राजस्थान के इथेनॉल फैक्ट्री के ख़िलाफ़ विरोध उग्र, पंजाब-यूपी-हरियाणा से पहुंचे किसान

राजस्थान के हनुमानगढ़ ज़िले के टिब्बी में निर्माणाधीन इथेनॉल प्लांट के खिलाफ किसानों का विरोध जारी है. भूजल प्रदूषण की आशंका को लेकर हुए आंदोलन में पुलिस-प्रदर्शनकारी टकराव, दर्जनों गिरफ्तारियां और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप सामने आए हैं. फिलहाल आंदोलन स्थगित है, लेकिन 17 दिसंबर को महापंचायत प्रस्तावित है.

टिब्बी में प्रदर्शनकारी ग्रामीण और किसान. (फोटो: अरेंजमेंट)

नई दिल्ली: राजस्थान के हनुमानगढ़ ज़िले के टिब्बी कस्बे में इस हफ्ते हुए एक हिंसक टकराव ने पूरे इलाके को सुर्खियों में ला दिया. सैकड़ों लोगों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज हुई, 40 लोगों को गिरफ़्तार किया गया और मामला लोकसभा तक पहुंचा. यह विरोध एक इथेनॉल प्लांट के निर्माण के ख़िलाफ़ था, जिसके बारे में किसानों का कहना है कि इससे भूजल प्रदूषित होगा और राजस्थान के सबसे उपजाऊ इलाकों में से एक में खेती प्रभावित होगी.

पिछले हफ्ते हालात तब बिगड़ गए जब प्रदर्शनकारी किसानों ने ट्रैक्टरों से निर्माणाधीन प्लांट की बाउंड्री वॉल तोड़ दी. यह घटना किसानों की एक महापंचायत के बाद हुई, जिसमें उत्तर भारत के कई राज्यों से किसान शामिल हुए थे.

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, टकराव काफी उग्र था. प्रदर्शनकारियों ने कई वाहनों में तोड़फोड़ की और आग लगा दी, जबकि पुलिस ने भीड़ को काबू में करने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े और लाठीचार्ज किया. किसानों के समर्थन में मौके पर पहुंचे कांग्रेस विधायक अभिमन्यु पूनिया भी इस दौरान घायल हो गए.

प्लांट प्रबंधन की शिकायत पर 273 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई. इसके अलावा, टिब्बी सर्कल ऑफिसर ने भी 108 लोगों के खिलाफ स्वतः संज्ञान लेते हुए एक अलग एफआईआर दर्ज की. अब तक 40 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है, जिनमें दो मौजूदा कांग्रेस विधायक, पूर्व विधायक और किसान नेता शामिल हैं.

किसान नेताओं में से एक, जगजीत सिंह जग्गी ने बताया कि 17 दिसंबर को अखिल भारतीय किसान सभा और संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले एक और महापंचायत बुलाई जाएगी. इसमें राकेश टिकैत सहित पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश से किसान नेताओं और प्रदर्शनकारियों के शामिल होने की उम्मीद है.

हालांकि, शुक्रवार रात को किसानों और प्रशासन के बीच प्रमुख मुद्दों पर ‘सहमति’ बनने के बाद विरोध को ‘स्थगित’ कर दिया गया. किसानों ने कहा कि इसके बावजूद महापंचायत तय कार्यक्रम के अनुसार आयोजित की जाएगी.

प्रस्तावित 40 मेगावाट की अनाज-आधारित इथेनॉल फैक्ट्री का निर्माण ड्यून इथेनॉल प्राइवेट लिमिटेड कर रही है. यह कंपनी चंडीगढ़ स्थित है और वर्ष 2020 में पंजीकृत हुई थी. कंपनी का कहना है कि यह संयंत्र केंद्र सरकार के इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल कार्यक्रम को समर्थन देगा. लेकिन स्थानीय लोगों, खासकर किसानों को आशंका है कि इससे प्रदूषण फैलेगा, विशेष रूप से भूजल प्रभावित होगा.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, बार-बार कोशिशों के बावजूद कंपनी के अधिकारी टिप्पणी के लिए उपलब्ध नहीं हो सके, लेकिन सरकारी अधिकारियों ने भरोसा दिलाया है कि इस संयंत्र से कोई प्रदूषण नहीं होगा.

राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप

राजस्थान सरकार के मंत्री सुमित गोदारा और जोगाराम पटेल ने आरोप लगाया कि यह विरोध सरकार के राजनीतिक विरोधियों द्वारा करवाया जा रहा है.

जोगाराम पटेल ने कहा, ‘कांग्रेस नेताओं ने इसे राजनीतिक मुद्दा बना दिया है. यह किसानों का आंदोलन नहीं है, बल्कि विपक्ष द्वारा रची गई साजिश है, जो इलाके में तनाव पैदा करना चाहता है. सरकार बातचीत के लिए तैयार है और सभी जायज़ मांगों पर विचार करेगी, लेकिन लोगों को कानून अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए.’

कृषि मंत्री किरोड़ी लाल मीणा ने गुरुवार को कहा कि फैक्ट्री के लिए ज़मीन पिछली कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में हुए एक एमओयू के बाद आवंटित की गई थी, लेकिन अब उसी पार्टी के विधायक ‘किसानों को आगे करके फैक्ट्री पर हमले का नेतृत्व कर रहे हैं.’

इस बीच, राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के सांसद हनुमान बेनीवाल और कांग्रेस के सांसद कुलदीप इंदौरा ने लोकसभा में यह मुद्दा उठाया. शून्यकाल के दौरान बेनीवाल ने ‘किसानों के विरोध प्रदर्शन’ पर हुए लाठीचार्ज का मुद्दा उठाया. दोनों सांसदों ने फैक्ट्री से होने वाले प्रदूषण, उपजाऊ ज़मीन के नुकसान और पानी की गुणवत्ता खराब होने को लेकर किसानों की चिंताओं को दोहराया.

लंबे समय से चला आ रहा विरोध अब उबाल पर

इस संयंत्र के खिलाफ विरोध प्रदर्शन सितंबर 2024 में शुरू हुआ था. जुलाई 2025 में तब विरोध तेज हो गया, जब कंपनी ने बाउंड्री वॉल का निर्माण शुरू किया. नवंबर से फैक्ट्री का निर्माण पुलिस सुरक्षा में जारी है.

किसानों ने 10 दिसंबर को महापंचायत बुलाई, जिसके बाद करीब 6,000 लोग ट्रैक्टरों के साथ फैक्ट्री क्षेत्र की ओर बढ़े और बाउंड्री वॉल तोड़ दी. इसके बाद पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हो गई.

अखिल भारतीय किसान सभा के सदस्य मंगेश चौधरी ने दावा किया, ‘हम शुरू से ही इस मुद्दे को शांतिपूर्वक सुलझाने के लिए तैयार थे. लेकिन सरकार ने हमसे बात करने के लिए किसी को नहीं भेजा, बल्कि हमें लगातार धमकाती रही. 9 दिसंबर की रात हमारे कार्यकर्ताओं को उनके घरों से गिरफ्तार कर लिया गया.’

स्थिति को काबू में रखने के लिए प्रशासन ने करीब 500 पुलिसकर्मी और बॉर्डर होम गार्ड्स इलाके में तैनात किए हैं. जयपुर से भी पुलिस अधिकारियों को बुलाया गया है.

एडीजी (कानून-व्यवस्था) वी.के. सिंह के मुताबिक, ‘स्थिति को नियंत्रण में रखने के लिए बल बुलाए गए हैं और शांति बनाए रखने के लिए सभी जरूरी कदम उठाए जाएंगे. चिंता की कोई बात नहीं है. किसान नेता सरकार से बातचीत कर रहे हैं. फैक्ट्री स्थल पर कोई नहीं है और उसे सुरक्षित कर लिया गया है.’

