पिछली क़िस्त से आगे यह अंतिम भाग…
22 जुलाई 1993 की सुबह. आकाश बादल रहित था, धूप चमक रही थी. मैं आश्वस्त हुआ कि वायुसेना का हेलिकॉप्टर रसद, पाउडर दूध, दवाइयों, इत्यादि के साथ आज, बाढ़ आने के तीसरे दिन, अलीपुरद्वार में उतर पाएगा. तभी हवा का एक हल्का झोंका आया और साथ आई दुर्गंध. मेरी नज़र ख़ुद-ब-ख़ुद परेड मैदान की ओर मुड़ गई. दो दिन से उस मटियाले विस्तार में पड़े पचासों गायों-बैलों के शव सड़ने लगे थे. शहर की गलियों में भी मवेशियों के शव पड़े सड़ रहे थे.
अलीपुरद्वार वासियों की परेशानियां बढ़ती जा रही थीं और मेरी भी. सुबह फिर से मैंने ज़िला मुख्यालय को वायरलेस संदेश भेजा था कि राहत सामग्री से साथ ही मुझे प्राथमिकता से पुलिस या अर्ध-सामरिक बल की आवश्यकता है.
हेलिकॉप्टर को एसडीओ दफ़्तर के ठीक सामने परेड ग्राउंड में उतरना था. हेलिकॉप्टर के उतरने के लिए धुआं संकेत की व्यवस्था कर ली गई थी. ग्यारह बजे होंगे, दक्षिण दिशा से हेलिकॉप्टर आकाश में प्रकट हुआ जिसके उतरने तक दो दर्शक भी जुट गए थे. पायलटों ने बताया कि वह कूच बिहार ज़िले में छोटे खाद्य पैकेट गिराकर आ रहे हैं. अलीपुरद्वार के लिए उनके पास आटे की दो विशालकाय बोरियां थीं. चूंकि बोरियां बहुत बड़ी थीं मैंने दोनों दर्शकों से मदद मांगी और उनकी सहायता के एवज़ में उन्हें आटा देने का वादा भी किया.
परेड मैदान से लौटते हुए मैंने देखा कि थाने के गेट से कुछ लोग निकल रहे हैं. मुझे देखकर वो मेरी ओर दौड़ने लगे. वे अलीपुरद्वार के व्यवसायी समिति के विशिष्ट सदस्य और नेता थे. मैंने हिंदी में उनसे पूछा, ‘क्या हुआ? आप लोग दौड़ क्यों रहें हैं?’ उनमें से एक ने लगभग चिल्लाते हुए कहा, ‘एसडीओ साहब, कुछ कीजिए! बाज़ार में लूटपाट मची हुई है. चारों तरफ़ दंगे हो रहे हैं.’
मैं पूछने लगा, ‘थाना में …’, पर बीच में ही वह बोल पड़े, ‘थाना में तो सब बीमार हो गए हैं. आप ही जल्दी से कुछ कीजिए. हमारे साथ चलिए.’
मेरे पास न तो पुलिस बल था और न ही कोई अन्य असैनिक बल शहर के आस-पास मौजूद था. लेकिन शहर में सेना की एक टुकड़ी थी. मैंने सैन्य शिविर में मेजर पुजारी से बात की. उन्होंने कहा कि उन्हें यहां राहत और बचाव कार्य के लिए भेजा गया है इसलिए वह दंगे में हस्तक्षेप नहीं कर सकते. मैंने उन्हें समझाया कि क़ानून तथा व्यवस्था के बग़ैर राहत कार्य करना असंभव था.
फिर मैंने उनसे कहा कि मैं क़ानूनी तौर पर, ‘आपराधिक प्रक्रिया संहिता,’ 1973 की धारा 131 के अंतर्गत आपसे यह कह रहा हूं. उन्होंने मुझसे कहा कि फिर मुझे लिखित रूप से यह कहना होगा कि शहर में क़ानून व्यवस्था की ज़िम्मेदारी उन्हें सौंप रहा हूं. मैंने उन्हें यह लिखकर सौंप दिया.
सेना के ट्रक से जब हम मुख्य बाज़ार पहुंचे तो हवा में सड़न की तेज बू तैर रही थी, लेकिन यह सड़ते अनाज की बदबू थी. बाज़ार चीखते-चिल्लाते व्यवसायियों से भरा हुआ था. मेरे पास उनमें से कइयों ने दंगाइयों के कुकर्मों तथा अनाज की लूटपाट के साथ महिलाओं के साथ बलात्कार के बारे में भी नालिश की. उनका व्यवहार मुझे कुछ अटपटा, नाटकीय-सा लगा.
यह मुख्यतः गल्ले का बाज़ार था. दुकानों में अन्न की भीगी बोरियां फटी, खुली, बिखरी पड़ी थीं. दुकानों के सामने भीगे गेहूं-चावल-दाल के ढेर और दुकान के पीछे स्थित गोदामों में भी बाढ़ में डूबी छत-छूती बोरियों में अन्न सड़ रहा था. इस गलते दुर्गंधपूर्ण अनाज को लूट कौन रहा था?
