हमारा समय देर-सबेर बीत जाएगा, साहित्य नहीं बीतेगा

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: साहित्य का आज यह आपद्कार्य है कि वह खुली आंखों से साहस को पहचाने और उसकी भी निगरानी करे कि वह कहां-कब ग़ायब हो जाता है. साहित्य का, इस समय, यह भी कर्तव्य है कि वह स्वयं निर्भय हो, भयोत्पादक व्यवस्थाओं में शामिल या उनके बारे में चुप्पी साधने से इनकार करे और हमें निर्भयता की ओर ले जाए.

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

साहित्य से, कोई और शायद नहीं, स्वयं साहित्य ही यह अपेक्षा करता है कि लेखक अपने समय के क़िस्सागो, अंतःकरण के क़ातिब, सच के हरकारे हों. समय साहित्य की ज़्यादातर अनसुनी करता है पर इसलिए साहित्य कहना बंद नहीं करता. साहित्य यह भी बखूबी समझता है कि जीवन और सचाई समय से बड़े हैं- अधिक जटिल, अधिक विपुल, अधिक असीम. अक्सर समय तो साहित्य को हिसाब में नहीं लेता पर साहित्य से यह अपेक्षा लगातार की जाती है कि साहित्य समय को हिसाब में ले, उसे दर्ज करे.

हमारा साहित्य, इस समय, हमारे समय के विरुद्ध खड़ा है- इतिहास में ऐसे मुक़ाम कम आते हैं जब साहित्य अपने समय के विरुद्ध हो जाए. यह दावा करना अनुपयुक्त न होगा कि आज साहित्य समय का प्रतिपक्ष है. एक डरे हुए और लगातार डराये जा रहे समाज में साहित्य, सौभाग्य से, निर्भयता का परिसर है. जब एक राजनीतिक विचारधारा, संकीर्ण और अपवर्जी, खुल्लमखुल्ला झूठ-घृणा-हिंसा का सहारा लेकर, धर्म के नाम पर लादी जा रही है तब हमारा साहित्य अहिंसक पर ‘सविनय अवज्ञा’ है; वह एक तरह का व्यापक ‘असहयोग’ है.

लेकिन हम यह नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते कि अपने समय को दर्ज करने में कई बार साहित्य, नैतिक रूप से, सर्जनात्मक रूप से चूकता भी रहा है- उसने अपने धर्म का पालन नहीं किया है. नतीजन साहित्य में कई चुप्पियां रही हैं जिसमें कुछ का ज़िक्र किया जा सकता है.

देश के बंटवारे के बाद हिंदी अंचल से सबसे बड़ी संख्या में मुसलमान उस ओर चले गए. इस बड़े बहिर्गमन से हिंदी समाज में बड़ी अनुपस्थिति हुई, जो सामाजिक ख़ालीपन आया, उनकी कोई अभिव्यक्ति हिंदी साहित्य में नहीं हुई.  नक्सलियों के दुस्साहस का बहुत रूमान वामकविता में रचा गया पर उनके द्वारा किए गए निरपराधों का संहार हिसाब में नहीं लिया गया. इसी तरह 2002 में गुजरात में जो नरसंहार हुआ उसे लेकर गुजराती साहित्य में व्यापक चुप्पी रही है. कश्मीर से पंडितों के पलायन से जो ख़ालीपन कश्मीरी समाज में आया उसका कोई एहतराम शायद कश्मीरी साहित्य में नहीं है.

ये कुछ बातें हैं जो मैंने हाल में ही में अहमदाबाद में गुजराती विश्वकोष ट्रस्ट के चालीस वर्ष पूरे होने पर ‘हमारा समय, हमारा साहित्य’ विषय पर बोलते हुए कहीं. मुक्तिबोध के एक पद का, एक बार फिर से उपयोग करते हुए, यह भी कहा कि साहित्य को ‘आत्मा का गुप्तचर होना, हो सकना चाहिए; आत्मा की ओर से और स्वयं आत्मा की भी जासूसी.

