पर्यावरण मंत्रालय की अरावली में नए खनन पट्टों पर प्रतिबंध की घोषणा में कोई नई बात नहीं

अरावली की नई परिभाषा के ख़िलाफ़ भारी विरोध के बाद केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय का बुधवार का खनन पर रोक लगाने संबंधी बयान महज़ उन्हीं बातों को दोहराता है, जो सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर के अपने आदेश में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय से करने के लिए कहा था.

अरावली विरासत जन अभियान' ने कहा है कि का पर्यावरण मंत्रालय का हालिया प्रेस नोट पूरी तरह से भ्रामक है. (फोटो साभार: अरावली बचाओ जन अभियान)

नई दिल्ली: अरावली की नई परिभाषा, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर को मंज़ूरी दी थी- के खिलाफ भारी विरोध और गुस्से के बाद केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने बुधवार (24 दिसंबर) को घोषणा की कि उसने उन राज्यों को निर्देश जारी किए हैं जहां यह पहाड़ी श्रृंखला फैली हुई है, कि अरावली में किसी भी नई माइनिंग लीज़ देने पर ‘पूरी तरह से रोक’ लगाई जाए.

हालांकि, इसमें कोई नई बात नहीं है.

यह सिर्फ वही निर्देश है, जो सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर के अपने आदेश में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय को करने के लिए कहा था- उस आदेश में अदालत ने अरावली की एक समान नई परिभाषा को मंज़ूर किया था, जिसके अनुसार केवल 100 मीटर या उससे ज़्यादा की स्थानीय ऊंचाई वाली पहाड़ियां ही अरावली पहाड़ी श्रृंखला मानी जाएंगी.

पर्यावरणविदों ने इसे लेकर चिंता जताई है कि इसका अर्थ यह हो सकता है कि पहाड़ी श्रृंखला का एक बड़ा हिस्सा खनन (माइनिंग) के लिए खोल दिया जाएगा, जिसके बाद पिछले हफ्तेभर में राजस्थान में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए हैं. विपक्षी दलों ने भी इन विरोध प्रदर्शनों को समर्थन दिया है और इस मुद्दे को मीडिया में भी खासी कवरेज मिली.

नए खनन पट्टे नहीं

पर्यावरण मंत्रालय ने 24 दिसंबर को एक प्रेस रिलीज़ में कहा कि केन्‍द्र ने राज्य सरकारों को अरावली में किसी भी प्रकार के नए खनन पट्टे देने पर ‘पूर्ण प्रतिबंध’ लगाने के निर्देश जारी किए हैं. मंत्रालय ने जोड़ा कि यह रोक ‘पूरी अरावली रेंज पर समान रूप से लागू होगा और इसका मकसद इस रेंज की अखंडता को बनाए रखना है.’

मंत्रालय के बयान में यह भी कहा गया है कि इन निर्देशों का लक्ष्य गुजरात से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र तक फैली सतत भूवैज्ञानिक श्रृंखला के रूप में अरावली की रक्षा करना और सभी अनियमित खनन गतिविधियों को रोकना है.

इसमें यह भी कहा गया है कि मंत्रालय ने भारतीय वानिकी अनुसंधान और शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई- जो केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के तहत एक ऑटोनॉमस संस्थान है) को पूरे अरावली क्षेत्र में अतिरिक्त क्षेत्रों/जोनों की पहचान करने का निर्देश दिया है. केंद्र द्वारा पहले से ही खनन के लिए प्रतिबंधित क्षेत्रों के अलावा पारिस्थितिक, भूवैज्ञानिक और भू-भाग स्तर के विचारों के आधार पर इन जगहों पर खनन प्रतिबंधित किए जाने की आवश्यकता है.

बयान आगे कहता है, ‘संपूर्ण अरावली क्षेत्र के लिए सतत खनन हेतु एक व्यापक, विज्ञान-आधारित प्रबंधन योजना (मैनेजमेंट प्लान फॉर सस्टेनेबल माइनिंग- एमपीएसएम) तैयार करते समय आईसीएफआरई को यह कार्य करने का निर्देश दिया गया है. यह योजना, संचयी पर्यावरणीय प्रभाव और पारिस्थितिक वहन क्षमता का आकलन करने के साथ-साथ पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील और संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्रों की पहचान करेगी और बहाली एवं पुनर्वास के उपाय निर्धारित करेगी. इस योजना को व्यापक हितधारक परामर्श के लिए सार्वजनिक किया जाएगा.’

बयान में यह भी कहा गया है कि ‘केंद्र द्वारा यह प्रयास स्थानीय स्थलाकृति (किसी जगह की ज़मीन की बनावट, सतह की विशेषताओं जैसे- पहाड़, नदियां, घाटियां और ऊंचाई-नीचाई का अध्ययन या विवरण), पारिस्थितिकी और जैव विविधता को ध्यान में रखते हुए, संपूर्ण अरावली क्षेत्र में खनन से संरक्षित और प्रतिबंधित क्षेत्रों के दायरे को और अधिक बढ़ाएगा.’

