आदिवासी समाज को कट्टर बनाकर उसमें धर्म की लड़ाई पैदा करने की कोशिश की जा रही है: जसिंता केरकेट्टा

कवि, लेखक, पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता जसिंता केरकेट्टा को उनके सृजन के अतिरिक्त देश के आदिवासियों की स्थिति पर अनेक राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय संवादों-परिसंवादों के लिए भी जाना जाता है. वे मानती हैं कि आदिवासियों की निगाह से देश अपनी परवाह करते हुए अपने आसपास और देश-दुनिया और प्रकृति की परवाह करने का नाम है और इसमें संकीर्णताओं की कोई जगह नहीं है. उनसे बातचीत.

'आदिवासी अपने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के अपने संघर्ष में इतना ही तो चाहते हैं कि बड़ी कंपनियों के हित साधन के लिए विकास के नाम पर उन्हें उजाड़ा न जाए. इसके लिए भी वे सरकार से संवाद चाहते हैं और उनकी इच्छा है कि वह इस बाबत उनके वास्तविक प्रतिनिधियों को विश्वास में ले.' फोटो साभार: फेसबुक/@jacinta.kerketta.7)

झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम ज़िले के खुदपोस नाम के गांव में एक उरांव आदिवासी परिवार में 1983 में 03 अगस्त को पैदा हुई अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कवि, लेखक, पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता जसिंता केरकेट्टा को आज की तारीख में उनके सृजन के अतिरिक्त देश के आदिवासियों की स्थिति पर अनेक राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय संवादों-परिसंवादों के लिए भी जाना जाता है.

लेकिन एक समय ऐसा भी था, जब उन्हें कठिन जीवन संघर्ष के बीच अपनी राह बनानी पड़ी. स्वाभाविक ही उनका बचपन भीषण गरीबी व अभावों के बीच गुजरा और छुटपन में हाटों-बाज़ारों में इमली बेचकर परिवार की गुजर-बसर के लिए पैसे जुटाने पड़े. फिर भी उन्होंने शिक्षा पाने की अपनी लगन को कतई कमजोर नहीं पड़ने दिया और धनाभाव कॉलेज की शिक्षा के आड़े आया तो उनकी मां ने ज़मीन गिरवी रखकर भी उसकी व्यवस्था की. फिर भी काम नहीं चला तो उन्होंने स्वयं कई छोटे-मोटे काम करके परिस्थिति का सामना किया.

उन्होंने कठिन संघर्ष के दिनों में ही कवि कर्म आरंभ कर दिया था, लेकिन उनके पहले कविता संग्रह ‘अंगोर‘ का इंतजार 2016 में खत्म हुआ, जब आदिवाणी प्रकाशन, कोलकाता ने उसे हिंदी व अंग्रेज़ी में एक साथ प्रकाशित किया. अलबत्ता, इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और अब वे देश की पहली ऐसी आदिवासी कवि-प्रतिभा मानी जाती हैं, जिनके कविता संग्रहों का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक साथ तीन-तीन भाषाओं में प्रकाशन हुआ है. इतना ही नहीं, उनकी अनेक कविताओं का कई भारतीय व विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ है, जिनमें जर्मन, इतालवी, फ्रेंच, स्पेनिश, पंजाबी, उर्दू, गुजराती, मराठी, असमिया, कन्नड़, तमिल व संथाली आदि भाषाएं शामिल हैं.

इसके अतिरिक्त उन्हें ऑस्ट्रेलिया, यूक्रेन, इजरायल और रूस आदि के कई विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है और कविता पाठ व संवाद के लिए वे अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी, फ्रांस, इटली, स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रिया, ब्राजील, चिली, कोस्टारिका और थाईलैंड आदि देशों की यात्राएं कर चुकी हैं.

