नई दिल्ली: देशभर में ऐप आधारित डिलीवरी और राइड-हेलिंग कंपनियों के कर्मचारियों ने 25 और 31 दिसंबर, 2025 को अपनी आईडी बंद कर काम ठप रखा था और कंपनियों की नीतियों के खिलाफ विरोध दर्ज कराया. ऐप कर्मचारी एकता यूनियन (ऐक्टू) के मुताबिक, इस विरोध में लाखों गिग कर्मचारी शामिल हुए.
यूनियन का कहना है कि स्विगी, जोमैटो, ब्लिंकिट, ज़ेप्टो, पोर्टर, ओला और उबर जैसी कंपनियों के कर्मचारी बीते कई वर्षों से अलग-अलग शहरों में भुगतान, काम के घंटे, बीमा और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को लेकर विरोध जताते रहे हैं.
इस बीच, ब्लिंकिट की मूल कंपनी इटर्नल के सीईओ दीपेंदर गोयल के हालिया बयान को लेकर भी विवाद खड़ा हो गया है. ऐक्टू ने आरोप लगाया है कि कर्मचारियों की शिकायतों पर सुधार के कदम उठाने के बजाय गोयल ने गिग कर्मचारियों के शोषण से इनकार किया. गोयल ने एक्स पर लिखा है,
ज़ोमैटो और ब्लिंकिट ने कल रिकॉर्ड गति से डिलीवरी की – पिछले कुछ दिनों में जिन हड़तालों की अपील की बातें हम सबने सुनी थीं, उनका कोई असर नहीं पड़ा. …अगर कोई व्यवस्था मूल रूप से अनुचित होती, तो वह लगातार इतने लोगों को आकर्षित नहीं कर पाती और न ही उन्हें अपने साथ बनाए रख पाती. कृपया स्वार्थी हितों द्वारा फैलाए जा रहे नैरेटिव्स में बह न जाएं.
यूनियन ने गोयल के बयान को ‘अपमानजनक और असंवेदनशील’ करार दिया है.
यूनियन के अनुसार, गिग कर्मचारियों को औसतन 12 से 14 घंटे काम करने के बावजूद न्यूनतम जीवनयापन योग्य वेतन नहीं मिल रहा है. सड़क दुर्घटनाओं की स्थिति में मुआवज़े का प्रावधान नहीं है और कई मामलों में बीमा क्लेम भी खारिज हो जाते हैं. ऐक्टू का आरोप है कि ब्लिंकिट और स्विगी इंस्टामार्ट जैसी कंपनियों ने पिछले दो वर्षों में डिलीवरी कर्मियों पर काम का दबाव और शोषण बढ़ाया है.
भुगतान प्रणाली को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं. यूनियन का कहना है कि कंपनियां पीक ऑवर्स में ज़्यादा रेट दिखाकर कर्मचारियों को आकर्षित करती हैं, जिससे कर्मियों की संख्या बढ़ जाती है और प्रति कर्मचारी कुल भुगतान कम हो जाता है. भर्ती पर कोई सीमा न होने और एल्गोरिदम आधारित फैसलों के ज़रिए ‘अनुचित श्रम व्यवहार’ (अनफेयर लेबर प्रैक्टिसेज) अपनाने के आरोप भी लगाए गए हैं.
ऐक्टू ने यह भी दावा किया है कि दिल्ली में बीते दो वर्षों के दौरान कई मौकों पर डार्क स्टोर्स में शांतिपूर्ण विरोध कर रहे कर्मचारियों के साथ कंपनी प्रशासन या बाउंसरों द्वारा दुर्व्यवहार और धमकी की घटनाएं सामने आई हैं.
केंद्र सरकार की भूमिका पर सवाल उठाते हुए यूनियन ने कहा कि ऐप कंपनियां कर्मचारियों को ‘पार्टनर’ बताकर श्रम कानूनों से बच रही हैं. यूनियन के मुताबिक, हाल ही में लागू किए गए चार नए लेबर कोड में गिग कर्मचारियों के लिए ठोस सामाजिक सुरक्षा या कंपनियों की जवाबदेही तय करने का प्रावधान नहीं है.
ऐप कर्मचारी एकता यूनियन ने मांग की है कि सभी ऐप कर्मचारियों को श्रम कानूनों के दायरे में लाया जाए, उनके लिए न्यूनतम वेतन सुनिश्चित किया जाए और सामाजिक सुरक्षा के स्पष्ट प्रावधान किए जाएं.
