जर्मन दार्शनिक कार्ल मार्क्स ने पूंजीवाद की आलोचना करते हुए तर्क दिया था कि यह व्यवस्था स्वाभाविक रूप से ‘अलगाव’ (एलियनेशन) और ‘शोषण’ पर आधारित है. इंडिगो संकट में, पायलटों को असुरक्षित रूप से अधिक काम करने के लिए मजबूर करना और संकट के दौरान 400 प्रतिशत मुनाफा कमाना, मार्क्स के इस दावे को प्रमाणित करता है कि पूंजीवाद मानव कल्याण के बजाय अतिरिक्त मुनाफा कमाने पर ध्यान केंद्रित करता है.
नागरिकों को मात्र ग्राहक या संसाधन समझा जाता है, जिनकी पीड़ा का उपयोग भी मुनाफ़े के लिए किया जा सकता है.
आधुनिक राजनीतिक दार्शनिक माइकल सैंडल ने अपने काम में ‘बाज़ार समाज’ (मार्केट सोसाइटी) की तीखी आलोचना की है. सैंडल तर्क देते हैं कि जब सब कुछ बाज़ार के अधीन हो जाता है, तो यह वस्तुओं और सेवाओं के नैतिक और नागरिक मूल्यों को क्षीण कर देता है. इंडिगो संकट में, जहां आवश्यक यात्रा के टिकट 70,000 रुपये में बेचे गए, यह दिखाता है कि बाज़ार ने मानवीय जरूरतों को एक वस्तु में बदल दिया और नैतिकता को पूरी तरह दरकिनार कर दिया. सैंडल के अनुसार ऐसी व्यवस्थाएं नागरिकों के बीच असमानता को गहरा करती हैं और सामाजिक सामंजस्य को तोड़ती हैं.
2 दिसंबर 2025 का वह दिन भारत के लिए त्रासदीपूर्ण क्षण था, जब भारतीय विमानन क्षेत्र में पूंजीवाद का संकट अपने सबसे भयानक रूप में प्रकट हुआ. इंडिगो, जो अकेले देश की 64 प्रतिशत घरेलू उड़ानों का संचालन करती है, अचानक से ठप्प पड़ गई. सैकड़ों उड़ानें रद्द हुईं और हजारों यात्री गहरे संकट में फंस गए. हवाई अड्डों पर फैली अव्यवस्था, आवश्यक यात्राओं का निरस्त होना और लोगों की बेबसी यह किसी अप्रत्याशित घटना से कम नहीं था, बल्कि एक संरचनात्मक और संस्थागत पतन का स्पष्ट प्रमाण था, जिसकी जड़ें सत्ता और कॉरपोरेट हितों के अपवित्र गठबंधन में समाई हुई हैं.
इस विपत्ति का तात्कालिक कारण जानबूझकर की गई नियामक उपेक्षा ही थी. 1 नवंबर 2025 से लागू हुए नए ‘फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन’ (एफडीटीएल) नियम, जो पायलटों की सुरक्षा और अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप थे, जो ‘डायरेक्टरेट जनरल ऑफ सिविल ऐविएशन’ (डीजीसीए) ने ग्यारह महीने पहले ही सूचित कर दिया था. इसके बावजूद, इंडिगो ने न तो पर्याप्त पायलटों की भर्ती की और न ही अपनी शेड्यूलिंग प्रणाली को अपडेट किया. 4 दिसंबर को इंडिगो का ऑन-टाइम परफॉर्मेंस गिरकर 8.5 प्रतिशत रह गया. डीजीसीए के स्वयं के निष्कर्षों ने भी पुष्टि की कि यह संकट कंपनी की ‘योजना बनाने में गंभीर चूक’ का परिणाम था. यह स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है कि संकट का मूल कारण बाज़ार की विवशता नहीं, बल्कि कॉरपोरेट की स्वार्थपरक लापरवाही थी.
जनता पर पड़ा वित्तीय और भावनात्मक बोझ
इस संकट का सीधा बोझ आम जनता पर पड़ा. नागरिक उड्डयन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 1 से 7 दिसंबर 2025 के बीच, इंडिगो संकट के कारण 5,86,705 टिकट रद्द हुए, जिसके कारण यात्रियों को कुल 569.65 करोड़ रुपये का रिफंड करना पड़ा. यह राशि केवल टिकटों के मूल मूल्य की भरपाई थी. इसके अतिरिक्त, यात्रियों को आखरी समय में 400 प्रतिशत तक बढ़ी हुई कीमतों पर टिकट खरीदने पड़े. दिल्ली-बेंगलुरु जैसे रूट के फ्लाइट टिकट 70 हजार रुपये तक बिके. यह ‘आपातकालीन मुनाफाखोरी’ का घिनौना उदाहरण था, जहां जनता की पीड़ा को लाभ कमाने के अवसर में बदला गया. यह स्थिति सिद्ध करती है कि विमानन जैसी आवश्यक सेवा तक पहुंच अब केवल समृद्ध वर्ग तक सीमित है, जबकि बहुसंख्यक नागरिक इस व्यवस्था में बेबस उपभोक्ता बनकर रह जाते हैं.