आलोचकों के अनुसार उनकी कविताओं में उनका व्यक्तिगत दुख समष्टिगत दुख में अभिव्यक्त होता हुआ अपने समाज के विमर्श को आगे बढ़ाता है. गहरी, अचेतन व अनकही भावनाओं को शब्दों व छवियों में पिरोने की उनकी कला अनूठी है और इस कला के जरिए वे इन भावनाओं को वास्तविकता का रूप दे देती हैं.

पिछले दिनों अवध का प्रतिष्ठित माटी रतन सम्मान ग्रहण करने वे अयोध्या आईं तो लेखक-पत्रकार कृष्ण प्रताप सिंह ने उनसे लंबी बातचीत की. पेश हैं उस बातचीत के प्रमुख अंश :

आप पहली बार अयोध्या आईं हैं, कैसी लगी यह नगरी?

यह देखकर खुशी हुई कि सत्ता और ताकत रखने वालों द्वारा नफरत बढ़ाने के लिए पूरी ताकत लगा देने के बावजूद अयोध्या में न सिर्फ हिंदुओं व मुसलमानों बल्कि दूसरे धर्मों व संप्रदायों के लोगों के बीच के भाईचारे में भी दरार नहीं पड़ी है. उल्टे वह और मजबूत हुआ दिखाई देता है.

इससे पहले न्यूज चैनलों, अख़बारों और अन्य सूचना व समाचार माध्यमों की मार्फत मैं जो अयोध्या देख पाती थी, उसमें अयोध्या कम और उसका इस्तेमाल ज्यादा दिखाई देता था- साफ कहूं तो सत्ता की सीढ़ी के रूप में उसके इस्तेमाल की राजनीति ज्यादा नजर आती थी. लेकिन यहां आकर मैंने देखा कि आम लोग अवध की पारंपरिक गंगा-जमुनी तहजीब के अनुरूप स्वाभाविक साझेपन के साथ जी रहे हैं और उन्हें एक दूजे से कतई कोई समस्या नहीं है.

इससे मेरा यह विश्वास और मजबूत हुआ कि आम लोगों का साझा जीवन में विश्वास मजबूत रहे तो बाहर से थोपे गए जातियों व धर्मों के संघर्ष या मतभेद उतने अनर्थ नहीं पैदा कर पाते, जितना उन्हें थोपने वालों को अभीष्ट होता है. थोपने वालों को क्या अभीष्ट है, इसे इस बात से समझ सकते हैं कि सत्ता में आने के बाद उनके द्वारा धर्म को हथियार बनाकर जो विकास व बदलाव किए जा रहे हैं, वे भी धर्म से उसके मूल्य व मौलिकता छीन ले रहे हैं.

फिर भी मैं समझती हूं कि यह बहुत बड़ी बात है कि तमाम झंझावातों के बावजूद आम अयोध्यावासियों का यह विश्वास मजबूत है कि मनुष्य का जीवन दुश्मनी से नहीं आपसी सहयोग से चलता है और वे उसे परस्पर सहयोग से ही चला रहे हैं.

लेकिन क्या आप जानती हैं कि जिन आदिवासियों के सरोकारों का आप प्रतिनिधित्व करती हैं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार के संगठनों द्वारा अयोध्या में उनमें नए सिरे से हिंदू होने की चाह जगाने के लिए नाना प्रकार की कवायद की जाती रहती हैं?

हां, पता है मुझे. और अयोध्या की इन कवायद के लिए जिन राज्यों से आदिवासी युवकों व युवतियों को लाया जाता है, उनमें भी जो आदिवासी ईसाई नहीं हुए हैं, संघ परिवार के संगठन उन्हें बरबस हिंदू ही कहते और साबित करने में लगे रहते हैं.

