यह सिलसिला फिर शुरू हो गया है. जब मैं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के रास्तों से गुजरता हूं, तो हवा में सिर्फ दिल्ली की सर्दियों का स्मॉग नहीं, बल्कि एक नए ‘मीडिया ट्रायल’ का जहरीला धुआं भी घुला हुआ महसूस होता है. विश्वविद्यालय के गेट पर कैमरे फिर से तैनात हैं, सोशल मीडिया पर हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं, और प्राइम-टाइम एंकरों ने खुद को जज मानकर अपनी अदालतें सजा ली हैं. फैसला सुनाया जा चुका है और इसमें अपील की कोई गुंजाइश नहीं है: जेएनयू ‘देशविरोधी’ है.
आरोप क्या है? यही कि छात्रों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के खिलाफ नारे लगाने की जुर्रत की है. 2016 के ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ वाले जिन्न को फिर से बोतल से बाहर निकाल लिया गया है और डिजिटल दुनिया में ‘जेएनयू बंद करो’ (Shutdown JNU) का शोर गूंज रहा है.
लेकिन इस विश्वविद्यालय में इतिहास का एक छात्र होने के नाते, और एक ऐसे कार्यकर्ता के रूप में जो भारत के संवैधानिक वादे में विश्वास करता है, मैं ठहरकर एक बुनियादी सवाल पूछने को मजबूर हूं, एक ऐसा सवाल जिसे इस शोर में जानबूझकर भुला दिया गया है. मोदी-आरएसएस का विरोध ‘देश-विरोध’ कब से हो गया?
हम अपने लोकतंत्र के एक ऐसे खतरनाक मोड़ पर खड़े हैं जहां ‘सरकार’ (State) और ‘राष्ट्र’ (Nation) के बीच के अंतर को जानबूझकर और शरारतपूर्ण तरीके से धुंधला किया जा रहा है. यह समझने के लिए कि जेएनयू के भीतर का विरोध न केवल कानूनी है बल्कि गहरा देशभक्तिपूर्ण भी है, हमें सनसनीखेज हेडलाइंस से परे जाकर इतिहास, किताबों और विश्वविद्यालय के मूल दर्शन को देखना होगा.
विश्वविद्यालय: अपनी ही एक दुनिया
एक छात्र के गुस्से को समझने के लिए पहले विश्वविद्यालय के पवित्र उद्देश्य को समझना होगा. लोकप्रिय विमर्श हमें ‘करदाताओं के पैसे पर पलने वाले’ ऐसे लोगों के रूप में चित्रित करता है जो पढ़ाई के बजाय राजनीति करते हैं. लेकिन यह नजरिया उस उच्च शिक्षा के मूल उद्देश्य का अपमान है जो एक स्वतंत्र समाज के लिए अनिवार्य है.
विश्वविद्यालय की राजनीति पर अपने मौलिक काम में, विद्वान गॉर्डन जॉनसन एक ऐसी परिभाषा देते हैं जिसे विश्वविद्यालय के हर आलोचक को पढ़ना चाहिए. प्रसिद्ध अकादमिक एफएम कॉर्नफोर्ड का हवाला देते हुए, जॉनसन विश्वविद्यालय को ‘सामाजिक संगठन के उन विशिष्ट रूपों में से एक बताते हैं जो ज्ञान को बनाने, खोजने, संरक्षित करने और प्रसारित करने के स्पष्ट उद्देश्य के लिए विकसित हुए हैं.’
यह ‘ज्ञान का सृजन और खोज’ आज्ञापालन के माहौल में नहीं हो सकता. इसके लिए विचारों के टकराव की जरूरत है. जॉनसन कहते हैं कि विश्वविद्यालय को ठीक से काम करने के लिए, विद्वानों और छात्रों को ‘उन लोगों के अनुचित हस्तक्षेप से मुक्त होना चाहिए जो उनके समाज का हिस्सा नहीं हैं.’
संक्षेप में, विश्वविद्यालय ‘अपनी ही एक दुनिया’ है, एक ऐसा अभयारण्य जहां राजनीतिक दुनिया की तत्काल मांगें स्थगित रहती हैं ताकि बिना किसी डर या पक्षपात के सत्य की खोज की जा सके.
कॉर्नफोर्ड ने तर्क दिया था कि एक विश्वविद्यालय को ‘सभी प्रकार के विचारों के प्रति पूर्ण निष्पक्षता’ बनाए रखनी चाहिए. यह वह जगह है जिसे ‘अकाट्य’ पर सवाल उठाने के लिए डिज़ाइन किया गया है.