नियामक का आत्मसमर्पण: सरकार की दोहरी भूमिका
संकट की सबसे बड़ी विडंबना डीजीसीए की प्रतिक्रिया थी. इंडिगो को दंडित करने के बजाय, डीजीसीए ने उसे ‘अस्थायी छूट’ प्रदान की, सुरक्षा नियमों को शिथिल किया, और अपने ही फ्लाइट ऑपरेशन इंस्पेक्टर्स को इंडिगो के लिए उड़ानें भरने की अनुमति दी. यह कदम नियामक की स्वतंत्रता का पूर्ण आत्मसमर्पण था. नियामक संस्था का कार्य जनसुरक्षा सुनिश्चित करना है, न कि कॉरपोरेट हितों की पूर्ति. सरकार ने यहां दोहरी भूमिका निभाई, एक तरफ वह जनता के सामने सुरक्षा और नियमों की बात करती रही, तो दूसरी तरफ पर्दे के पीछे उसने नियमों को शिथिल करके कॉरपोरेट को मुनाफा कमाने का सीधा रास्ता दे दिया.
डुओपॉली का घातक प्रभाव और बाज़ार की क्रूरता
भारतीय विमानन क्षेत्र डुओपॉली में फंस चुका है, जहां इंडिगो और एयर इंडिया समूह मिलकर लगभग 92 प्रतिशत बाज़ार नियंत्रित करते हैं. जब बाज़ार कुछ चुनिंदा खिलाड़ियों के हाथ में सिमट जाता है, तो वहां प्रतिस्पर्धा समाप्त हो जाती है और उपभोक्ता का शोषण अपरिहार्य हो जाता है.
यह प्रवृत्ति केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अनियंत्रित पूंजीवाद की एक वैश्विक बीमारी है. जहां भी सेवाएं कुछ ही संस्थाओं के नियंत्रण में आती हैं, वहां गुणवत्ता गिरती है और कीमतें बढ़ती हैं.
उदाहरण के लिए अमेरिकी दवा बाज़ार, संयुक्त राज्य अमेरिका में दवा वितरण और बीमा क्षेत्र में कुछ बड़ी कंपनियां (जैसे पीएमबी) बाज़ार पर नियंत्रण रखती हैं. इस सीमित प्रतिस्पर्धा के कारण जीवन रक्षक दवाओं की कीमतें आसमान छूती हैं, जिससे गरीब और मध्यम वर्ग के लिए स्वास्थ्य सेवाएं कठिन हो जाती हैं. यह स्पष्ट है कि मोनोपॉली या डूओपॉली की संरचनाएं सीधे तौर पर जन स्वास्थ्य और आर्थिक सुरक्षा को निशाना बनाती हैं.
यूएस की ब्रॉडबैंड सेवाओं का भी यही हाल है. अमेरिका के कई हिस्सों में कॉमकास्ट और स्पेक्ट्रम जैसी कंपनियां ही ब्रॉडबैंड सेवाएँ प्रदान करती हैं. प्रतिस्पर्धा के अभाव में, ग्राहकों को धीमी गति की इंटरनेट सेवा के लिए भी अत्यधिक कीमतें चुकानी पड़ती हैं, और ग्राहक सेवा की गुणवत्ता बेहद खराब रहती है. यह स्थिति दिखाती है कि कैसे डुओपॉली नागरिक की बुनियादी डिजिटल पहुंच को भी महंगा और अप्रभावी बना देता है. ये उदाहरण दर्शाते हैं कि जब बाज़ार में वास्तविक प्रतिस्पर्धा का अभाव होता है, तो कंपनियों के पास सुरक्षा नियमों की उपेक्षा करने, निवेश न करने और संकट के समय कीमतों में मनमानी वृद्धि करने की पूरी आज़ादी होती है. डुओपॉली, उपभोक्ताओं को ‘ले या छोड़ दे’ की स्थिति में लाकर खड़ा कर देता है, जो बाज़ार की क्रूरता का चरम रूप है.
लोकतंत्र की विदाई: पूंजीपतियों का शासन
यह संकट केवल विमानन तक सीमित नहीं है. यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लगभग हर क्षेत्र में डुओपॉली और मोनोपॉली के विस्तार की व्यापक कहानी है. दूरसंचार, ई-कॉमर्स और अन्य मूलभूत सेवाओं में यही पैटर्न दोहराया जा रहा है.
यह उस खुली अर्थव्यवस्था की कल्पना के विपरीत है, जिसका वादा 1991 में किया गया था. आज, हम एक ऐसी नई ‘राज’ व्यवस्था में हैं, जहां सत्ता और पूंजी एक ही सिक्के के दो पहलू बन चुके हैं. संसद में कॉरपोरेट पृष्ठभूमि वाले सांसदों की बढ़ती संख्या इस बात का प्रमाण है कि हितों का टकराव अब नीति निर्माण का केंद्रीय तत्व बन चुका है. कानून जनहित के लिए नहीं, बल्कि पूंजीपतियों के मुनाफ़े की रक्षा के लिए बनाए जाते हैं.
पूंजीवाद और सरकार के इस गठजोड़ पर यहां तीखी आलोचना आवश्यक है. सरकार जिसे नियामक और रक्षक की भूमिका में होनी चाहिए, यहां कॉरपोरेट की सहयोगी बन गई है. जब नियामक संस्थाएं पूंजीपतियों के सामने घुटने टेक देती हैं, तो यह न केवल लोकतंत्र का पतन है बल्कि जनता के प्रति विश्वासघात भी.
दिसंबर 2025 का इंडिगो संकट इस बात का प्रमाण है कि भारत की राजनीतिक-आर्थिक प्रणाली अब नागरिकों के कल्याण के लिए काम नहीं करती. यह संकट एक स्पष्ट चेतावनी है कि जब तक इस व्यवस्था को मूल रूप से नहीं बदला जाता, तब तक आम नागरिक पूंजीपतियों के इस एकाधिकार की बलि चढ़ने के लिए विवश रहेगा.
