केंद्रीय चुनाव आयोग द्वारा बारह राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों में मतदाता सूचियों का गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन: एसआईआर) कराने की घोषणा के बाद से ही अंदेशे जताये रहे थे कि उसके तहत सबसे ज्यादा ‘खेल’ उत्तर प्रदेश में होंगे. सिर्फ इसलिए नहीं कि वह देश का सबसे ज्यादा जनसंख्या और लोकसभा सीटों वाला राज्य है और इस कारण सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के चुनावी भविष्य के लिहाज से वहां उसका बहुत कुछ दांव पर है. इसलिए भी कि केंद्र के साथ यूपी की भी सत्ता में होने के कारण आयोग की मिलीभगत से संभव ऐसे ‘खेलों’ की सारी सहूलियतें उसी के नाम लिखी हुई हैं.
लेकिन अब राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की इस संबंधी गत रविवार की टिप्पणी ने इन अंदेशों और उनसे जुड़े कयासों को जो नई दिशा दे दी है, उसकी बाबत शायद ही किसी ने पहले सोचा हो. आगे बढ़ने से पहले योगी की इस टिप्पणी पर एक नजर डाल लेते हैं.
केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री पंकज चौधरी के भारतीय जनता पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई का अध्यक्ष ‘चुने’ जाने के बाद रविवार को आयोजित एक समारोह में पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए योगी ने अचानक प्रदेश में एसआईआर की शिथिलताओं कहें या गड़बड़ियों पर बोलना शुरू कर दिया तो, विपक्षी पार्टियां तो विपक्षी पार्टियां, उनकी भारतीय जनता पार्टी की कतारें भी चौंक उठीं.
इसलिए और कि विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस इसी दिन देश की राजधानी दिल्ली में वोट चोरी के विरुद्ध रैली करके नरेंद्र मोदी सरकार, चुनाव आयोग और एसआईआर की लानत-मलामत कर रही थी.
बहरहाल, योगी जो कुछ कहा, कुल मिलाकर उसका लब्बोलुआब यह है कि प्रदेश की मतदाता सूची में 18 वर्ष से ज्यादा के हर प्रदेशवासी का नाम हो तो उसकी 25 करोड़ की जनसंख्या के लिहाज से मतदाताओं की कुल संख्या 16 करोड़ होनी चाहिए, लेकिन एसआईआर के तहत अब तक 12 करोड़ नाम ही आये हैं यानी जितने आने चाहिए, उससे चार करोड़ कम. इस तरह लगभग एक चौथाई मतदाता ‘मिसिंग’ हैं.
कार्यकर्ताओं को स्थिति की गंभीरता समझाते हुए उन्होंने आगे कहा कि प्रदेश की जनवरी, 2025 की मतदाता सूची में कुल 15 करोड़ 44 लाख नाम थे और एक जनवरी, 2026 को 18 साल की उम्र पूरी कर इसमें शामिल होने के योग्य होने वाले युवा मतदाताओं के जुड़ने के बाद यह संख्या और बढ़नी चाहिए थी. लेकिन वह बढ़ने के बजाय घटकर 12 करोड़ रह गई है.
इसके बाद योगी ने इससे भी ज्यादा गौर करने की बात कही. यह कि जो चार करोड़ मतदाता, मतदाता सूची में शामिल होने से रह गए हैं, वे सभी भाजपा के विरोधी नहीं हैं और उनमें 85 से 90 प्रतिशत भाजपा के ही हैं. जाहिर है कि वे कहना चाह रहे थे कि अगर ये मतदाता सूची से बाहर ही रह गए तो चुनाव में भाजपा को बहुत नुकसान हो सकता है.
यहां एक और बात गौरतलब है. यह कि इससे पहले प्रदेश की सबसे बड़े विपक्षी दल- समाजवादी पार्टी (सपा) के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने एसआईआर को लेकर भाजपा व चुनाव आयोग को घेरा तो कहा था कि दोनों मिलकर तीन करोड़ मतदाताओं के नाम काटना चाहते हैं. तीन करोड़ यानी योगी द्वारा ‘मिसिंग’ बताए जा रहे मतदाताओं से एक करोड़ कम. अब योगी ने उनसे आगे बढ़कर चार करोड़ मतदाताओं के मिसिंग होने की बात कह डाली है तो अनेक प्रेक्षकों को वे उनको यानी विपक्ष को भी मात देते लगने लगे हैं.
