देशभर के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, समितियों में वैज्ञानिक व तकनीकी के स्वीकृत पदों में से लगभग आधे ख़ाली

संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने लोकसभा में बताया कि दिल्ली और उत्तर भारत के अधिकांश हिस्से इस समय भीषण वायु प्रदूषण से जूझ रहे हैं, वहीं देशभर के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और समितियों में स्वीकृत वैज्ञानिक एवं तकनीकी पदों में से लगभग 45% पद रिक्त पड़े हैं.

14 दिसंबर को नई दिल्ली में एक ठंडी और धुंध भरी सर्दियों की सुबह, रेलवे ट्रैक के पास बिखरे कचरे में से एक कबाड़ बीनने वाला व्यक्ति उपयोगी सामान ढूंढ रहा है. (फोटो: पीटीआई/शाहबाज खान)

नई दिल्ली: संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने लोकसभा में बताया कि दिल्ली और उत्तर भारत के अधिकांश हिस्से इस समय भीषण वायु प्रदूषण से जूझ रहे हैं, वहीं देशभर के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और समितियों में स्वीकृत वैज्ञानिक एवं तकनीकी पदों में से लगभग 45% पद खाली पड़े हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक, 8 दिसंबर को लोकसभा में पर्यावरण राज्य मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह ने बताया कि देश के सर्वोच्च प्रदूषण नियंत्रण निकाय केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी), जो सीधे केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के अधीन है, में 16.28% पद खाली हैं.

उल्लेखनीय है कि इस संबंध में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) सांसद रत्नवेल सचिथानंथम ने सवाल पूछा था कि क्या सीपीसीबी और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एसपीसीबी) पर्यावरण इंजीनियरों और वैज्ञानिकों जैसे जमीनी स्तर (field-level) स्टाफ की गंभीर कमी का सामना कर रहे हैं.

उन्होंने सीपीसीबी और सभी एसपीसीबी को मिलाकर मौजूदा स्वीकृत कुल संख्या और जमीनी स्तर के कर्मचारियों के रिक्त पदों की संख्या का विवरण, साथ ही इस मैनपॉवर की कमी को दूर करने के लिए सरकार द्वारा प्रस्तावित योजना और समयसीमा का विवरण भी मांगा था.

देशभर में 3,161 पद रिक्त

सीपीसीबी के अलावा, 28 एसपीसीबी और आठ प्रदूषण नियंत्रण समितियां (पीसीसी, जो दिल्ली-एनसीआर सहित केंद्र शासित प्रदेशों में कार्यरत हैं) हैं.

सिंह ने बताया कि वैज्ञानिक और तकनीकी पदों के लिए इनकी कुल स्वीकृत संख्या 6,932 है, जिनमें से 3,161 या 45.6% पद खाली हैं.

सिंह ने अपने जवाब में यब भी बताया कि सीपीसीबी में स्वीकृत 393 वैज्ञानिक और तकनीकी पदों में से 64 पद रिक्त हैं. वहीं, एसपीसीबी में 6,137 पदों में से 2,921 पद खाली पड़े हैं. जबकि पीसीसी में 402 पदों में से 176 पद रिक्त हैं.

इतने पद खाली क्यों हैं? इसके जवाब में सिंह ने इसकी जिम्मेदारी का ठीकरा राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासन पर फोड़ दिया.

मंत्री ने कहा, ‘राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और प्रदूषण नियंत्रण समितियां संबंधित राज्य सरकारों/केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन के प्रशासनिक नियंत्रण में हैं और एसपीसीबी/पीसीसी में रिक्त पदों को भरने की जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकार/केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन की है.’

उन्होंने आगे बताया, ‘राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और प्रदूषण नियंत्रण समितियों के अधिकारियों और कर्मचारियों की नियुक्ति एसपीसीबी/पीसीसी द्वारा अपने-अपने नियमों के अनुसार की जाती है.’

एक लगातार बनी रहने वाली समस्या

इस संबंध में टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट बताती है कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और समितियों द्वारा रिक्त पदों को भरने में असमर्थता कम से कम पांच वर्षों से जारी है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि इन वर्षों के दौरान रिक्तियां 44-51% के बीच रही हैं.

इस वर्ष मार्च में संसद में दिए गए एक बयान में एसपीसीबी और पीसीसी में देश भर के सभी पदों पर कुल रिक्तियों का प्रतिशत 49% बताया गया था (स्वीकृत 11,562 पदों में से 5,671 पद रिक्त थे).

मार्च में मंत्री के जवाब में कहा गया था कि भारत के 28 विशेष प्रशासनिक और स्वास्थ्य सेवा निगमों (एसपीसीबी) में से 12 में 50% से अधिक पद रिक्त थे.

इसमें सिक्किम 100% रिक्तियों के साथ सूची में सबसे ऊपर था, जिसके बाद झारखंड और आंध्र प्रदेश थे, दोनों में 70% से अधिक कर्मचारियों की कमी थी.

केरल एकमात्र ऐसा बड़ा राज्य था जहां रिक्तियां 10% से कम थीं. गोवा में रिक्तियां 9.3% थीं, जबकि अरुणाचल प्रदेश और नगालैंड में कोई रिक्तियां नहीं थीं. पीसीसी में, दिल्ली में रिक्तियां 44.5% थीं, और लद्दाख, दादरा और नगर हवेली और दमन और दीव में 69% थीं.