नई दिल्ली: लोकसभा में 11 दिसंबर 2025 को केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि 20% इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल (ई20) पर्यावरण तथा अर्थव्यवस्था के लिए लाभदायक है और इससे वाहनों के इंजन को कोई नुकसान नहीं होता.
गडकरी ने बताया कि ईंधन के ई20 मिश्रण ने भारत में पहले ही कार्बन उत्सर्जन में करीब 736 लाख मीट्रिक टन की कमी लाकर सैकड़ों करोड़ पेड़ों के बराबर सफ़ाई का काम किया है. उन्होंने यह भी कहा कि इथेनॉल में पारंपरिक पेट्रोल की तुलना में उच्च ऑक्टेन रेटिंग होती है, जिससे आधुनिक इंजनों की कार्यक्षमता बेहतर होती है.
इसके साथ ही गडकरी ने पर्यावरणीय लाभ के अलावा आर्थिक फायदों का भी दावा किया: सरकारी आंकड़ों के अनुसार अप्रैल 2014 से अब तक ई20 के प्रयोग से करीब 1.40 लाख करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बची है और किसानों को 1.20 लाख करोड़ रुपये से अधिक की भुगतान राशि मिल चुकी है.
गडकरी ने यह भी स्पष्ट किया कि ई20 पेट्रोल पुराने वाहनों के इंजनों को नुकसान नहीं पहुंचाता. उन्होंने कहा कि ऑटोमैटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एआरएआई) तथा अन्य संस्थानों द्वारा 100,000 किलोमीटर तक चलाए गए परीक्षणों में ई20 के प्रयोग से इंजन पावर, टॉर्क या ईंधन खपत में कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं मिला.
मंत्रालय के मुताबिक न तो प्रदर्शन में कोई गिरावट देखी गई और न ही इंजन को क्षति हुई; ई20 ने हॉट/कोल्ड स्टार्ट परीक्षण भी बिना समस्या के पास किए.
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने संसद में स्पष्ट किया कि 1 अप्रैल 2023 से पहले निर्मित वाहन ई10 (10% इथेनॉल मिश्रण) के लिए कंपैटिबल हैं, जबकि 1 अप्रैल 2023 के बाद बनाए गए वाहनों को कंपनियों ने विशेष रूप से ई20 (20% इथेनॉल मिश्रण) के लिए डिजाइन किया है.
गडकरी ने यह भी कहा कि पुरानी गाड़ियों को न तो रिटायर करने की जरूरत है और न ही किसी तरह के बड़े मॉडिफिकेशन की.
मंत्री के अनुसार, परीक्षणों में यह पाया गया है कि मौजूदा वाहन ई20 के साथ भी बिना किसी गंभीर इंजन क्षति के चल सकते हैं, इसलिए ‘पुरानी गाड़ियों को हटाने या बदलने की आवश्यकता नहीं है.’
बता दें कि ई20 पेट्रोल वह ईंधन है जिसमें 20% इथेनॉल और 80% पारंपरिक पेट्रोल का मिश्रण होता है. भारत सरकार इसे चरणबद्ध तरीके से पूरे देश में लागू कर रही है ताकि कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम हो, किसानों को अतिरिक्त आय मिले और कार्बन उत्सर्जन भी घटे.
1 अप्रैल 2023 के बाद बनी गाड़ियां खास तौर पर ई20 के लिए डिज़ाइन की गई हैं. 2023 से पहले बनी अधिकांश गाड़ियां ई10 (10% इथेनॉल) तक के लिए ही उपयुक्त मानी जाती हैं.
विशेषज्ञों की क्या राय है?
ई20 पर विशेषज्ञों ने भी मिलीजुली प्रतिक्रिया दी है. इथेनॉल एक हाइग्रोस्कोपिक तरल है, यह हवा से नमी खींचता है. यह नमी ईंधन टैंक और फ्यूल सिस्टम में जंग पैदा कर सकती है. इथेनॉल एक सॉल्वेंट भी है, जो रबर और प्लास्टिक वाले हिस्सों को धीरे-धीरे कमज़ोर कर सकता है. भारत में 2023 से पहले बनी कई गाड़ियों के पार्ट्स ई20 के लिए अनुकूल नहीं थे.
वाहन निर्माता संगठन SIAM ने माना है कि ई20 के कारण ईंधन क्षमता (माइलेज) में 2–4% की मामूली कमी हो सकती है, खासकर पुराने वाहनों में यह गिरावट थोड़ी अधिक हो सकती है.
इसके विपरीत, कुछ वाहन मालिक और विशेषज्ञ ई20 के प्रभाव को लेकर चिंतित हैं.
ऑटोमोबाइल यूट्यूबर अमित खरे के मुताबिक, कि उनके फॉलोअर्स को ई20 से ‘माइलेज में खासी गिरावट’ का अनुभव हो रहा है और कई पुराने वाहन के मालिकों ने इंजन समस्याएं बताई हैं.
वहीं लोकलसर्कल्स के एक देशव्यापी सर्वे में 37,000 से ज़्यादा पेट्रोल वाहन मालिकों ने बताया कि ई20 ईंधन के बाद 15–20% तक माइलेज गिरने की शिकायतें सामने आई हैं.
पर्यावरण और कृषि वैज्ञानिकों की राय भी मिलीजुली है.
प्रमुख शोध परिणाम बताते हैं कि ई20 उपयोग से जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम होती है और कार्बन उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी आती है. हालांकि, शोधकर्ता आगाह करते हैं कि फायदों के साथ कुछ गंभीर नुकसान भी है. भारत में ई20 इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल की स्थिरता पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला एक महत्वपूर्ण शोध पत्र दिसंबर 2025 में साइंस डायरेक्ट पर प्रकाशित हुआ है. यह सरकार के ‘हरित ईंधन क्रांति’ के दावों के ठीक उलट एक चिंताजनक तस्वीर सामने रखता है.
