दिल्ली में इतनी धुंध और प्रदूषण है कि ऐसे में नववर्ष के लिए कुछ शुभकामनाएं करना बहुत कठिन, बहुत धुंधली कोशिश लग रही है. इसकी कोई संभावना दिखाई नहीं पड़ती कि हमारे सार्वजनिक जीवन में कुछ साफ़-सुथरापन नए वर्ष में आ पाएगा. हम झूठ-झांसे-झगड़े-नफ़रत-अत्याचार-हिंसा-बलात्कार आदि के इतना आदी हो गए हैं कि उनका विरोध तो दूर उनसे नए वर्ष में हम कुछ ऊबने लगेंगे इसकी कोई उम्मीद नहीं की जा सकती.
ऐसा, नए वर्ष में, क्या हो जाएगा कि सार्वजनिक संवाद की भाषा अभद्र, आक्रामक, अतर्कित होने के बजाय, भद्र, शांत और तर्कपूर्ण हो जाएगी?
ऐसा कैसे हो जाएगा कि लोकतंत्र में तंत्र के बजाय लोक का, धर्मों में हिंसा असहिष्णुता के बजाय संवाद और भद्राचार का, मीडिया में ‘फ़ेक’ के बजाय असली की जगह का, लेखकों में कीचड़ उछाल के स्थान पर सद्भाव और पारस्परिकता का, क़ानून में प्रक्रिया और दुर्व्याख्या की जगह न्याय का, कलाकारों में कायर चुप्पी की जगह निर्भीकता से बोलने के साहस का, सामान्य जीवन में तरह-तरह के फॉर्म भरने, कार्ड बनवाने की ज़िल्लत को ख़त्म कर जीवन सुगम बनाने के प्रयत्न का, बाज़ार में अपार लिप्सा के बजाय सामाजिक ज़िम्मेदारी का, अज्ञान के दैनंदिन महिमामंडन से मुक्त होकर ज्ञान के सम्मान का वर्चस्व हो जाएगा?
ऐसा क्यों हो जाएगा कि हम फिर उम्मीद करने, सपने देखने, दूसरा विकल्प खोजने, असहमत होने, प्रश्न पूछने, चकाचौंध से छुपाए जा रहे अंधेरों की शिनाख्त करने, भव्यता के लबादे ओढ़े क्रूरता को सही नाम से पुकारने में समर्थ हो जाएं?
अगर यह सब नहीं होना है तो नया वर्ष एक पंचांग की घटना भर है, उससे अधिक कुछ नहीं. वह आए, न आए, बीत जाए क्या फ़र्क पड़ता है?
घर में पुरुष
विनोद कुमार शुक्ल की कविता पंक्तियों का सहारा लेकर कहा जा सकता है कि इतिहास अब अधिक है, ‘सर्वत्र अधिक है’. जो भी है, वह अतीत के शासकों के किए धरे पर एकाग्र है और अक्सर दुर्व्याख्या पर आधारित है. उसमें लोग नहीं हैं: वह लगभग लोगों से ख़ाली इतिहास है.
ऐसे माहौल में विख्यात इतिहासकार ज्ञानेंद्र पांडेय की एक पुस्तक आई है ‘मैन एट होम’ जिसे भारत में ओरिएंट ब्लैकस्वान ने प्रकाशित किया है. उसमें इतिहास ऐसे कुछ लोगों को, जो सार्वजनिक हस्तियां थे, उनके घरों में यानी अपने पारिवारिक और वैवाहिक जीवन में देखने की कोशिश की गई है. आधार सामग्री बनी हैं इनकी आत्मकथाएं, संस्मरण, समवर्ती वृतांत आदि. नतीजन इस पुस्तक में आधुनिक भारतीय घरों में पुरुषों और स्त्रियों के सजीव अनुभवों, विवाह-आत्मीयता-संगसाथ के अहसास का बखान है और इसका भी कि कैसे लगातार घरेलू परिसर में लिंग-वर्ण-वर्ग के सरोकार सक्रिय रहे आते हैं.
इसका भी कुछ विश्लेषण है कि औपनिवेशिक और उत्तर-औपनिवेशिक दक्षिण-पूर्व एशिया में सम्मान और शर्म, अधिकार और ज़िम्मेदारी, नागरिकता और बसाव के बारे में किस तरह के प्रश्न उठते हैं.
इतिहास की पुस्तकें अक्सर, जब वे राजवंशावली से अलग कुछ करने की कोशिश करती हैं तब भी जीवन और समाज, आर्थिक स्थिति, राजनीतिक संघर्ष आदि का बखान और विश्लेषण करती हैं. उनमें मानवीय संबंधों के बारे में प्रायः कम ही कुछ होता है जैसे कि सब कुछ बदलता रहता पर मानवीय संबंधों में कोई ख़ास बदलाव नहीं आते या जो आते हैं वे ध्यान देने योग्य नहीं होते. इस सबसे अलग यह पुस्तक घर-बाहर के परिसर में संबंधों की स्थिति, विडंबना और उनके आशयों की गहरी पड़ताल करती है.