हमें इस सचाई से अवगत होना चाहिए कि हम अब लोकतंत्र में भी कड़ी और व्यापक निगरानी व्यवस्था में रह रहे हैं. नागरिकों पर तरह-तरह से निगरानी रखी जा रही है और, दुर्भाग्य से, स्वयं कई नागरिक एक-दूसरे पर निगरानी कई बार रखने लगे हैं.

साहित्य का आज यह आपद्कार्य है कि वह खुली आंखों से साहस को पहचाने और उसकी भी निगरानी करे कि वह कहां-कब ग़ायब हो जाता है. साहित्य का, इस समय, यह भी कर्तव्य है कि वह स्वयं निर्भय हो, भयोत्पादक व्यवस्थाओं में शामिल या उनके बारे में चुप्पी साधने से इनकार करे और हमें निर्भयता की ओर ले जाए. साहित्य अपने नाम के अनुरूप हमारे साथ चले.

हमारा समय, देर-सबेर, बीत जाएगा. हमारा साहित्य बीतेगा नहीं, बना रहेगा. वह हमारे समय का साक्ष्य होगा. उसके उजालों और अंधेरों का. उसकी अपनी चुप्पियां, कायरता और साहसहीनता उसके अंधेरे होंगी. वह अपने अंधेरों के लिए समय को ज़िम्मेदार नहीं ठहरा पाएगा. वह खुद जवाबदेह होगा. वह समय के और अपने उजालों-अंधेरों का बोझ ढोता रहेगा.

गुजरात विश्वकोश

चार दशक पहले कुछ गुजराती भाषाप्रेमी और परोपकारी व्यक्तियों ने गुजरात में विश्वकोष तैयार करने के लिए एक निजी उपक्रम के रूप में शुरूआत की थी. बाद में वह एक ट्रस्ट के रूप में गठित हुआ. विश्वकोश के छब्बीस खंड तैयार और प्रकाशित हो चुके हैं जो अब ऑनलाइन उपलब्ध हैं. ऐसा बताया गया कि हर महीने लगभग एक लाख लोग इस विश्वकोश का इस्तेमाल करते हैं.

इस अनोखे संस्थान ने विश्वकोश के अलावा बालविश्वकोश, नारी कोश, मेडिकल क्षेत्र में प्रयोग में आनेवाली प्रक्रियाओं, दवाइयों आदि को लेकर भी एक कोश दो ज़िल्दों में प्रकाशित किया है. अहमदाबाद में उनका अपना भवन है जहां अनेक सर्जनात्मक और बौद्धिक गतिविधियां नियमित रूप से होती हैं. वे तीन पत्रिकाएं गुजरात में प्रकाशित करते हैं जिनमें एक सामान्य पत्रिका है, दूसरी स्त्रियों की पत्रिका और तीसरी प्रवासी गुजरातियों की. वे जब-तब प्रोजेक्ट विशेष के लिए सरकारी अनुदान लेते रहे हैं पर उनकी सक्रियता का अधिकांश अनेक व्यक्तियों द्वारा दी गई वित्तीय सहायता से चलता है.

यह सुझाव मैंने दिया कि इस समय जो झूठों और घृणा से आक्रान्ति है, उसके चलते झूठ और घृणा के कोश भी बनाना चाहिए.

मराठी में भी एक विशद विश्वकोश तैयार हुआ है. पर अन्य भाषाओं में ऐसे प्रयत्न कम ही हुए हैं. हिंदी में नागरी प्रचारिणी सभी द्वारा संभवतः हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे विद्वान् के संपादन में ऐसे कोश बनाने का काम शुरू हुआ था जिसके कुछ खंड प्रकाशित हुए. पर वह पूरा नहीं हो पाया. उसके सभी खंड कहीं एकत्र उपलब्ध तक नहीं हैं. ऐसे कोश तैयार करनेवाली संस्थाएं, कुछेक अपवाद छोड़कर जिनमें गुजराती विश्वकोश सबसे उजला अपवाद है, अक्सर अक्षमता, लापरवाही, आलस्य और साधनहीनता का शिकार होती रही हैं.