वहां आदिवासी समाज से उसका परंपरागत लचीलापन छीनकर उसे कट्टर बनाकर उसमें धर्म की लड़ाई पैदा करने की कोशिश की जा रही है, जबकि आदिवासी समाज में एक ही गांव में अलग धर्मों को मानते हुए भी आपस में सौहार्दपूर्वक रहने की क्षमता है. किसी भी दूसरे धर्म को स्वीकार करने को लेकर भी यह समाज हमेशा से लचीला रहा है. और दूसरे धर्मों के प्रभाव के बावजूद लोगों ने प्रकृति पूजा, अपने पर्व त्योहारों को छोड़ा नहीं है. आदिवासी समाज इसी तरह सामंजस्य के साथ जीने वाला समाज है.

लेकिन चिंता की बात इतनी ही नहीं है. आज सत्ता द्वारा संवेदनहीन, डरा हुआ और क्रूर समाज बनाने की कोशिशों में अपनी शक्तियों का जो घोर दुरुपयोग किया जा रहा है, आदिवासी समाज भी उसकी जद में हैं. हालांकि वह जानता है कि जो प्रकृति उसकी आराध्य है, असीमित शक्तियों से सम्पन्न होने के बावजूद वह अपनी शक्तियों का बेहद कोमलतापूर्वक इस्तेमाल करती है और अपवादस्वरूप ही रौद्र रूप धारण करती है. वह भी मनुष्य द्वारा अविवेकपूर्ण अंधाधुंध दोहन से खिन्न होकर. इसलिए यह समाज सत्ता से भी अपनी शक्तियों के कोमलता से इस्तेमाल की ही अपेक्षा करता है.

ऐसे में आदिवासियों में नए सिरे से हिंदू होने की चाह जगाने के प्रयत्न सफल हो जाएंगे या…?

साफ-साफ कहूं तो इन दिनों इस देश के आदिवासी कई प्रवाहों के बीच खड़े हैं. नक्सलवाद और गांधीवाद के प्रवाहों से तो वे पहले से ही बावस्ता थे, अब हिंदुत्व के प्रवाह से भी हैं. यह प्रवाह सत्ता में है तो स्वाभाविक ही उसका इकबाल कुछ ज्यादा बुलंद है और वह उनमें अपने ‘धर्म का गर्व’ जगाने को आतुर है. यह बात भी उसके पक्ष में जाती है कि लोकतंत्र में बनते-बिगड़ते सत्ता व शक्ति के समीकरणों में आदिवासियों को भी अपने हिसाब से किसी न किसी तरफ जाकर अपने लिए जगह बनानी है.

इसके बावजूद उनमें हिंदू होने की चाह जगाना आसान नहीं, क्योंकि उनका प्रकृति से नाभिनालबद्ध जीवन दर्शन हिंदू धर्म के ढांचे से मेल नहीं खाता. उनके जीवन दर्शन में कट्टरता व हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है और वे अपनी आदिवासियत से कतई समझौता नहीं करना चाहते. जाति या वर्ण व्यवस्था तो वे जानते ही नहीं. उनकी संस्कृति असहमतियों का आदर करने की है और हिंसा उनके लिए अंतिम से भी अंतिम विकल्प है.

गौरतलब है कि गांधीवाद की तमाम उदारता के बावजूद वे उसके साथ बहुत सहज नहीं रहते क्योंकि वह भी कमोबेश हिंदू धर्म के ढांचे में ही बात करता है. दूसरी ओर नक्सलवाद के साथ उनकी मुश्किल यह है कि हिंसक तौर-तरीके उनके स्वभाव में नहीं हैं. उसमें तो सह-अस्तित्व की भावना है. लेकिन वे क्या करें जब उन्हें ऐसे असुविधाजनक सवाल के सामने खड़ा होना पड़ जाए कि वे नक्सलियों या माओवादियों के साथ हैं या अपेक्षाकृत ज्यादा हिंसक व क्रूर सरकारी बलों के?