केंद्र सरकार ने यह निर्देश भी दिया है कि ‘पहले से ही चालू खदानों के बारे में सम्बंधित राज्य सरकारें सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के अनुरूप सभी पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों का कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित करें. पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ खनन पद्धतियों के पालन को सुनिश्चित करने के लिए चल रही खनन गतिविधियों को अतिरिक्त प्रतिबंधों के साथ सख्ती से विनियमित किया जाना चाहिए.’

कुछ नया नहीं

हालांकि, यह प्रतिबंध नया नहीं है, और न ही वे ‘निर्देश’ नए हैं जो मंत्रालय ने प्रेस रिलीज़ में दिए हैं.

ये सिर्फ़ वही बातें हैं जो सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर के अपने आदेश में पर्यावरण मंत्रालय से करने के लिए कहा था. इस आदेश में कोर्ट ने कहा कि झारखंड में सारंडा वाइल्डलाइफ सैंक्चुरी के लिए मंत्रालय द्वारा करवाया गया आईसीएफआरई अध्ययन (जो एक अलग केस से संबंधित थी जिसकी सुनवाई कोर्ट कर रहा था) में राज्य के सारंडा और चाईबासा के लिए भी एक एमपीएसएम शामिल था.

कोर्ट ने कहा था कि आईसीएफआरई के ‘जियो-रेफरेंस्ड इकोलॉजिकल असेसमेंट से खनन के लिए उपयुक्त क्षेत्रों, सख्त इकोलॉजिकल सुरक्षा की ज़रूरत वाले क्षेत्रों और उन ज़ोन की पहचान करने में मदद मिली जहां बायोडायवर्सिटी वैल्यू के लिए संरक्षण को प्राथमिकता देना ज़रूरी था.’

इसलिए, अदालत ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय को अरावली के लिए भी ऐसा ही करने- यानी एमपीएसएम विकसित करने– का निर्देश दिया था, और कहा कि यह अरावली की ‘इकोलॉजी और पर्यावरण के हित में’ होगा कि पहाड़ी श्रृंखला के लिए भी इसी तरह का अध्ययन किया जाए.

कोर्ट ने साफ तौर पर निर्देश दिया था कि जब तक एमपीएसएम पूरा नहीं हो जाता, कोई नया खनन पट्टा नहीं दिया जाना चाहिए. इसमें यह भी कहा गया कि एक बार एमपीएएसएम पूरा हो जाने के बाद खनन सिर्फ़ योजना के हिसाब से ही करने की इजाज़त होगी. इस दौरान, जो खदानें पहले से चल रही हैं, उनमें खनन गतिविधियां ‘पूरी सख़्ती से’ उस कमेटी की सिफारिशों के हिसाब से जारी रहेंगी, जिसने अरावली की नई परिभाषा बनाई थी.

‘मंत्रालय का प्रेस नोट पूरी तरह से भ्रामक’

इस बीच विरोध प्रदर्शन का हिस्सा रहे जन संगठन- अरावली विरासत जन अभियान’ ने कहा है कि का पर्यावरण मंत्रालय का हालिया प्रेस नोट पूरी तरह से भ्रामक है.

संगठन द्वारा जारी एक बयान में कहा गया, ‘प्रेस नोट केवल सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को दोहराता है. न्यायालय ने स्वयं अपने फैसले में कहा है कि एमपीएसएम संपूर्ण भूवैज्ञानिक अरावली पर लागू होगा, न कि 100 मीटर की सीमित परिभाषा पर. पर्यावरण मंत्रालय द्वारा भेजे गए पत्र में कुछ भी नया नहीं है. राज्य सरकार को भेजे गए पत्र निर्देश नहीं हैं, बल्कि केवल वही बातें दोहरा रहे हैं जो सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कही हैं. पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 5 के तहत कोई निर्देश जारी नहीं किए गए हैं.’

बयान में आगे कहा गया कि प्रेस नोट में यह नहीं कहा गया है कि मंत्रालय 100 मीटर के मानक का पालन नहीं करेगा. पर्यावरण मंत्री जी को यह जानता को जवाब देना होगा कि एक समान परिभाषा के लिए कोई सार्वजनिक परामर्श क्यों नहीं किया गया? सार्वजनिक टिप्पणियां और सुझाव मांगने की लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पालन किए बिना इसे न्यायालय को क्यों सौंप दिया गया?

संगठन का कहना है कि मंत्रालय की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, आईसीएफआरई को पारिस्थितिक, भूवैज्ञानिक और भूदृश्य संबंधी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए उन अतिरिक्त क्षेत्रों की पहचान करने का निर्देश दिया गया है जहां खनन प्रतिबंधित किया जाना है, ‘हमें आश्चर्य है कि सामाजिक और आजीविका संबंधी पहलुओं पर विचार नहीं किया गया है,’ बयान कहता है.