मनरेगा का नाम बदलने की कोशिश पर विपक्ष का विरोध, सरकार पर क़ानून कमज़ोर करने का आरोप

मोदी सरकार द्वारा मनरेगा का नाम बदलने से जुड़े विधेयक को सूचीबद्ध किए जाने पर विपक्ष और सामाजिक संगठनों ने कड़ा विरोध जताया है. उनका आरोप है कि यह केवल नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि काम के अधिकार को कमज़ोर करने और केंद्र का नियंत्रण बढ़ाने की कोशिश है.

(फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार द्वारा यूपीए सरकार के दौर में बने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) का नाम बदलने से जुड़े एक विधेयक को अचानक सूचीबद्ध किए जाने को लेकर सोमवार (15 दिसंबर) को विपक्षी दलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कड़ी आपत्ति जताई. हालांकि, यह विधेयक अंततः लोकसभा में पेश नहीं किया जा सका.

‘विकसित भारत-रोज़गार और आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) विधेयक’, जिसका संक्षिप्त नाम वीबी जी राम जी (VB- G RAM- G) एक्ट रखा गया है, को लोकसभा के अनुपूरक कार्यसूची में शामिल किया गया था, लेकिन बाद में इसे सदन में पेश नहीं किया गया. विपक्ष का आरोप है कि सरकार जानबूझकर महात्मा गांधी का नाम हटाने की कोशिश कर रही है और उस ऐतिहासिक कानून को कमजोर करना चाहती है, जिसने ग्रामीण परिवारों को मांग के आधार पर 100 दिन के काम की कानूनी गारंटी दी थी.

एक बयान में राज्यसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि यह विधेयक ‘सिर्फ महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम का नाम बदलने का मामला नहीं है,’ बल्कि यह ‘मनरेगा को खत्म करने की भाजपा–आरएसएस की साजिश’ है.

उन्होंने कहा, ‘संघ की शताब्दी के वर्ष में गांधी का नाम मिटाने की कोशिश यह दिखाती है कि मोदी जी जैसे लोग, जो विदेशों में जाकर बापू को श्रद्धांजलि देते हैं, कितने खोखले और पाखंडी हैं. जो सरकार गरीबों के अधिकारों से पीछे हटती है, वही मनरेगा पर हमला करती है.’

राज्यसभा में सीपीआई(एम) के सांसद जॉन ब्रिटास ने कहा कि विधेयक का नाम बदलना तो सिर्फ़ एक ट्रेलर है, असली नुकसान इससे कहीं ज़्यादा गहरा है. उन्होंने कहा कि प्रस्तावित क़ानून में भले ही काम के दिनों की संख्या 100 से बढ़ाकर 125 करने की बात कही गई हो, लेकिन सरकार ने एक अधिकार-आधारित गारंटी क़ानून की ‘आत्मा’ ही निकाल दी है और उसकी जगह शर्तों से बंधी, केंद्र के नियंत्रण वाली ऐसी योजना रख दी है, जो राज्यों और मज़दूरों के ख़िलाफ़ जाती है.

एक बयान में सीपीआई(एम) पोलित ब्यूरो ने कहा कि सरकार का यह दावा कि रोज़गार की गारंटी 100 से बढ़ाकर 125 दिन की जा रही है, ‘सिर्फ़ दिखावटी’ है.

पार्टी ने कहा, ‘हकीकत में यह विधेयक जॉब कार्ड के ‘युक्तिकरण’ के नाम पर ग्रामीण इलाक़ों के बड़े हिस्से को योजना से बाहर करने का रास्ता खोलता है. खेती के चरम मौसम में सरकार को 60 दिनों तक रोज़गार निलंबित करने की अनुमति देने वाला प्रावधान, उस समय ग्रामीण परिवारों से काम छीन लेगा जब उन्हें इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है और उन्हें ज़मींदारों पर निर्भर बना देगा. काम के स्थान पर डिजिटल उपस्थिति को अनिवार्य करना मज़दूरों के लिए भारी मुश्किलें खड़ी करेगा, जैसे काम का नुकसान और उनके अधिकारों से वंचित होना.’

सीपीआई(एम) ने कहा कि प्रस्तावित क़ानून के तहत मज़दूरी भुगतान में केंद्र की ज़िम्मेदारी को 100 प्रतिशत से घटाकर बड़े राज्यों के लिए 60:40 के हिस्सेदारी मॉडल में बदलने का कदम, बेरोज़गारी भत्ता और देरी से भुगतान के मुआवज़े का बोझ राज्यों पर डाल देता है.

