पूरा कौन कहे, उसकी चार छह पंक्तियां तक न कंठाग्र रख पाते हैं, न सही-सही पढ़ पाते हैं.)

इतिहास गवाह है कि नेहरू अपने इस तार्किक और समावेशी रवैये से बिधानचंद्र राय को सहमत करने में सफल रहे थे, जिसके बाद आम सहमति के माहौल में देश ने जन-गण-मन को राष्ट्रगान और बंदे मातरम को राष्ट्रगीत के रूप में सहर्ष अंगीकार कर लिया था.

कायदे से इसके बाद 1937 में कांग्रेस की कार्यसमिति द्वारा बंदे मातरम के एक अंश को (ही) स्वीकार करने से जुड़ी छिद्रान्वेषण से भरी वे सभी अतार्किक बातें स्वत: समाप्त हो जानी चाहिए थीं, जिनका सहारा लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत सोमवार को इस गीत के डेढ़ सौ वर्ष पूरे होने के सिलसिले में लोकसभा में हुई बहस शुरू करते हुए नेहरू पर मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना के ऐतराजों के मद्देनजर बंदे मातरम को खंडित करने का ‘महाभियोग’ लगाया. साथ ही, उनको खलनायक बनाने के लिए उनके प्रति दुर्भावनाओं का एक और खेल खेलने की विफल कोशिश की.

काश, वे समझ सकते कि उनके इस ‘महाभियोग’ की सबसे बड़ी बेहिसी यह थी कि संविधान सभा ने देश के गणतंत्र बनने से महज दो दिन पहले 26 जनवरी, 1950 को रवींद्रनाथ टैगोर के जन-गण-मन को भी पूरा का पूरा नहीं, उसके एक अंश को ही राष्ट्रगान घोषित किया था, वैसे ही जैसे ‘बंदे मातरम’ के एक अंश को राष्ट्रीय गान का गौरव प्रदान किया था.

लेकिन विडंबना यह कि देश में उस वक्त भी ऐसे विघ्नसंतोषी थे और आज तो वे सत्ता में हैं, जिन्हें अपने छिद्रान्वेषण को किसी भी मोड़ पर लगाम लगाना गवारा नहीं होता. उल्टे उसे बेलगाम रखने में मजा आता है.

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यह विश्वास करने के कारण हैं कि इस मजे के लिए ही उन्होंने दूसरी ज्वलंत समस्याओं को दरकिनार कर संसद में ‘बंदे मातरम’ के डेढ़ सौ वर्षों पर चर्चा को जरूरी समझा. शायद उन्हें उम्मीद थी कि नेहरू के इस संसार को अलविदा कहने के छह दशकों बाद ही सही, इस बिना पर वे देश के इतिहास को उनके प्रति निर्मम बनाकर उन्हें खलनायक करार देने का करिश्मा कर दिखाने में सफल हो जाएंगे.

तभी तो नेहरू की हेठी करने के फेर में उनकी ओर से अनेक ऐसी बातें भी कहीं गईं, जो ‘जन-गण-मन’ की हेठी तक जाती थीं. ‘बंदे मातरम’ के मुकाबले उसके राष्ट्रगान बनने की पात्रता को प्रश्नांकित करने का इसके अलावा भला और क्या अर्थ हो सकता है?वह तो उनकी विवशता थी और है कि उनके पास नेहरू के उन तर्कों के जवाब ही नहीं, जो उन्होंने बिधानचंद्र राय को पत्र में इन दोनों गीतों की राष्ट्रगान बनने की पात्रता की तुलना करते हुए दिए थे. वरना वे जानें और क्या करते!

इस बहस में विपक्ष के नेताओं ने ठीक ही कहा कि सत्तापक्ष को इस बहस की मार्फत ‘बंदे मातरम’ की अतिरिक्त प्रतिष्ठा कतई अभीष्ट नहीं थी. इसलिए कि आजादी की लड़ाई की त्याग व बलिदान की जिस परंपरा से बंदे मातरम निकला और जिसे लगातार मजबूत करते रहने में उसने उल्लेखनीय भूमिका निभाई, उसमें इस पक्ष का कभी कोई हिस्सा ही नहीं रहा.

