नई दिल्ली: दिल्ली पुलिस ने 2020 के दिल्ली दंगों के पीछे ‘बड़ी साज़िश’ रचने के आरोपी लोगों की रिहाई के खिलाफ अपनी दलीलें पूरी कर ली हैं. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (10 दिसंबर) को उनकी ज़मानत याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया.
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने कहा कि वह 19 दिसंबर को शीतकालीन अवकाश पर जाने से पहले इस मामले में निर्णय सुनाना चाहती है.
सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने तर्क दिया कि आरोपियों द्वारा किए गए चक्काजाम या सड़क ब्लॉक करने का आह्वान आम राजनीतिक नारेबाज़ी नहीं थी, बल्कि उनका मकसद जरूरी सेवाओं को रोकना था.
द हिंदू के अनुसार, उन्होंने तर्क दिया कि इन आह्वानों से देश की आर्थिक सुरक्षा को खतरा था और यह यूएपीए के तहत आतंकवादी गतिविधि थी. जब जस्टिस कुमार ने पूछा कि ये आह्वान दंगों से कैसे जुड़े थे – और इस तरह यूएपीए की ‘आतंकवादी गतिविधि’ की धारा कैसे लागू होती है – तो राजू ने आरोप लगाया कि आरोपियों के उकसावे के बाद ‘ऐसी कार्रवाई हुई’, जिसके परिणामस्वरूप हिंसा भड़की.
राजू ने यह भी कहा कि आरोपी उमर ख़ालिद ने जानबूझकर दंगे शुरू होने से पहले दिल्ली छोड़ दी ताकि उनके ऊपर से शक हटाया जा सके, जबकि हिंसा में 50 से अधिक लोग मारे गए थे.
दिल्ली पुलिस का आरोप है कि गिरफ्तार आरोपी – जो इस मामले में पांच साल से अधिक समय से जेल में हैं – ने फरवरी 2020 में राजधानी में सांप्रदायिक हिंसा फैलाने की साज़िश रची. पुलिस का यह भी दावा है कि वे लोगों को इतना भड़काना चाहते थे कि ‘सत्ता परिवर्तन’ के लिए ‘हथियारबंद विद्रोह’ जैसी स्थिति पैदा हो जाए.
पुलिस का आरोप है कि उन्होंने 2019 के नागरिकता (संशोधन) अधिनियम को चुना, जिसका उन्होंने उस समय विरोध किया था, ताकि ‘शांतिपूर्ण विरोध’ के नाम पर अपने इरादों को ‘छिपाया’ जा सके.
दिल्ली पुलिस की जांच की पक्षपातपूर्ण भूमिका पर सवाल लगातार उठ रहे हैं, वहीं आरोपियों की लंबी कैद को लेकर दुनिया भर के मानवाधिकार संगठनों ने इसे न्याय का उपहास बताया है.
इससे पहले इस महीने आरोपियों ने अदालत के सामने अपनी जवाबी दलीलें पेश की थीं. उन्होंने अक्टूबर में विस्तृत ज़मानत तर्क दिए थे, जिसके बाद दिल्ली पुलिस ने पिछले महीने अपने जवाब दाख़िल किए.
दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी ज़मानत याचिकाएं 2 सितंबर को खारिज कर दी थीं.