पार्टी ने कहा, ‘इससे राज्य सरकारों पर ऐसा वित्तीय दबाव पड़ेगा जिसे वे लंबे समय तक नहीं झेल पाएंगी, जबकि फ़ैसला लेने की प्रक्रिया में उन्हें कोई भूमिका भी नहीं दी जा रही है. ‘नॉर्मेटिव एलोकेशन’ की शुरुआत – जिसमें केंद्र राज्यवार ख़र्च की सीमा तय करेगा और अतिरिक्त ख़र्च राज्यों को उठाना होगा – योजना की पहुंच को और सीमित करेगी तथा केंद्र की जवाबदेही को कमजोर करेगी. योजना के नाम को मनरेगा से बदलकर जी राम जी करना भी भाजपा-आरएसएस के वैचारिक झुकाव को दर्शाता है.’

प्रस्तावित क़ानून में यह भी कहा गया है कि हर वित्तीय वर्ष के लिए राज्यों को मिलने वाला ‘नॉर्मेटिव एलोकेशन’ केंद्र सरकार तय करेगी, वह भी उन्हीं वस्तुनिष्ठ मानकों के आधार पर जिन्हें केंद्र स्वयं निर्धारित करेगा. ऐसे में इन बदलावों का असर केरल और तमिलनाडु जैसे अपेक्षाकृत विकसित राज्यों पर ज़्यादा पड़ सकता है, खासकर अगर बहुआयामी गरीबी सूचकांक को मानक बनाया जाता है.

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर रोड स्कॉलर्ज़ नामक अकाउंट ने विधेयक के अनुच्छेद 5(1) का हवाला देते हुए बताया कि इसमें कहा गया है:

इस अधिनियम के अंतर्गत बनाई गई योजना के अनुसार, और जहां अन्यथा प्रावधान न हो, राज्य सरकार उस ग्रामीण क्षेत्र में, जिसे केंद्र सरकार अधिसूचित करेगी, हर ऐसे परिवार को, जिसके वयस्क सदस्य अकुशल शारीरिक श्रम करने के लिए तैयार हों, एक वित्तीय वर्ष में कम से कम 125 दिनों का गारंटीकृत रोजगार उपलब्ध कराएगी.

इस पर टिप्पणी करते हुए अकाउंट ने कहा, ‘संक्षेप में, यह विधेयक काम के कानूनी अधिकार को घटाकर एक नाममात्र की केंद्र-प्रायोजित योजना बना देता है, जिसमें केंद्र सरकार किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है और सभी शक्तियां अपने पास रखती है. इसका पूरी ताकत से विरोध किया जाना चाहिए.’

वहीं, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने क़ानून का नाम बदलने के कदम को ‘गांधी का अपमान’ बताया.

उनकी पार्टी ने एक बयान में कहा कि अगर सच में सुशासन ही उद्देश्य होता, तो पश्चिम बंगाल के रोके गए मज़दूरी के पैसे अब तक जारी कर दिए गए होते.

बयान में कहा गया, ‘अगर सुधार ही मकसद होता तो मज़दूरों को सज़ा नहीं दी जाती. जो शासन व्यवस्था श्रम की गरिमा के गांधीवादी विचार से लगातार असहज रही है, उसके लिए यह नाम मिटाना बहुत कुछ कहता है. नाम बदलना सिर्फ़ एक ही बात साबित करता है- भाजपा जानती है कि उसने बंगाल के साथ गलत किया है और अब वह चाहती है कि लोग यह भूल जाएं कि किसने काम और मज़दूरी से वंचित किया.’

वहीं, समाजवादी पार्टी (एसपी) के प्रमुख और लोकसभा सांसद अखिलेश यादव ने कहा कि ‘भाजपा को चीज़ों के नाम बदलने की आदत है.’

उन्होंने संसद के बाहर पत्रकारों से कहा, ‘ये तथाकथित डबल इंजन सरकारें खुद कोई नया काम नहीं करतीं, इसलिए दूसरों के काम का नाम बदलकर उसे अपने नाम से पेश करती हैं. सरकार कहती रही है कि निवेश बढ़ा है, तो फिर काम के दिनों को 200 क्यों नहीं किया गया? अगर प्रावधान बदले जा रहे हैं, तो बजट के मामले में राज्यों को स्वतंत्रता दी जानी चाहिए.’

वहीं, नरेगा संघर्ष समिति ने एक बयान में इस विधेयक को वापस लेने की मांग की है. समिति ने कहा कि मज़दूरों और उनके संगठनों की सहमति और भागीदारी के बिना मनरेगा को खत्म करने या उसमें बुनियादी बदलाव करने की कोई भी कोशिश अस्वीकार्य है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)