अडानी पावर को सुप्रीम कोर्ट से मिली राहत, सेज़ से ली गई बिजली पर नहीं लगेगी कस्टम ड्यूटी

सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट के 2019 के फैसले को पलटते हुए कहा कि विशेष आर्थिक जोन (सेज़) से डोमेस्टिक टैरिफ एरिया (डीटीए) को आपूर्ति की गई बिजली पर सीमा शुल्क (कस्टम ड्यूटी) नहीं लगाई जा सकती. साथ ही कोर्ट ने अडानी के मुंद्रा पावर प्लांट से वसूले गए शुल्क को वापस करने का निर्देश दिया.

(इलस्ट्रेशन: द वायर)

नई दिल्ली: अडानी पावर लिमिटेड को बड़ी राहत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (5 जनवरी) को फैसला सुनाया कि विशेष आर्थिक जोन (सेज़) से डोमेस्टिक टैरिफ एरिया (डीटीए) को आपूर्ति की गई बिजली पर सीमा शुल्क (कस्टम ड्यूटी) नहीं लगाई जा सकती.

अदालत ने गुजरात हाईकोर्ट के 2019 के फैसले को पलटते हुए कहा कि ऐसी ड्यूटी का कानून में कोई आधार नहीं है. इस फैसले से अडानी के मुंद्रा पावर प्लांट पर लगाए गए शुल्क हट जाएंगे और पहले से वसूले गए शुल्क की वापसी का रास्ता भी साफ हो गया है.

द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने कहा कि ऐसी बिजली आपूर्ति पर कस्टम ड्यूटी लगाने का कोई कानूनी आधार नहीं है और राज्य किसी अवैध कर के तहत वसूल गई राशि को अपने पास नहीं रख सकता.

अदालत ने संबंधित कस्टम आयुक्त को निर्देश दिया कि वे अडानी पावर के दावों की जांच कर आठ सप्ताह के भीतर रिफंड की प्रक्रिया पूरी करें. साथ ही अधिकारियों को चेतावनी दी गई कि वे ‘अत्यधिक तकनीकी आपत्तियां’ उठाकर इस राहत को कमजोर न करें.

पीठ ने कहा, ‘जब किसी कर को कानून के अधिकार से बाहर घोषित कर दिया गया हो, तो किसी संवैधानिक अदालत से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह मूकदर्शक बनी रहे, जबकि उसी टैक्स को लगातार या इसी तरह की नोटिफिकेशन के माध्यम से जारी रखने की कोशिश की जा रही हो. संवैधानिक अदालत का अधिकार उपचारात्मक होता है और यह सुनिश्चित करने तक विस्तृत होता है कि जिसे अवैध घोषित किया जा चुका है, उसे किसी दूसरे रूप में फिर से लागू न किया जाए.’

ज्ञात हो कि अडानी पावर गुजरात के कच्छ जिले में स्थित मुंद्रा सेज़ के भीतर 4,620 मेगावाट क्षमता का कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्र संचालित करती है. सेज़ की आंतरिक जरूरतों को पूरा करने के अलावा, यह संयंत्र दीर्घकालिक बिजली खरीद समझौतों के तहत गुजरात और हरियाणा की वितरण कंपनियों को भी बिजली की आपूर्ति करता है.

इस कानूनी विवाद की शुरुआत फरवरी 2010 में हुई थी, जब केंद्र सरकार ने सीमा शुल्क नियमों में संशोधन कर सेज़ से डीटीए को आपूर्ति की गई बिजली पर शुल्क लगाने का प्रावधान किया था, जिसे जून 2009 से पूर्व प्रभाव से लागू किया गया. पहले दौर की सुनवाई में जुलाई 2015 में गुजरात हाईकोर्ट ने इस कर व्यवस्था के कुछ हिस्सों को रद्द कर दिया था और कहा था कि जून 2009 से सितंबर 2010 के बीच की अवधि के लिए अडानी पावर इस शुल्क से मुक्त है. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया था.

2015 के फैसले के बाद सेज़ अधिकारियों ने कहा कि छूट केवल उसी सीमित अवधि तक लागू है और सितंबर 2010 के बाद की बिजली आपूर्ति पर कस्टम ड्यूटी देय है. इसके खिलाफ अडानी पावर ने 2016 में गुजरात हाईकोर्ट का रुख किया और यह घोषणा करने की मांग की कि उस अवधि के बाद भी कोई कस्टम ड्यूटी देय नहीं है, साथ ही पहले से चुकाई गई ड्यूटी की वापस की जाए.

हालांकि, जून 2019 में हाईकोर्ट ने अडानी की याचिका खारिज कर दी थी. अदालत ने कहा था कि 2015 के फैसले में राहत जानबूझकर एक निश्चित अवधि तक सीमित रखी गई थी. साथ ही यह भी कहा गया था कि छूट बढ़ाने से अडानी को दोहरा लाभ मिलेगा, क्योंकि कंपनी ने बिजली उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले इनपुट्स पर भी कोई ड्यूटी नहीं चुकाई है.

अदालत ने यह भी टिप्पणी की थी कि बाद में जारी किए गए कर नोटिफिकेशन को तब तक अवैध नहीं ठहराया जा सकता, जब तक उन्हें अलग से चुनौती न दी जाए.

सुप्रीम कोर्ट ने इस दृष्टिकोण को खारिज करते हुए कहा कि 2015 में जिस कर को अवैध ठहराया गया था और सितंबर 16, 2010 से 15 फरवरी 2016 तक लागू करने की कोशिश की गई ड्यूटी में कोई खास अंतर नहीं है.

पीठ ने कहा, ‘हमारी राय में हाईकोर्ट ने 2019 के अपने फैसले में केंद्र सरकार की इस दलील को स्वीकार करने में गलती की कि बाद के नोटिफिकेशन सिर्फ़ इसलिए लागू रहे क्योंकि उन्हें 2015 के फैसले में विशेष रूप से रद्द नहीं किया गया था. एक बार जब लेवी को ही कानून के अधिकार के बिना माना गया, तो बाद के नोटिफिकेशन के माध्यम से इसे जारी नहीं रखा जा सकता था. यह वैधता मूल में निहित है और नोटिफिकेशन के स्वरूप या क्रम पर निर्भर नहीं करती.’

शीर्ष अदालत ने आगे स्पष्ट किया कि जब किसी कर को पहले ही अवैध घोषित किया जा चुका हो, तो उस घोषणा को लागू कराने और उससे जुड़े लाभ (जैसे रिफंड) की मांग करने वाली बाद की याचिका को नया मामला नहीं माना जा सकता, भले ही सरकार उसी कर को बाद के नोटिफिकेशन के जरिए जारी रखने की कोशिश करे.

अदालत ने कहा, ‘हम यह निर्णय देते हैं कि जहां किसी कर को कानून के अधिकार से बाहर घोषित किया जा चुका है, वहां उस घोषणा के प्रवर्तन और परिणामी राहत की मांग करने वाली याचिका को केवल इस आधार पर नई चुनौती नहीं माना जा सकता कि सरकार ने बाद के या समान नोटिफिकेशन के तहत उसी कर को जारी रखने की कोशिश की है. किसी नए कानूनी आधार के अभाव में ऐसे नोटिफिकेशन कोई नया कारण नहीं बनाते. संवैधानिक अदालत प्रभावी राहत देने के लिए प्रत्येक नोटिफिकेशन को अलग-अलग चुनौती देने की औपचारिकता पर जोर देने के लिए बाध्य नहीं है.’