इस पड़ताल के दायरे में आए हैं महात्मा गांधी, भीमराव आंबेडकर, हरिवंश राय बच्चन, राहुल सांकृत्यायन, राजेन्द्र प्रसाद, प्रेमचंद, अख़्तर हुसैन रायपुरी, ओमप्रकाश वाल्मीकि आदि. वह भारतीय-आधुनिक कैसे रचा-गढ़ा गया इसका भी कुछ तीक्ष्ण विश्लेषण करती है.
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने, जो भारतीय गणतंत्र के पहले राष्ट्रपति चुने गए थे और स्वतंत्रता संग्राम में एक अग्रणी राजनेता थे, स्वयं बताया है कि अपनी वैवाहिक ज़िंदगी के पैंतालीस वर्षों में पैतालीस महीनों से भी कम अपनी पत्नी के साथ बिताए होंगे. प्रेमचंद अपनी दूसरी पत्नी शिवरानी की, जो बाल विधवा थीं, निर्भीकता, ईमानदारी, निर्दोषिता आदि की प्रशंसा करते हुए यह नोट करते हैं कि वे गांधी जी के असहयोग आंदोलन में भाग लेकर जेल गई हैं. पर अपने बारे में यह जोड़ते हैं कि उनके लिए जीवन हमेशा काम और काम ही रहा है और जब वे सरकारी मुलाज़िम थे तो अपना सारा वक़्त साहित्यक काम करते रहते थे- उन्हें अपने काम में ही आनंद मिलता था.
राहुल सांकृत्यायन के व्यवहार में अंतर्विरोध था: जब घर में होते थे तो बेचैन और तुनकमिजाज़ और बाहर तो और ज़्यादा बेचैन और भावुक आसक्ति. उन्होंने पांच बिंदुओं का एक घोषणापत्र ही बनाया. एक, वरिष्ठ पुरुष को युवा स्त्री से कभी विवाह नहीं करना चाहिए. दो, जिसने 50 वर्ष की आयु होने तक घर की कोई ज़िम्मेदारी न उठाई हो उसे दोगुना सावधान होना चाहिए- नेति, नेति. तीन, अगर किसी ने इतने समय घर की ज़िम्मेदारी नहीं संभाली तो इसका अर्थ है कि वह किन्हीं आदर्शों से प्रेरित है. ऐसे व्यक्ति को अपने को बंधन में नहीं डालना चाहिए. चार, जिस किसी ने अपना लंबा जीवन दुनिया में भटकने में लगाया हो उसे विवाह से बहुत दूर रहना चाहिए. पांच, इसके अलावा अगर कोई ज्ञान की खोज में लगा है तो उस पर यह प्रतिबंध पूरा है.
ज्ञानेंद्र पांडेय बताते हैं कि बहुत सारे पुरुष विचारकों और कर्मठों के लिए घर में बिताया समय बीमारी से उबरने, आराम-राहत, थकान और पराजय से छुटकारा पा सकने की जगह था. उन्होंने कभी घर में अपनी भौतिक उपस्थिति और ज़िम्मेदारियों का, अपनी परिवार और आत्मीय जनों पर अपनी निर्भरता का पूरा एहतराम नहीं किया. वे अक्सर सामने यह तर्क रखते थे कि बाहर की दुनिया में उनका काम ऐसा था जिसके लिए उनकी घर से बाहर उपस्थिति ज़रूरी थी.
एक और दिलचस्प तथ्य यह है कि मध्य और उच्च वर्ग के पुरुष तो खुले आकाश के नीचे सो सकते थे पर ग़रीबों और वंचितों के लिए यह चुनने का मसला नहीं था. ऊपर से सभी वर्गों की स्त्रियां घर के अंदर, भले वहां जगह कितनी ही कम क्यों न हो, ही सो सकती थीं. यह भी कि इसका बहुत कम साक्ष्य हैं कि पुरुष स्त्रियों की भावनाओं और संवेदना का स्पर्श करते हों, न ही उनकी समझ और विवेक को, जिसका एहतराम भी बिरला ही था. पुरुष अधिकतर अपना अहं ही छूते थे. पुरुषों के लिए अपार स्वतंत्रता और स्त्रियों के लिए अनुशासन का परस्पर विरोधी खिंचाव साफ़ दिखाई देता था.
घर तो स्त्रियों का होता था, उसकी देखभाल की ज़िम्मेदारी उनकी होती थी. पर जाना वह पुरुष के नाम से था! ग़ालिब का एक शेर याद आता है:
वादा आने का वफ़ा कीजे ये क्या अंदाज़ है
तुमने क्यों सौंपी है, मेरे घर की दरबानी मुझे.
इस पुस्तक का हिंदी अनुवाद हो रहा है और उम्मीद है कि 2026 में वह प्रकाशित हो जाएगी. इसे हिंदी में व्यापक रूप से पढ़ा जाना चाहिए ताकि हिंदी समाज जान सके कि हमारे इतिहास में क्या-क्या छिपा हुआ है और हम अपनी सचाई कितनी कम जानते-आंकते हैं.
नए वर्ष पर धुंध
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