हमने व्यवसायियों से बात की और समझाया कि अब सेना अलीपुरद्वार में आ चुकी है, अब डरने का कोई कारण नहीं है.
वापस लौटकर वायरलेस से आई सूचनाएं मिलीं. पता चला कि कालचीनी और कुमारग्राम ब्लॉकों में ही नहीं बल्कि वहां के चाय बाग़ानों में भी खाद्यान्न तथा मिट्टी के तेल जैसी आवश्यक चीजें लगभग ख़त्म हो गई थीं. जलपाईगुड़ी से अलीपुरद्वार आने वाले उत्तरी राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित कई पुल बह गए थे. कल फिर हेलिकॉप्टर से राहत सामग्री आने वाली थी, लेकिन पुलिस या अर्ध-सामरिक बल के आने की कोई खबर न थी.
मैंने अलीपुरद्वार की परिस्थिति के बारे में संदेश लिखना ही आरंभ ही किया था कि शहर के कुछ लोग मेरे कमरे में हांफते हुए पहुंचे. शहर में फिर से दंगा भड़क उठा था. इस बार शहर में बाहर के लोग घुस आए थे और घरों में भी घुसकर लूट-खसोट कर रहे थे. मैं उनको लेकर सेना की शिविर में गया. सेना के पास लाठियां नहीं बंदूकें होती हैं. यह कदापि स्वीकार नहीं किया जा सकता था कि क़ानून और व्यवस्था को बनाए रखने के लिए सेना को बाढ़ पीड़ित नागरिकों पर गोलियां चलानी पड़े.
मेजर पुजारी से मैंने कहा कि शाम हो चली है हमें अब धारा 144, या कर्फ़्यू, जारी करना होगा. सेना के दो ट्रकों पर जवान सवार हुए. उनके हाथों में वही था जो कुछ उन्हें लाठी सरीखा मिल पाया— उनकी नाव के चप्पू और पेड़ों से तोड़ी टहनियां— और दोनों ट्रकों में थीं दो राइफ़लें. पहले ट्रक में मेजर पुजारी और मैं बैठे और मैं हाथ में लाउडस्पीकर लेकर बांग्ला में घोषणा करता चला, ‘शहर में धारा 144 लगा दी गई है और सुबह छह बजे तक घर से बाहर निकलना वर्जित है. सेना को क़ानून-व्यवस्था का दायित्व दे दिया गया है. रात में घर से निकलने पर गोली मार दी जा सकती है.’
इस तरह शाम के गहराते अंधेरे में हमने पूरे शहर की परिक्रमा की. लौटते हुए सारे रास्तों को ख़ाली पाया. यह असर था सेना की उपस्थिति मात्र का.
वापस एसडीओ बंगले में पहुंचकर मैंने अब तक की स्थिति के बारे में ज़िला मुख्यालय को वायरलेस से एक रिपोर्ट भेजी. संदेश भेजकर जब बंगले के ऊपरी, आवासीय तल पर गया तो मुस्कराते हुए मेरी पत्नी ने पूछा, ‘अरे! तुम वापस आ गए? मुझे तो जया (काम वाली महिला) ने कहा था कि ‘शोबाइ बोलचे, एसडीओ शाहेब हेलिकॉप्टरे बोशे पालिए गेचेन (सब कह रहे हैं कि एसडीओ साहेब हेलिकॉप्टर में बैठ कर भाग गए हैं).’ हर रोज़ नई अफ़वाह!
बाहर घुप्प अंधेरा था. मैं नीचे दफ़्तर में बैठकर मोमबत्ती की रोशनी में संदेश पढ़ रहा था. आठ बजे होंगे जब गंभीर मुद्रा धारण किए मेजर पुजारी आए और निशब्द मुझे एक वायरलेस संदेश थमा दिया. उनके कमान अधिकारी ने उनसे जवाब तलब किया था- जब मेजर पुजारी को निर्दिष्ट रूप से राहत और बचाव के लिए भेजा गया था तो उन्होंने अलीपुरद्वार में क़ानून एवं व्यवस्था का बीड़ा क्यों उठाया? उन्हें आदेश मिला था कि वे तत्काल क़ानून और व्यवस्था के कार्यों से सेना बल को हटा लें.
मेरे कहने पर मेजर पुजारी ने शहर में दो जगह अपने जवानों को तैनात किया था. अब वे उन्हें अविलंब हटा लेना चाहते थे. मैंने उनसे कहा कि सिर्फ़ इस रात के लिए उन्हें रहने दीजिए पर वे न माने. अंत में मैंने उनसे अनुरोध किया कि आप रात दस बजे एक ट्रक भेजकर जवानों को हटा लीजिएगा. बस जवानों से भरा वह ट्रक शहर का एक चक्कर लगाकर आ जाए ताकि लोगों को यह लगे कि सेना गश्त लगा रही है. इससे आदेश का भी पालन हो जाएगा और सेना के चौकस होने की धारणा भी बनी रहेगी. चूंकि दस बजने में अब बहुत वक्त न था मेजर पुजारी इस सुझाव को मान गए.