अपनी भाषाओं में ज्ञानोत्पादन के प्रति हममें इतना उपेक्षा भाव क्यों है यह समझ में आना मुश्किल है. कई बार साधन उपलब्ध हों भी तो समय पर उनका सक्षम उपयोग नहीं हो पाता. हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार फैल गया है सो अलग. यह विडंबना है कि ज्ञान की ऐसी अवज्ञा के रहते-चलते हम एक ज्ञान-समाज बनने का सपना देख रहे हैं!

स्मृतियों का गल्प

याद नहीं आता कि हिंदी में पहले ऐसा कोई कवि रहा है जो शास्त्रीय संगीत पर गंभीर अध्येता है, जिसने किसी प्रसिद्ध गुरु से बाक़ायदा संगीत सीखा है और जो हिंदी में कविता लिखता हो. ऐसे पहले कवि कुल 24 वर्ष की आयु के वसु गंधर्व हैं जिनका एक कविता संग्रह ‘वीतराग’ नाम से सेतु प्रकाशन से आया है.

यह नोट करने की बात है कि हमारे समय में जब स्मृति पर लगभग दैनिक प्रहार हो रहे हैं और विस्मृति समाज में ही नहीं कविता में भी व्यापने लगी है तब वसु गंधर्व की कविता स्मृतियों का गल्प रचने की कोशिश करती है.

वसु की कविता में अनन्त, शाश्वत, प्राचीन, उद्गम, प्रागैतिहासिक नींद, निराकार पतझर, निर्लिप्त तन्मयता, ऊंगलियों की प्राचीन उष्णता जैसे शब्द और अभिव्यक्तियां उसे स्मृति की मोहक आभा देते हैं. वे सब घटित होते हैं ऐसे कविता-संसार में जिसमें चश्मा, चेहरा, ख़ाली जगहें, थकना, धीमापन, धूप-बारिश, विदा, पीड़ा, भाई, मां, पितामह, सोना, ढूंढना, पानी, शोक, गोश्त, बक्सा, नींद, दीमक, नीलाम्बरी, बीज, कमीज़, धूल आदि सब हैं जो उसे विपुल बनाते हैं.

जीवन की साधारणता, उसमें यादों का रचाव और चमक, हमें लगातार घेरे वस्तुओं का संसार, इस सबमें विन्यस्त जिजीविषा आदि सब कविता का उपजीव्य हैं. इस कविता में संग-साथ और निस्संगता दोनों हैं. भाषा की चमक इन कविताओं की आभा है. कुछ अंश देखिए:

तो हमारी प्रतीक्षारत कायाएं अंधेरा ढलते किवाड़ खटखटायेंगी
मृत्यु के सिरहाने टिका होता अकेले दीये को बालता हाथ
जीवन के निरर्थक, निःप्रसंग लेने-देन के कोहरे से
अचानक झाँकता कभी दिखेगा धूप का एक टुकड़ा

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ढलते दिनों के शोर मे वो बोलते हैं
अकेलेपन में कुत्तों की टेढ़ी दुम के छल्ले में
अपनी आवाज़ में साँप की देह भर गोलाकार के निराकार में
बोलते हैं अंधेरे दरवाज़े से टकराती हवा गिर जाती है बचपन के
खोखल में जहां एक दाँत गड़ा होता है नर्म मिट्टी की कोख में
और धुँआती राख पर गोश्त के टुकड़ों की तरह सिंकती रहती हैं
आंखों पर जमी पपड़ियां

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वह पेड़ जिसका चुप उकेरा हुआ है क़लम से
उसका पुरातत्व बुन रहा है उसके चारों ओर
एक शाश्वत पतझर की पहली परत
जिसे उतार नहीं पायेगा अपने आयतन में
कोई शब्द या कोई चित्र कभी भी

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)