नई दिल्ली: लद्दाख के पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने कड़े राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत जोधपुर जेल में हिरासत के 100 दिन से अधिक पूरे कर लिए हैं.
वांगचुक को पिछले वर्ष 26 सितंबर को हिरासत में लिया गया था, जब लद्दाख को राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची के तहत संरक्षण की मांग को लेकर किया गया एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन हिंसक हो गया था. इस घटना में चार लोगों की गोली लगने से मौत हो गई थी और 90 लोग घायल हुए थे.
इस मामले की आखिरी सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में 8 दिसंबर को हुई थी और अगली सुनवाई 15 दिसंबर को तय की गई थी. हालांकि, समयाभाव के कारण सुनवाई नहीं हो सकी और उनकी पत्नी गीतांजलि आंगमो द्वारा दायर अपील पर अगली सुनवाई 7 जनवरी के लिए सूचीबद्ध की गई.
गीतांजलि आंगमो ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा, ‘यह समय बेहद चुनौतीपूर्ण और तनावपूर्ण रहा है. पहली बार मैं इतने बड़े मुद्दे को संभाल रही हूं, जहां भारत सरकार से सीधा टकराव है और देश के शीर्ष दो पदों पर बैठे लोगों से मतभेद हैं.’
एनएसए के तहत अधिकतम हिरासत अवधि 12 महीने की होती है, लेकिन आंगमो का कहना है कि सरकार को इतना लंबा समय लेने की जरूरत नहीं थी. उन्होंने कहा, ‘इस मामले में फैसला लेने में सरकार को 100 दिन नहीं लगाने चाहिए थे.’
उन्होंने यह भी बताया कि सरकार की ओर से हुई देरी की ओर उन्होंने पहले ही ध्यान दिलाया था. उन्होंने कहा, ‘सरकार के लिए यह बस एक और दिन है, लेकिन सोनम के लिए इसका मतलब एक और हफ्ता, एक और महीना है.’
आंगमो ने विभिन्न स्तरों से मिले समर्थन का भी उल्लेख किया और कहा, ‘सोनम, हमारे संस्थान और हमारे लिए लोगों में अपार सद्भावना है… जमीनी स्तर का समर्थन, यहां तक कि जेल के भीतर से भी.’ इसके अलावा, उन्होंने वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और विवेक तन्खा द्वारा निशुल्क कानूनी सहायता मिलने की बात भी बताई.
दंपति द्वारा सह-स्थापित हिमालयन इंस्टिट्यूट ऑफ ऑल्टरनेटिव लर्निंग (एचआईएएल) में आ रही बाधाओं पर बात करते हुए आंगमो ने कहा, ‘मैं सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के मामले में ही व्यस्त नहीं हूं, बल्कि आयकर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और जीएसटी विभाग की ओर से आए समन और सवालों से भी निपट रही हूं. इसके साथ ही मैं दूर से ही एचआईएएल को मार्गदर्शन भी दे रही हूं. संस्थान में नेतृत्व की दूसरी पंक्ति बहुत मजबूती से जिम्मेदारी संभाले हुए है.’
सोमवार को वांगचुक के वकील मुस्तफा हाजी ने कहा, ‘उनका अपराध क्या है? सरकार को उसके ही वादे की याद दिलाना – लद्दाख के लोगों को छठी अनुसूची के तहत संरक्षण और संवैधानिक अधिकार देने का वादा. मौजूदा सरकार लद्दाख और वहां के शांतिप्रिय लोगों को समझने में पूरी तरह विफल रही है.’
वांगचुक के समर्थन में एपेक्स बॉडी लेह (एबीएल) और कारगिल डेमोक्रेटिक एलायंस (केडीए) ने केंद्र सरकार से राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची पर बातचीत के लिए उनकी रिहाई को एक प्रमुख शर्त बनाया है. इन संगठनों ने 24 सितंबर के प्रदर्शन के बाद हिरासत में लिए गए सभी लोगों को माफी देने की भी मांग की है.
केडीए के प्रतिनिधि सज्जाद करगिली ने हिरासत में लिए गए लोगों के प्रति केंद्र सरकार की उदासीनता पर टिप्पणी करते हुए कहा, ‘पिछले तीन महीनों से हम सभी बंदियों की रिहाई और मृतकों के परिजनों को मुआवजा देने की मांग कर रहे हैं, इस उम्मीद में कि सरकार समझदारी और संवेदनशीलता दिखाएगी. लेकिन अब तक सरकार का रवैया उदासीन रहा है.’
करगिली ने कहा कि केडीए और एबीएल ने संयुक्त रूप से राज्य का दर्जा और अन्य मांगों को लेकर अपना मसौदा केंद्रीय गृह मंत्रालय को सौंप दिया है. उन्होंने कहा, ‘हमें बताया गया था कि मसौदा जमा होने के बाद बातचीत की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी, लेकिन सरकार इस मामले को गंभीरता से लेती हुई नहीं दिख रही है. केंद्र सरकार को लद्दाख के लोगों को मजबूर नहीं करना चाहिए.’
8 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट में वांगचुक की ओर से वर्चुअल माध्यम से सुनवाई में शामिल होने की याचिका का केंद्र सरकार ने विरोध किया था. सरकार का तर्क था कि ऐसी अनुमति देने से एक ‘अस्वस्थ परंपरा’ शुरू होगी और अन्य ‘दोषी’ भी इसी तरह की मांग करने लगेंगे.
केंद्र सरकार ने वांगचुक की वर्चुअल पेशी की मांग का भी विरोध किया.
