उन्नाव रेप केस: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाई, कुलदीप सिंह सेंगर को नोटिस

उन्नाव रेप केस में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें भारतीय जनता पार्टी से निकाले गए पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की उम्रकैद की सज़ा को निलंबित करते हुए उन्हें ज़मानत दे दी गई थी.

कुलदीप सिंह सेंगर और दिल्ली में सर्वाइवर के पक्ष में हुआ एक प्रदर्शन. (फोटो साभार: फेसबुक/पीटीआई)

नई दिल्ली: उन्नाव रेप केस में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें भारतीय जनता पार्टी से निकाले गए पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की उम्रकैद की सज़ा को निलंबित करते हुए उन्हें ज़मानत दे दी गई थी.

लाइव लॉ के मुताबिक, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ सीबीआई और अधिवक्ता अंजले पटेल और पूजा शिल्पकार द्वारा दायर उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी.

शीर्ष अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा, ‘हम इस तथ्य से अवगत हैं कि जब किसी ट्रायल कोर्ट या हाईकोर्ट ने किसी दोषी या विचाराधीन अभियुक्त को ज़मानत पर रिहा किया हो, तो आम तौर पर इस अदालत को उस व्यक्ति को सुने बिना ऐसे आदेश पर रोक नहीं लगानी चाहिए. लेकिन इस मामले में हालात अलग हैं.’

अदालत ने आगे कहा, ‘क्योंकि प्रतिवादी अभियुक्त को आईपीसी की धारा 304-II के तहत भी सजा सुनाई गई है, जो महिला के पिता की गै़र-इरादतन हत्या से जुड़ा मामला है, और वह इस केस में हिरासत में है. इसलिए मामले की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए हम उस आदेश पर रोक लगाते हैं. यानी अभियुक्त को उस आदेश के आधार पर रिहा नहीं किया जाएगा.’

इस मामले में सीबीआई की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि उच्च न्यायालय ने यह मानने में गलती की है कि पॉक्सो अधिनियम के तहत गंभीर अपराध के प्रावधान इस मामले में लागू नहीं होते, क्योंकि सेंगर को लोक सेवक नहीं माना जा सकता.

उन्होंने कहा कि पॉक्सो कानून के तहत अपराध यौन उत्पीड़न और गंभीर यौन उत्पीड़न की अवधारणा पर आधारित हैं, और अपराध की गंभीरता तब उत्पन्न होती है जब अपराधी बच्चे पर हावी होने स्थिति में होता है.

मेहता ने आगे कहा कि पॉक्सो अधिनियम में ‘लोक सेवक’ शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है, इसलिए इसे संदर्भ के अनुसार देखा जाना चाहिए.

उनके अनुसार, पॉक्सो के तहत लोक सेवक का अर्थ वह व्यक्ति होगा जो बच्चे के संबंध में प्रभावशाली स्थिति में हो, और उस स्थिति का दुरुपयोग गंभीर अपराध के प्रावधानों को आकर्षित करेगा.

उन्होंने तर्क दिया कि सेंगर, उस समय क्षेत्र के एक शक्तिशाली विधायक होने के नाते, स्पष्ट रूप से इस तरह के प्रभुत्व का प्रयोग कर रहे थे.

तुषार मेहता ने आगे ये भी कहा, ‘पॉक्सो अधिनियम सर्वोपरि है…कुलदीप सिंह सेंगर को पीड़िता के पिता और कुछ अन्य लोगों की हत्या का भी दोषी पाया गया है…वह अभी भी जेल में हैं…उन्हें रिहा नहीं किया गया है…मैं माननीय न्यायाधीशों से आदेश पर रोक लगाने का अनुरोध करता हूं. हम उस बच्ची के प्रति जवाबदेह हैं!.’

इस पर मुख्य न्यायाधीश ने पूछा कि क्या सीबीआई का तर्क यह है कि पीड़ित के नाबालिग होने पर लोक सेवक होने की अवधारणा अप्रासंगिक हो जाती है?

जवाब में सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि किसी बच्चे पर यौन हमला पॉक्सो के तहत एक अपराध है, और इसकी गंभीरता परिस्थितियों पर निर्भर करती है, जैसे कि प्रभुत्व का दुरुपयोग.

उन्होंने कहा कि सजा बढ़ाने वाले बाद के संशोधनों से कोई नया अपराध नहीं बनता है और इसलिए वे संविधान के अनुच्छेद 20 का उल्लंघन नहीं करते हैं.

सेंगर की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे और एन. हरिहरन ने सीबीआई की दलीलों का विरोध करते हुए दलील दी कि पॉक्सो के तहत गंभीर अपराधों के लिए विधायक को लोक सेवक नहीं माना जा सकता.

उन्होंने कहा कि किसी दंड संहिता में किसी अन्य संहिता की परिभाषाओं को तब तक नहीं लिया जा सकता जब तक कि उसमें स्पष्ट रूप से इसका प्रावधान न हो, और आईपीसी में लोक सेवकों को परिभाषित करने की अपनी योजना है.

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि मुकदमे के दौरान लगाए गए और जवाब दिए गए आरोप आईपीसी की धारा 376(1) के तहत थे. हालांकि, मुख्य न्यायाधीश ने लोक सेवक की परिभाषा से सांसदों/विधायकों को बाहर रखने पर चिंता व्यक्त की.

उन्होंने कहा, ‘यदि इस व्याख्या को स्वीकार किया जाता है, तो कांस्टेबल या पटवारी लोक सेवक होंगे, लेकिन विधायक/सांसद नहीं होंगे और उन्हें छूट मिल जाएगी.

मालूम हो कि इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार 23 दिसंबर को कुलदीप सिंह सेंगर की सज़ा निलंबित करते हुए उन्हें ज़मानत दे दी थी. इस फैसले के बाद से ही पीड़िता, उनकी मां, कई सामाजिक कार्यकर्ता और नागरिग समाज के लोग इसका लगातार विरोध कर रहे थे.