रात भर कोई घटना नहीं घटी पर वह रात भी मैंने जागकर बिताई.
[बाढ़ के लगभग साल भर बाद मुझे पता चला कि अलीपुरद्वार गल्ले का एक वृहद् बाज़ार है. हर वर्ष असम में बाढ़ आने के उपरांत वहां के बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में खाद्यान्न की आपूर्ति अलीपुरद्वार से की जाती थी. 1993 जुलाई में भी असम में आने वाली बाढ़ की तैयारी में अलीपुरद्वार के व्यवसायियों ने अपने गोदामों को चावल, गेहूं, दाल, इत्यादि से भर रखा था. उन्होंने इस माल का हर तरह की आपदाओं के विरुद्ध बीमा भी करवा रखा था- आग, भूकंप, दंगे, इत्यादि के विरुद्ध. लेकिन उन्होंने बाढ़ के विरुद्ध बीमा नहीं करवाया था.
आप निश्चित रूप से सहमत होंगे कि बाढ़ में भीगे गल्ले के बाज़ार में आग लगने या यथोचित समय पर भूकंप होने के मुक़ाबले ऐन वक्त पर दंगे का घट जाना कहीं सरल है.]
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अगले दिन, 23 जुलाई 1993, की सुबह हेलिकॉप्टर से जिला मुख्यालय से अतिरिक्त ज़िला मजिस्ट्रेट और अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक आए, स्थिति का मुआयना किया और फिर हेलिकॉप्टर से ही वापस लौट गए. मुझे लगा कि शायद संध्या तक पुलिस बल और राहत सामग्री भी आ जाएगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
यह दिन भारतीय प्रशासनिक सेवा में मेरे क़रीब चौंतीस वर्ष लंबे कार्य जीवन का सबसे असहाय दिन साबित होने वाला था.
शहर और सबडिवीज़न के अन्य बाढ़ आक्रांत क्षेत्रों में खाद्यान्न, पाउडर दूध, इत्यादि की भारी कमी पड़ गई. रास्ते बंद पड़े थे. शहर के बाज़ार का सब गल्ला बाढ़ के पानी में डूबकर सड़ गया था. अलीपुरद्वार जंक्शन पर अनाज के बोरों से लदी एक लंबी माल गाड़ी खड़ी थी. दोपहर के बाद दल बनाकर लोग माल गाड़ी की वैगनों के ताले तोड़कर बोरियों को लूटने लगे. भीड़ ने जब रेलवे अधिकारियों की चेतावनी अनसुनी कर दी तो आदेशानुसार रेलवे सुरक्षा बल के जवानों ने दुष्कृतियों पर गोली चला दी. संग-संग दो लोगों की मृत्यु हो गई. तब भी लोग न माने.
शाम तक मेरे दफ़्तर के सामने से लोग चावल के बोरे लादे ले जाते दिखे. पूरे दिन मेरे दायित्व क्षेत्र में चारों ओर ऐसी घटनाएं घटती रहीं और मैं मूकदर्शक बना रहा. सूर्यास्त हो गया लेकिन राहत सामग्री लिए कोई ट्रक अलीपुरद्वार नहीं पहुंचा.
§
24 जुलाई, 1993. प्रातः साढ़े तीन बजे जलपाईगुड़ी के ज़िला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक तीन घंटे का रास्ता दस घंटे में पूरा कर मेरे बंगले पर पहुंचे. अगले कुछ दिनों में पुलिस बल, सामरिक और असामरिक बल, राहत, एवं सफ़ाई कर्मचारियों की पलटनों का तांता लग गया. उसके बाद विशिष्ट व्यक्तियों के आने की बारी थी.
दो तीन दिन बाद ही राज्य सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री भी आए जो पेशे से अर्थशास्त्र के सुनाम-धन्य अध्यापक भी थे. जब एक छात्रों का दल उनसे मिला तो उन्होंने वादा किया कि स्थिति सामान्य होने पर वह अलीपुरद्वार कॉलेज में उन्हें अर्थशास्त्र पढ़ाने आएंगे.
राहत कार्य तो कई महीने बाद बंद हो गए, लेकिन पुनर्निर्माण का काम सालों चलता रहा. 2001 में जब मैं ज़िला मजिस्ट्रेट के पद पर कूच बिहार ज़िले में आया तो पाया कि राष्ट्र मार्ग 31 सी पर बाढ़ में ध्वस्त 6 पुल तब भी पूरी तरह नहीं बन पाए थे. और हां, अलीपुरद्वार कॉलेज के कुछ भोले छात्र उन वरिष्ठ मंत्री महोदय की क्लास की अब भी अपेक्षा कर रहे थे.
(चन्दन सिन्हा पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी, लेखक और अनुवादक हैं.)
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