सर्दियों के दौरान बंगाल में तीन चीज़ों का बोलबाला रहता है — बंदर टोपी, मफ़लर और खजूर का गुड़. नवंबर महीने के आते ही अलमारियों या बक्सों में अवहेलित पड़े गर्म कपड़े खाटों पर जब तक धूप सेंकने के लिए पसारे जाएं तब तक बंदर टोपियां लपककर लोगों के सिर पर बैठ जाती हैं और मफ़लर उनके गले से लिपट पड़ते हैं.
दक्षिण बंगाल में, जहां ठंड कम पड़ती है, यह दृश्य अधिक देखने को मिलता है. यह बात पश्चिम बंगाल के बाहर भी प्रचलित है कि ये दो वस्त्र इस ऋतु में बंगालियों, विशेषतः वयस्कों तथा बुजुर्गों, के परिधान का अभिन्न अंश बन जाते हैं. यही कारण है कि सर्दियों के समय उत्तर भारत में भ्रमण करते बंगालियों को दूर से ही उनके बंदर टोपी और मफ़लर से पहचाना जा सकता है.
जैसा कि मैंने पहले भी (बंगनामा 5) दिखाने की कोशिश की है, किसी भी स्थान में, चाहे वह राज्य हो या ज़िला, शहर हो या गांव, जन-गण के मध्य प्रचलित रिवाज या आदत का कोई न कोई कार्यात्मक कारण अवश्य होता है. पश्चिम बंगाल में भी शीतकाल में बंदर टोपी और मफ़लर की लोकप्रियता के दो मुख्य कारण हैं.
प्रथम, इस राज्य के बाशिंदे ठंड के अभ्यस्त नहीं हैं क्योंकि अन्य उत्तरी अथवा गांगिय मैदानी इलाके के अनुपात दक्षिण बंगाल में ठंड पड़ती भी कम है तथा रहती भी कम है. इस क्षेत्र में न्यूनतम तापमान मात्र 8 से 12 सेल्सियस तक ही जाता है, जाड़ा दिसंबर के साथ आता है और जनवरी के साथ चला भी जाता है. द्वितीय कारण यह है कि सर्दी होने के बावजूद काफ़ी आद्रता रहती है जिसकी वजह से गले का संक्रमण होने की प्रवणता बनी रहती है. सिर, कान और गले को ढकना और गर्म रखना इस संकट से बचाव का मुख्य उपाय है.
अगर बंदर टोपी और मफ़लर पश्चिम बंगाल में शीतकाल के प्रतीक हैं तो खजूर का गुड़ सर्दियों का स्वाद. दिसंबर के मध्य से खजूर के पेड़ की यह सौगात बाज़ार में आ जाती है और फिर फरवरी की शुरुआत तक इसकी तथा इससे बनी मिठाइयों की बहार बनी रहती है. वैसे तो खजूर के पेड़ के तने से निकले रस से बना यह गुड़ अपने आप में ही एक मिठाई है लेकिन चूंकि इस गुड़ में खजूर का ज़ायका निहित होता है इससे बनी मिठाइयों की बात बिल्कुल अनूठी होती है. इसलिए बंगाल के लोग-बाग बाज़ार में खजूर के गुड़ के आने का इंतज़ार करते हैं.
यह इंगित करना ग़लत होगा कि बंगाल में ही खजूर के गुड़ का इंतज़ार रहता है. पूर्वी भारत में झारखंड, ओडिशा और कुछ हद तक असम में भी इस गुड़ को बनाने का रिवाज है. इसके अलावा खजूर के गुड़ का उत्पादन अन्य कई राज्यों में होता है, जैसे राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र और तमिलनाडु, लेकिन पश्चिम बंगाल के खजूर के गुड़ की सुगंध या स्वाद का कोई सानी नहीं है.
अधिकतर राज्यों में इस गुड़ का गठन और आकार भी गन्ने के गुड़ जैसा ही होता है. लेकिन बंगाल में खजूर का गुड़ दो तरह का होता है. एक तो गाढ़ा द्रव पदार्थ है, जिसे झोला गुड़ भी कहते हैं और दूसरा ठोस, गोलाकार जिसे पाटाली गुड़ के नाम से जाना जाता है. साधारण रूप से झोला गुड़ को नोलेन यानी ‘नया’ गुड़ कहते हैं क्योंकि शीतकाल के आरंभ में पहले यही तैयार होकर बाज़ार में आता है.