लेकिन योगी यहीं नहीं रुके. उन्होंने यह दावा भी किया कि हाल में प्रदेश के एक जिले के दौरे में उन्होंने पाया कि भाजपा के विरोधियों द्वारा भरे गए एसआईआर फॉर्मों में बांग्लादेशी नागरिकों के नाम भी हैं. उनके अनुसार एक जगह तो एक ऐसे सज्जन का नाम भी दिखा, जिनकी खुद की उम्र 20 साल, उनके पिता की उम्र 30 साल और दादा की उम्र 40 साल लिखी थी.
इसके बाद तो जैसे बस यही पूछना रह गया कि भला यह कैसा एसआईआर है और किस तरह कराया जा रहा है. लेकिन अंत में योगी ने भाजपा कार्यकर्ताओं से कहा कि सौभाग्य से चुनाव आयोग द्वारा एसआईआर के तहत मतदाताओं के फॉर्म जमा करने का समय बढ़ा दिया गया है तो उनको (कार्यकर्ताओं को) चाहिए कि वे उसका बेहतर उपयोग करके हर बूथ तक और घर-घर जाकर पात्र लोगों के नाम मतदाता सूची में जुड़वाएं.
इतना सब कहकर योगी एसआईआर में गड़बड़ियों को लेकर मुंह खोलने वाले देश के पहले भाजपाई मुख्यमंत्री बन गए तो कई हलकों से कई तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं. कुछ लोगों ने इसे विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों द्वारा एसआईआर को लेकर की जा रही गड़बड़ियों की शिकायतों की पुष्टि के रूप में देखा, तो कई हलकों में यह सवाल भी पूछा जाने लगा कि क्या उत्तर प्रदेश में एसआईआर में ‘खेल’ करने के अरमानों के विपरीत उलटे भाजपा को ही बड़े नुकसान का अंदेशा सताने लगा है?
उप्र के मुख्यमंत्री जी स्वयं कह रहे हैं कि जो 4 करोड़ मतदाता SIR के दौरान वोटर लिस्ट में शामिल नहीं किये गये हैं, उनमें से 85-90% भाजपा के वोटर हैं।
इस बात का :
– पहला मतलब तो ये हुआ कि ‘पीडीए प्रहरी’ के चौकन्ने रहने से SIR में भाजपाइयों का मनमाफ़िक़ जुगाड़ नहीं हो पाया।
-…— Akhilesh Yadav (@yadavakhilesh) December 14, 2025
अखिलेश यादव ने तो ऐसा मानते हुए एक ट्वीट भी कर डाला, जिसमें लिखा कि पीडीए के प्रहरियों की सतर्कता के कारण भाजपा साक्ष्यों के अभाव में अपने उन फर्जी मतदाताओं के फॉर्म नहीं भरवा पाई, जिनकी बिना पर वह चुनावों में खेल किया करती थी. उनके अनुसार अब योगी इन्हीं मतदाताओं को मिसिंग बता रहे हैं, जिनके अनुसार इनका नब्बे प्रतिशत हिस्सा भाजपाई है और वे इसलिए चिंतित हैं कि यह हिस्सा खत्म हो गया तो भाजपा प्रदेश में चुनाव की दौड़ से एकदम से बाहर हो जाएगी.
हालांकि ऐसा कहने वाले भी कम नहीं हैं कि योगी की टिप्पणी के पीछे भाजपा की अंदरूनी राजनीति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व गृहमंत्री अमित शाह से उनके रिश्तों में बढ़ती खटास भी हो सकती है. साथ ही विपक्ष को भ्रम में डाले रखने की कोशिश भी.
वरिष्ठ पत्रकार हरिशंकर व्यास ने तो अपने दैनिक ‘नया इंडिया’ के ‘राजरंग’ स्तंभ में कांग्रेस की उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष अजय राय को यह कहते हुए उद्धृत कर डाला है कि यह कैसी विडंबना है कि एसआईआर चुनाव आयोग करा रहा है और उसकी प्रगति समीक्षा योगी आदित्यनाथ कर रहे हैं.
दूसरी ओर कई प्रेक्षक यह भी कह रहे हैं कि योगी का यह सब कहना केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा संसद में एसआईआर पर हुई बहस के उत्तर में उसकी निरापदता की बाबत लिए गए ‘ बेहद तगड़े’ स्टैंड को भोथरा करने की जानबूझकर की गई कोशिश है. आखिरकार चुनाव आयोग द्वारा खुद तय की गई समय सीमा (जिसे अब उसने आगे बढ़ा दिया है) में प्रदेश के चार करोड़ यानी लगभग एक चौथाई मतदाताओं के फॉर्म नहीं भरे जा सके तो यह कोई छोटी बात तो नहीं ही है.