शोध के अनुसार, ई20 ईंधन का सबसे बड़ा पर्यावरणीय दबाव भूमि और जल के अत्यधिक उपयोग से जुड़ा है. इथेनॉल उत्पादन का मुख्य स्रोत गन्ना है और गन्ना खेती अपने आप में भारी पर्यावरणीय लागत के लिए बदनाम है.
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि एक लीटर इथेनॉल बनाने के लिए औसतन 2,860 लीटर पानी की जरूरत होती है और यह केवल सिंचाई के लिए आवश्यक पानी है. भारत के अधिकांश जिले पहले से ही पानी की कमी झेल रहे हैं. ऐसे में ई20 लक्ष्य हासिल करने की दिशा में बढ़ना जल संकट को कई गुना बढ़ा सकता है.
शोध–पत्र का अनुमान है कि यदि भारत अपने ई20 लक्ष्य पूरे कर लेता है, तो देश की वार्षिक सिंचाई जल मांग में 50 अरब घनमीटर की अतिरिक्त वृद्धि होगी. यह पानी दिल्ली की 17 साल की कुल आवश्यक पानी की आपूर्ति के बराबर है.
इसी तरह, केवल मक्का की खेती के लिए अतिरिक्त 80 लाख हेक्टेयर भूमि की जरूरत पड़ेगी, जो भारत की कुल कृषि भूमि का लगभग एक चौथाई है. लेकिन समस्या केवल जल और भूमि तक सीमित नहीं है. शोध में यह भी पाया गया है कि: गन्ना खेती के कारण वन क्षेत्र घट रहे हैं, जंगलों और चरागाहों का रूपांतर कृषि भूमि में हो रहा है, जैवविविधता कम हो रही है, मिट्टी की उर्वरता और उसकी प्राकृतिक संरचना तेजी से नष्ट हो रही है.
इथेनॉल उत्पादन प्रक्रिया के कारण अम्लीयता भी बढ़ती है, जिससे अम्ल वर्षा जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं और मिट्टी तथा जलाशयों का अम्लीकरण बढ़ता है.
खाद्य-सुरक्षा पर भी खतरा
जब गन्ना व मक्का जैसी फसलें ईंधन उत्पादन में लगने लगती हैं, तो खाद्य फसलों का हिस्सा घटता है और कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका बढ़ जाती है. यदि अनाज आधारित फसलें भी इथेनॉल उत्पादन में बड़े पैमाने पर लगें, तो खाद्य–मुद्रास्फीति का खतरा और गंभीर हो सकता है.
यह शोध एक कड़ा संकेत है कि सरकार जिन दावों के साथ ई20 को ‘हरित विकल्प’ के रूप में पेश कर रही है, उनके पीछे भारी–भरकम और दीर्घकालिक पर्यावरणीय लागत छिपी हुई है.
यह लागत आने वाले दशकों में भारत की: जल–सुरक्षा, कृषि विविधता, और पर्यावरणीय संतुलन को गहरे तौर पर प्रभावित कर सकती है. खुद नीति आयोग ने स्वीकार किया है कि इतने बड़े बायोफ्यूल लक्ष्यों को तभी आगे बढ़ाया जाना चाहिए, जब ऐसी उन्नत तकनीकें उपलब्ध हों, जो भूमि और जल की खपत को कई गुना कम कर दें. लेकिन वास्तविकता यह है कि ऐसी कोई व्यावहारिक तकनीक अभी मौजूद नहीं है.
दिखने लगा है टकराव!
ई20 से जुड़ी बहसें तब और उलझ गईं जब राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले के तिब्बी इलाके में एक निर्माणाधीन इथेनॉल संयंत्र के खिलाफ किसानों का विरोध हिंसक रूप ले लिया. 10-11 दिसंबर को सैकड़ों किसान राठी खेड़ा गांव में निर्माणाधीन ड्यून इथेनॉल प्राइवेट लिमिटेड संयंत्र की दीवार तोड़ने के लिए ट्रैक्टर लेकर पहुंच गए थे.
किसानों ने आरोप लगाया कि इस संयंत्र से जगह की हवा और पानी प्रदूषित होगी. प्रदर्शनकारियों ने पुलिस बैरिकेड तोड़ दिए और पुलिस ने लाठीचार्ज करते हुए आंसू गैस का इस्तेमाल किया.
कुछ गाड़ियां जलाई गईं और प्रदर्शन के दौरान कांग्रेस विधायक अभिमन्यु पूनिया भी घायल हो गए, जिन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा. प्रदर्शनकारियों ने पहले से जिला कलेक्टर कार्यालय के बाहर धरना दिया था और प्रशासन से संयंत्र निर्माण रोकने की लिखित गारंटी मांगी थी. जब उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो दोपहर में उन्होंने संयंत्र की ओर मार्च किया. हंगामा बढ़ते देख प्रशासन ने इंटरनेट और स्कूल–दुकानों पर प्रतिबंध लगा दिया.
राजस्थान की मुख्य विपक्षी कांग्रेस ने किसानों के पक्ष में मोर्चा संभाला. हनुमानगढ़ के सांसद कुलदीप इन्दौरा ने कहा कि सरकार किसानों की चिंता पर ध्यान नहीं दे रही और संयंत्र से यहां के पानी में कीटनाशकों की तरह प्रदूषण बढ़ने का डर है. पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, सचिन पायलट और अन्य नेताओं ने प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की कार्रवाई की निंदा की है.
उनके अनुसार किसानों का यह आंदोलन स्थानीय स्वीकृति के बिना फैसले का परिणाम है.