खजूर के गुड़ की पहचान का बंगाल से जुड़ने के कुछ निश्चित कारण हैं. कहते हैं बंगाल के खजूर के गुड़ का सबसे प्राचीन उल्लेख ईसा से 400 वर्ष पूर्व पाणिनी की किसी कृति में है, पर मैं इस बात की पुष्टि नहीं कर पाया. यह निश्चित है कि 1205 ई. बंगाल में सेन वंश के राज के दौरान कवि श्रीधरदास द्वारा संकलित ‘सदुक्तिकरणमृत’ नामक संस्कृत काव्य संग्रह के ‘मधुर’ खंड में पहली बार ‘खर्जूर गुड़:’ का उल्लेख है. यह उल्लेख सारण नाम के कवि द्वारा रचित संस्कृत की इन दो पंक्तियों में मिलता है:
‘आम्ररससमायुक्तं कर्पूरचन्दनान्वितम्।
खर्जूरगुडसंयुक्तं प्रीतिर्वः शर्करायने॥’
अर्थात: हे मिठास के प्रेमी, आम्र रस में कपूर, चंदन और खजूर के गुड़ को मिश्रित कर बनाया गया यह पेय आपको हर्षित करे. और जैसा मशहूर है पश्चिम बंगाल में न तो मिठास के प्रेमियों की कमी है और न ही मिठाइयों की.
प्रकृति की इस भेंट को लोगों तक पहुंचाने का दायित्व गाछी/गाछो जाति के लोगों को मिला है जिन्हें राज्य के पश्चिमी भाग में शिउली के नाम से भी जाना जाता है. ‘गाछी’/ ‘गाछो’ गाछ यानी वृक्ष से लिया गया है और इनका तात्पर्य है ‘गाछ वाले’.
यही वह समुदाय है जिसके सदस्य जाड़े के दिनों में सूर्यास्त से ठीक पूर्व खजूर के पेड़ पर चढ़कर उसके तने पर एक चीरा लगाते हैं और उसके नीचे एक हांडी टांग देते हैं. रात भर इस हांडी में उस चीरे से खजूर का रस रिसता हुआ टपकता रहता है. अगली सुबह पौ फटते ही शिउली फिर उस पेड़ पर चढ़कर रस उतार लेते हैं. हर दिन वे चीरे को थोड़ा बड़ा कर देते हैं ताकि रस की धार बनी रहे. पहले चीरे के रस से बने गुड़ को जीरन कहते हैं और इसका स्वाद, दाम और इसकी मांग तीनों ही सबसे ज़्यादा होते हैं.
खजूर के पेड़ का रस पानी की तरह साफ़, पतला और मीठा होता है. अगर इसे पकाने में देर हुई तो यह खट्टा हो जाता है. इस वजह से भिन्न पेड़ों से एकत्रित खजूर के रस को शीघ्र से शीघ्र ले जाकर एक छिछले, सामान्यतः चौकोर, कड़ाही में चूल्हे पर पकाकर गाढ़ा किया जाता है. जाड़े की शुरुआत में तरल झोला गुड़ अधिक बनाया जाता है. कड़ाही से इस गुड़ को पहले ही निकाल लिया जाता है और फिर पाटाली गुड़ बनाने के लिए रस को क्रमशः गाढ़ा कर मिट्टी के सांचों में ढाल दिया जाता है. ठंडा होने पर यह शंक्वाकार पाटाली गुड़ बन जाता हैं.
कुछ सालों से खजूर का गुड़ छोटे, चौकोर चॉकलेट के आकार में भी मिलने लगा है. बोलने की आवश्यकता नहीं है कि नोलेन गुड़ के बाज़ार में आते ही कई मिठाइयां भी खजूर के मोहक गुड़ का रंग और स्वाद ले लेती हैं, चाहे वह तरह-तरह के संदेश हों या चमचम, रसगुल्ले हों या रस मलाई. और तो और आजकल नोलेन गुड़ से बनी आइसक्रीम अत्यधिक लोकप्रिय हो गई है.
दिसंबर के मध्य से कलकत्ता की मिठाई की दुकानों में भीड़ और भी बढ़ जाती है. मकर संक्रांति के अवसर पर भी कई किस्म की मिठाइयां बनाईं जाती हैं जैसे कि कई तरह के पीठे और पाटी शाप्ता- जिन सभी में खजूर के गुड़ डाला जाता है. जाड़े की इन नोलेन गुड़ युक्त मिठाइयों में कौन-सी मिठाई सर्वश्रेष्ठ है तथा किस दुकान की- कई अड्डा सत्रों में यह गहन चर्चा का विषय रहता है. मिठाई ही क्यों, स्वादिष्ट ख़ान-पान के बारे में जहां भी बात उठती है तो नोलेन गुड़ की भी बात होती है.
इस विषय में सुप्रसिद्ध लेखक तथा कवि, सत्यजीत राय के पिता, सुकुमार राय का मत बिल्कुल स्पष्ट था. अपनी कविता ‘भालो रे भालो’ में उन्होंने कहा है:
…किंतु शबार चाइते भालो
पाउरूटी आर झोलार गुड़.
(लेकिन सबमें सबसे अच्छा है पावरोटी और झोला गुड़.)
(चन्दन सिन्हा पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी, लेखक और अनुवादक हैं.)
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