दूसरी ओर अंग्रेजी के एक प्रतिष्ठित दैनिक में पिछले दिनों छपी खबर कहती है कि चुनाव आयोग द्वारा मतदाताओं के फॉर्म जमा करने की तारीख बढ़ाने से भाजपा ने ही सबसे ज्यादा राहत की सांस ली है, जिसके बाद कहा जा रहा है कि एसआईआर की निष्पक्षता पर यह भी एक प्रश्नचिह्न है. अगर वह निष्पक्ष होता तो योगी को उसे लेकर इस तरह की टिप्पणी कर एक साथ कई संकेत देने और एक तीर से कई शिकार करने की जरूरत ही नहीं पड़ती.
साधुओं को सुभीता
जो भी हो, चुनाव आयोग द्वारा समय सीमा बढ़ाने से भाजपा के हिस्से कम से कम इतनी सहूलियत तो आ ही गई है कि अयोध्या, वाराणसी, मथुरा व वृंदावन जैसे प्रदेश के धार्मिक जमावड़ों वाले शहरों में साधुओं व संन्यासियों के (जो उसी का वोट बैंक माने जाते हैं) फॉर्म भराने का काम अब वह सुभीते से पूरा करा सकेगी.
शुरू में इस काम में एक समस्या यह आड़े आ रही थी कि साधु-संन्यासियों के फॉर्म में उनकी माता का नाम क्या लिखा जाए?
दरअसल, साधु-संन्यासी अपने साधुत्व या संन्यास ग्रहण करने के दिन अपना ‘नया’ जीवन शुरू या पुनर्जन्म हुआ मानते हैं और उसके बाद पिता की जगह अपने गुरु का ही नाम इस्तेमाल करते हैं, जैविक पिता का नहीं. वे दावा करते हैं कि वे अपना इससे पहले का समूचा जीवन, जैविक माता-पिता समेत, पीछे छोड़ या कि पूरी तरह भूल आए हैं.
धार्मिक मान्यता के अनुसार, गुरु की ओर से ‘पंच संस्कार’ के बाद शिष्य का गोत्र बदलकर भगवान के गोत्र में सम्मिलित हो जाता है और उसका ‘आध्यात्मिक पुनर्जन्म’ हो जाता है. फिर गुरु ही उसके पिता होते हैं.
इस एसआईआर से पहले तक साधु-संन्यासियों को इसके चलते मतदाता बनने में कोई असुविधा नहीं होती थी, क्योंकि पिता की जगह गुरु का नाम लिखने से काम चल जाता था, लेकिन अब एसआईआर के फॉर्म में उन्हें अपनी माता का नाम भी लिखना है और न लिखने पर मतदाता सूची से नाम कट जाने का अंदेशा है.
उक्त खबर के अनुसार, राम मंदिर आंदोलन से जुड़े रहे विश्व हिंदू परिषद के अयोध्या के नेताडॉ. रामविलास दास वेदांती ने (जो भाजपा के लोकसभा के सदस्य भी रह चुके थे और पिछले दिनों अचानक देहांत के बाद अब इस संसार में नहीं हैं) अपनी ओर से इस समस्या का यह समाधान निकाला था कि साधु-संन्यासी फॉर्म में अपनी माता के नाम की जगह जानकी लिख दें, जो माता सीता का नाम है. खबर के मुताबिक उन्होंने अपने स्वयं के फॉर्म में भी यही लिखा था.
अयोध्या के स्थानीय भाजपा नेता भी साधुओं व संन्यासियों को यही समझा रहे थे. उन्हें अपनी माता के रूप में भगवान राम की माता कौशल्या का नाम लिख देने का विकल्प भी सुझाया जा रहा था. लेकिन समस्या इतनी ही नहीं थी, बहुत से यायावर साधु न अपने दर्ज पतों पर उपलब्ध थे, न ही आनलाइन फॉर्म भरने में रुचि रखते थे. इस कारण उनके फॉर्म भरना संभव नहीं हो रहा था.
यह भी बताते हैं कि वाराणसी व मथुरा के अनेक साधुओं ने फॉर्म भरे तो उनमें माता के नाम वाला कॉलम खाली छोड़ दिया है. अगर इसके चलते उनके फॉर्म रद्द किए गए तो ड्राफ्ट मतदाता सूची प्रकाशित होने के बाद आपत्तियां दाखिल की जाएंगी.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