इसके बावजूद वे बदलाव के लिए ऐसे शांतिपूर्ण आंदोलन ही चाहते हैं, जो उनको किसी और ढांचे में फिट करने के बजाय खुद को उनकी आदिवासियत के ढांचे में फिट करता हो. यही कारण है कि उनमें जो अपने को हिंदू नहीं मानते और ज़्यादातर नहीं ही मानते, हिंदुत्ववादी उनसे चिढ़ते हैं. उन्हें खुद को हिंदू मान लेने पर मिल सकने वाले सत्ता से निकटता के लाभ गिनाते हैं और समझाते हैं कि उनमें जो ईसाई बन गए हैं, वे उनके दुश्मन हैं और वही उनका हक मार रहे हैं.

तो आगे का रास्ता क्या है?

रास्ता तो संवाद से ही निकल सकता है और सच पूछिए तो समस्या सिर्फ इसलिए जटिल होती जा रही है कि संवाद की राह अवरुद्ध कर दी गई है. आदिवासी अपने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के अपने संघर्ष में इतना ही तो चाहते हैं कि बड़ी कंपनियों के हित साधन के लिए विकास के नाम पर उन्हें उजाड़ा न जाए. इसके लिए भी वे सरकार से संवाद चाहते हैं और उनकी इच्छा है कि वह इस बाबत उनके वास्तविक प्रतिनिधियों को विश्वास में ले.

हां ,अब तो नक्सलवादी/ माओवादी भी सरकार से वार्ता चाहते हैं. लेकिन सरकार वार्ता की मांगों की उपेक्षा तो कर ही रही है, नक्सलियों के सफाये के बहाने आदिवासियों को दो पाटों में पीस भी रही है. इसलिए वही हो रहा है जो सत्ता की शक्तियों के क्रूर हो जाने पर होता है. क्योकि तब वह समझती ही नहीं है कि जिसके पास ज्यादा शक्ति होती है, उस पर ज्यादा लोगों की परवाह करने की जिम्मेदारी भी होती है. वह यह जिम्मेदारी निभाती तो जानती कि आदिवासियों ने न कभी ईसाई मिशनरियों को आमंत्रित किया था, न नक्सलवादियों को किया. उल्टे ये ही उन्हें आमंत्रित करते हुए उनके पास आए. वैसे ही जैसे गांधीवादी और हिंदुत्ववादी आए.

आदिवासियों की निगाह से देखें तो देश अपनी परवाह करते-करते, अपने आसपास और देश-दुनिया और प्रकृति की परवाह करने का नाम है और इसमें संकीर्णताओं की कोई जगह नहीं है.

क्या लगता है कि सरकार कभी इस बात को समझना चाहेगी?

उसे समझना ही होगा, क्योंकि और कोई रास्ता नहीं है. लेकिन अभी तो वह जिस राह पर चल रही है, उससे देश में एक प्रिविलेज्ड, डरा हुआ, संवेदनहीन और संकीर्ण समाज पैदा हो गया है जो अपनी शक्तियों का अपने देश के भीतर अपने ही लोगों को खत्म करने के लिए इस्तेमाल कर रहा है. इस स्थिति को बदलने के लिए सच्चे लेखकों, कवियों, साहित्यकारों, पत्रकारों और सिविल सोसाइटी के साथ बहुसंख्यक समाज को नए तरीके से शक्ति की नई परिभाषा देनी होगी. वह परिभाषा जिसके तहत प्रकृति पूजक आदिवासी शक्ति को कठोरता के नहीं बल्कि कोमलता के अर्थ में लेते हैं.

कहते हैं कि प्रकृति प्रदत्त हवा, पानी, माटी, नदियों और बारिश में भी अकूत शक्ति है, जिसकी कोमलता के कारण वहां से जीवन, सभ्यता और उसके बाद नई सभ्यता उगती है. काश, आज की सत्ता उनकी तरह मिलकर उगना और खिलना सीख पाती.