गिरफ्तारी के डर से कई प्रदर्शनकारी अब अपना-अपना घर छोड़ टिब्बी गुरुद्वारे में रहने लगे हैं.

हनुमानगढ़ के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी मंगीलाल चिम्पा के अनुसार, 10 दिसंबर की झड़पों के बाद 40 लोगों को अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जिन्हें शुक्रवार तक छुट्टी दे दी गई.

फैक्ट्री परिसर में अब भी पुलिस और अन्य सुरक्षा बल तैनात हैं. वहां आठ-आठ घंटे की शिफ्ट में तैनात होम गार्ड कर्मियों ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि झड़प के दिन भीड़ हिंसक हो गई थी.

एक होम गार्ड ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, ‘उन्होंने गाड़ियां जला दीं और सब कुछ तोड़फोड़ दिया. भीड़ में कई गुंडे शामिल थे. उन्होंने फैक्ट्री परिसर में जनरेटर चलाने के लिए रखा डीज़ल निकालकर गाड़ियों और फैक्ट्री ऑफिस पर डाल दिया. ऑफिस के अंदर एक अधिकारी भी मौजूद थे, जिन्हें बालकनी से बचाकर बाहर निकाला गया.’

हालांकि, प्रदर्शनकारियों ने इन आरोपों से इनकार किया है. किसान नेता रमेश्वर वर्मा और अन्य प्रदर्शनकारियों का दावा है कि गाड़ियों को फैक्ट्री कर्मचारियों ने ही जलाया, ताकि इसका दोष किसानों पर डाला जा सके.

पंजाब के ज़ीरा आंदोलन की गूंज

प्रदर्शनकारियों में शामिल कुणाल बिश्नोई ने बताया कि उनमें से कई लोग पंजाब के फिरोज़पुर ज़िले के ज़ीरा कस्बे गए थे, जहां कुछ साल पहले स्थानीय लोगों के विरोध के चलते एक इथेनॉल प्लांट को बंद करना पड़ा था.

ज़ीरा का यह प्लांट पहले 2006 में एक डिस्टिलरी के रूप में शुरू हुआ था और 2014 में इसे इथेनॉल उत्पादन इकाई में बदल दिया गया. प्लांट के आसपास के गांवों के निवासियों ने शिकायत की थी कि इससे ज़हरीला कचरा निकल रहा है, जिससे भूजल और ज़मीन प्रदूषित हो रही है.

यह मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण तक पहुंचा, जहां 2023 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने एक रिपोर्ट दाख़िल की. रिपोर्ट में औद्योगिक इकाई के आसपास के इलाक़ों में भूजल और मिट्टी के गंभीर रूप से प्रदूषित होने की बात कही गई थी.

प्लांट के ख़िलाफ़ याचिका दायर करने वाली पब्लिक एक्शन कमेटी के सदस्य जसकीरत सिंह ने कहा, ‘टिब्बी की तरह ही ज़ीरा के इथेनॉल प्लांट को भी ‘ज़ीरो लिक्विड डिस्चार्ज’ बताया गया था… ज़ीरा का मामला अब भी एनजीटी में अपील के स्तर पर लंबित है.’

लगातार बढ़ते विरोध के बीच जुलाई 2022 में ज़ीरा का यह प्लांट बंद कर दिया गया था.

कुणाल बिश्नोई ने कहा, ‘टिब्बी के पास बेहद उपजाऊ ज़मीन और पर्याप्त भूजल है. यहां की पूरी खेती भूजल पर निर्भर है. अगर पंजाब की तरह यहाँ भी फैक्ट्री भूजल को प्रदूषित करती है, तो हमारा पूरा इलाक़ा तबाह हो जाएगा. हम टिब्बी को ज़ीरा नहीं बनने देंगे.’