इसके पास तो राज्यसभा सदस्य संजय सिंह द्वारा पूछे गए इस सवाल का भी उत्तर नहीं कि वह अपने पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चार ऐसे नेताओं के नाम बताए जो ‘बंदे मातरम’ का नारा लगाकर जेल गए हों… और… वह मातृभूमि को बेचकर मातृभूमि की कैसी वंदना कर रहा है?

इसलिए उसके मुंह पर भले ही ‘बंदे मातरम’ था, उसकी निगाहें कहीं और थीं, तो निशाना कहीं और, और सबसे बड़ा लक्ष्य नेहरू का खलनायकीकरण ही था, जिससे जुड़ी उसकी कवायदें पुरानी पड़कर भी अभी तक सफल नहीं हो पाई हैं.

पूरी बहस में साफ था कि बार-बार की विफलताओं के बावजूद वह अपनी इन कवायदों को ‘नई ऊंचाई’ पर ले जाने के फेर में था और इसके लिए उसे प्रकारांतर से ‘जन-गण-मन’ को ‘बंदे मातरम’ से कमतर बताने से भी परहेज़ नहीं था. वैसे ही जैसे प्रधानमंत्री को ‘बंदे मातरम’ के रचयिता बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय को ‘बंकिम बाबू’ के बजाय ‘बंकिम दा’ कहने से नहीं था.

कांग्रेस की सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने अपने भाषण में ठीक ही कहा कि सत्तापक्ष इस बहस से दो मकसद साधना चाहता था.

इनमें पहला था: अगले साल पश्चिम बंगाल में होने जा रहे विधानसभा चुनाव में खास वर्ग व समुदाय की भावनाओं से खेलकर चुनावी लाभ उठाना.

दूसरा: जिन लोगों ने स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी, देश के लिए कुर्बानियां दीं, उन पर नए आरोप लादने का मौका तलाशना और देश का ध्यान जनता के जरूरी मुद्दों से भटकाना.

लेकिन अब सवाल है कि क्या सत्ता पक्ष इनमें से अपने किसी भी उद्देश्य को प्राप्त करने या उसकी दिशा में बढ़ने में सफल हो पाया?

और जवाब है कि ऐसा लगता तो नहीं. उलटे बहस में विपक्षी नेताओं के सवालों के सामने निरुत्तरता ने उसकी बची-खुची पोल भी खोलकर रख दी है. साफ कहें तो लम्बे अरसे बाद यह संसद में हुई ऐसी पहली बहस थी, जो सत्ता पक्ष के लिहाज से इस तरह बैक फायर कर गई कि वह उसमें फंसकर रह गया और अपने विजयी होने का दावा नहीं कर पाया.

जहां तक नेहरू का सवाल है, इस बहस के बाद वे कुछ और बड़े हो गए हैं और उनका महानायकत्व कुछ और असंदिग्ध हो गया है.

इसलिए कि यह बात अब पब्लिक डोमेन में आ गई है कि 1937 में ‘बंदे मातरम’ के सिलसिले में उनके फैसले रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर आधारित थे और टैगोर की ही सलाह पर कांग्रेस ने 1937 में फैसला किया था कि उसकी प्रमुख बैठकों में बंदे मातरम का केवल पहला भाग गाया जाएगा.

बकौल इतिहासकार व लेखक सुगत बोस:

1937 के अक्टूबर-नवंबर में कलकत्ता (अब कोलकाता) में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) की बैठक के समय सुभाषचंद्र बोस और जवाहरलाल नेहरू ने साथ मिलकर काम किया. उस समय एक बेहद संवेदनशील विषय पर रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह ली और वह था बंदे मातरम. रवींद्रनाथ की सलाह पर ही कांग्रेस ने इस एआईसीसी बैठक में निर्णय लिया कि अब से पार्टी की राष्ट्रीय बैठकों में गीत का केवल पहला भाग गाया जाएगा, जो हमारे देश के राष्ट्रीय वैभव का एक सुंदर उद्घोष है. ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि टैगोर को लगता था कि हमें अपने राष्ट्रवादी आंदोलन में एकता एवं सहमति की जरूरत है और वह विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच प्रतिद्वंद्विता नहीं चाहते थे.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)