माटीरतन सम्मान लेते समय आपने अपने संबोधन में कहा कि क्रांतिकारी आंदोलन में जिन अशफाकउल्लाह खां की शहादत की याद में इसे दिया जाता है, उनकी और आदिवासियों की आज़ादी की कल्पना समान है…

हां, और इसीलिए अपने मन में पुरस्कारों व सम्मानों के प्रति कोई ललक न होने पर भी मैं इस सम्मान से अपने को कुछ ज्यादा ही गौरवान्वित अनुभव कर रही हूं. यह तब है, जब जो पुरस्कार व सम्मान पहले से मेरे पास हैं, मैं उनके आईने में अपने काम का मूल्यांकन करके संतुष्ट या असंतुष्ट नहीं होती.

मैं इसलिए गौरवान्वित हूं कि क्रांतिकारियों की समूची जमात की तरह अशफाकउल्लाह खां ने जिस आजादी के लिए शहादत दी, उसे लेकर उनका सपना इतना भर नहीं था कि अंग्रेज देश छोड़कर चले जाएं और उनके ही जैसे गैरबराबरी और शोषण के पैरोकार देसी लोग उनकी जगह ले लें.

वे चाहते थे कि आजादी आए तो देश में समानता व बंधुत्व पर आधारित नई व्यवस्था कायम हो और उसमें किसी भी तरह के गरिमाविरोध, अशिक्षा व गरीबी आदि की कोई जगह न हो. जो लोग पदासीन हों, वे अपने पदों के पावर को ही सेलीब्रेट न करते रहें, अपनी जिम्मेदारी को भी समझें.

आदिवासी समाज भी बिल्कुल इसी तरह की आजादी की कल्पना करता है, जिसके चलते अनेक मायनों में उसके लिए आजादी की लड़ाई अभी भी खत्म नहीं हुई है, क्योंकि उसकी आजादी की परिभाषा में प्रकृति को आजाद रखना भी शामिल हैं. उसका इतिहास गवाह है कि गुलामी उससे बर्दाश्त नहीं होती और उसके लिए आजादी का कोर वैल्यू संवाद है.

अयोध्या आने से पहले एक लिट्फेस्ट के सिलसिले में आप पड़ोसी देश नेपाल में थीं, जहां अभी हाल में ही जेन ज़ी ने…

हां, वहां उस जेनरेशन के अनेक सदस्यों से मेरी बात हुई. उन्होंने बताया कि उनके देश में धर्म या समुदाय को लेकर उनकी आपस में कोई लड़ाई नहीं है. जो भी लड़ाई है, सत्ता से है और वह भी अपने सवालों को लेकर है. वे अपनी दुर्दशा के वास्तविक कारणों को पहचान कर सत्ता से सवाल कर रहे हैं कि वह उन कारणों को दूर क्यों नहीं करती. इसका कम से कम इतना फायदा हुआ है कि सत्ताधीश उनके साथ बैठकर उनके सवालों पर बात कर रहे हैं.

लेकिन विडंबना यह कि हमारे देश भारत में ऐसा नहीं है. यहां हम अपनी समस्याओं के लिए सत्ताधीशों से सवाल करने के बजाय पड़ोसियों से सवाल कर रहे और उनको दोषी ठहराकर न सिर्फ उन्हें प्रताड़ित बल्कि उनकी हत्याएं तक कर दे रहे हैं.

सत्ताधीश इसे अपनी सुविधा के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं. उन्होंने धर्म के नाम पर राजनीति का बाजार सजा रखा है और यह देखकर खुश हो रहे हैं कि भूखी, असुरक्षित व बेरोजगार युवा पीढ़ी अपने पुरखों की समृद्धि व सम्पत्ति वापस मांगते-मांगते भव्य प्रार्थना स्थलों के दरवाजे पर सिर झुकाए आ बैठी है. उसे यह समझने में भी मुश्किल पेश आ रही है कि ऐसी राजनीति से हाशिए के लोगों को ही सबसे ज्यादा हानि होती है.

यह पूछने में भी परेशानी है कि ऐसा क्या हुआ है कि आदमी के लिए ईश्वर तक पहुंचने का रास्ता बाजार से होकर जाने लगा है?