अख़लाक़ लिंचिंग: सरकार की आरोपियों के ख़िलाफ़ आरोप वापस लेने की याचिका पर सुनवाई टली

उत्तर प्रदेश की एक अदालत को 2015 के मोहम्मद अख़लाक़ लिंचिंग मामले में सभी 19 आरोपियों के ख़िलाफ़ चल रहे मुक़दमे वापस लेने संबंधी राज्य सरकार की याचिका पर 12 दिसंबर को सुनवाई करनी थी, लेकिन अभियोजन पक्ष के वकील ने बताया कि वे सरकार के प्रस्ताव पर आपत्ति दाखिल करना चाहते हैं, इसके बाद अदालत ने सुनवाई की नई तारीख 18 दिसंबर तय की है.

(फाइल फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश की एक अदालत, जिसे 2015 के मोहम्मद अख़लाक़ लिंचिंग मामले में सभी 19 आरोपियों के खिलाफ़ चल रहे मुकदमे को वापस लेने संबंधी राज्य सरकार की याचिका पर सुनवाई करनी थी, अब इस मामले की सुनवाई 18 दिसंबर को करेगी.

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, यह मामला शुक्रवार (12 दिसंबर) को सुना जाना था, लेकिन अभियोजन पक्ष के वकील यूसुफ़ सैफ़ी ने अदालत को बताया कि वे उत्तर प्रदेश सरकार के प्रस्ताव पर आपत्ति दाखिल करना चाहते हैं. इसके बाद अदालत ने सुनवाई की नई तारीख तय की.

सैफ़ी ने अख़बार को बताया, ‘हमने कुछ और समय के लिए आवेदन दिया था और अब मामला 18 दिसंबर के लिए सूचीबद्ध है.’

बता दें कि गौतमबुद्ध नगर के दादरी क्षेत्र के बिसाहड़ा गांव के रहने वाले 52 वर्षीय मोहम्मद अखलाक की 28 सितंबर, 2015 को भीड़ ने कथित तौर पर इस संदेह में पीट-पीटकर हत्या कर दी थी कि उन्होंने अपने घर में गोमांस रखा है. उनकी लिंचिंग ने मोदी सरकार के दशक में भीड़ द्वारा हिंसा की कई घटनाओं की नींव रखी.

गौतम बुद्ध नगर की अपर सत्र अदालत में दायर एक आवेदन के अनुसार, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) शासित यूपी सरकार ने सीआरपीसी की धारा 321 के तहत मुकदमा वापस लेने का अनुरोध किया है. आरोपियों में विशाल राणा, स्थानीय भाजपा नेता संजय राणा के पुत्र भी शामिल हैं.

आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता (जिसे अब भारतीय न्याय संहिता से बदल दिया गया है) की कई धाराओं में मुकदमा चल रहा था, जिनमें 302 (हत्या), 307 (हत्या का प्रयास),  323 (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना),  504 (जानबूझकर अपमान), 506 (आपराधिक धमकी) शामिल हैं.

मुकदमा वापस लेने की अर्जी 15 अक्टूबर को गौतम बुद्ध नगर के सहायक जिला सरकारी अधिवक्ता भग सिंह द्वारा राज्य सरकार के निर्देशों के आधार पर दायर की गई थी. ये निर्देश 26 अगस्त को जारी एक पत्र के माध्यम से भेजे गए थे.

गौरतलब है कि अख़लाक़ की लिंचिंग ने भीड़ हिंसा, असहिष्णुता और गोमांस खाने पर देशव्यापी बहस छेड़ दी, जिससे राजनीतिक और सामाजिक हलकों में ध्रुवीकृत प्रतिक्रियाएं भड़क उठीं. कई नागरिक समूहों ने प्रदर्शन आयोजित किए और राजनीतिक कार्यकर्ताओं व स्कॉलरों ने इस बात पर ज़ोर दिया कि यह देश में धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक मूल्यों के कमज़ोर होने का संकेत है. अंततः, मोदी के दशक के दौरान यह उत्तर भारत में इसी तरह के हमलों की एक भयावह मिसाल बन गया, जब स्वयंभू ‘गौरक्षकों’ ने गौरक्षा के नाम पर गोहत्या या मवेशियों के परिवहन के आरोप में मुस्लिमों को निशाना बनाया.