जब हम साबरमती ढाबे पर खड़े होकर आरएसएस की नीतियों पर सवाल उठाते हैं, या जब हम गृह मंत्री के भारत के विज़न की आलोचना करते हैं, तो हम देश पर हमला नहीं कर रहे होते. हम अपना प्राथमिक शैक्षणिक धर्म निभा रहे होते हैं: तर्क की कसौटी पर कसना. यदि कोई विश्वविद्यालय देश के सबसे शक्तिशाली व्यक्तियों की आलोचना नहीं कर सकता, तो वह ज्ञान का केंद्र नहीं, बल्कि राज्य का प्रचार तंत्र बन जाता है.
कोयले की खान में कनारी चिड़िया
हमसे अक्सर एक सवाल पूछा जाता है: ‘छात्र ही सबसे पहले विरोध क्यों करते हैं? वे सिर्फ अपनी डिग्री पर ध्यान क्यों नहीं देते?’
छात्र आंदोलनों पर दुनिया के प्रसिद्ध विशेषज्ञ, समाजशास्त्री फिलिप जी. ऑल्टबैक इसका एक गहरा जवाब देते हैं. वे छात्र राजनीतिक आंदोलनों की तुलना ‘कोयले की खान में कनारी चिड़िया’ (proverbial canary in the coal mine) से करते हैं.
पुराने समय में, खनिक सुरंगों में जाते समय अपने साथ पिंजरे में एक कनारी चिड़िया ले जाते थे. यदि चिड़िया गाना बंद कर देती या मर जाती, तो इसका मतलब था कि जहरीली गैसें, जो इंसानी आंखों को नहीं दिखती थीं, बन रही हैं और विस्फोट होने वाला है. उस चिड़िया ने खतरा पैदा नहीं किया; उसने खतरे की चेतावनी दी.
ऑल्टबैक लिखते हैं कि छात्र विरोध ‘आने वाले सामाजिक विस्फोट या पनप रहे राजनीतिक संकट का संकेत हो सकते हैं.’
जब जेएनयू के छात्र मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों, आरएसएस की सांप्रदायिक बयानबाजी, या गृह मंत्रालय की अतिवादी कार्रवाई के खिलाफ नारे लगाते हैं, तो हम उस ‘कनारी’ की तरह काम कर रहे हैं. हम संकेत दे रहे हैं कि देश का माहौल जहरीला हो रहा है. छात्रों को चुप कराना- उस कनारी को मारना, समस्या का समाधान नहीं है; यह विस्फोट को न्योता देना है.
नेहरू का विज़न: छात्र, राष्ट्र की अंतरात्मा
छात्र प्रदर्शनकारियों को ‘देशविरोधी’ कहना विशेष रूप से विडंबनापूर्ण है जब हम भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास को देखते हैं. मौजूदा सरकार शायद यह भूल गई है कि जिस आजादी का वे आज आनंद ले रहे हैं, सरकार चलाने की, कानून बनाने की आजादी, वह उन छात्रों द्वारा जीती गई थी जिन्होंने कानून का उल्लंघन किया था.
आधुनिक भारत के निर्माता जवाहरलाल नेहरू ने छात्र राजनीति को उस संदेह की नजर से नहीं देखा जैसा आज देखा जा रहा है. वे इसे भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष के लिए आवश्यक एक नैतिक और क्रांतिकारी शक्ति मानते थे. उनका मानना था कि छात्र अपने भीतर ‘राष्ट्र की अंतरात्मा और साहस’ लिए हुए हैं.
यह विश्वास 1936 में स्पष्ट रूप से व्यक्त हुआ, जब नेहरू ने भारत के पहले राष्ट्रीय छात्र संगठन, अखिल भारतीय छात्र संघ (एआईएसएफ) का उद्घाटन किया. इसके माध्यम से उन्होंने साम्राज्यवाद, फासीवाद और सामाजिक अन्याय के खिलाफ एक संयुक्त मोर्चे में युवा ऊर्जा को शामिल करने की मांग की. नेहरू उन छात्रों के क्रांतिकारी उत्साह के प्रशंसक थे, जिन्होंने नेताओं के जेल में होने पर भी प्रतिरोध की मशाल जलाए रखी.
फिर भी, नेहरू का आग्रह था कि क्रांति अनुशासन और नैतिक स्पष्टता पर टिकी होनी चाहिए. 1945 में कांग्रेस छात्र कार्यकर्ताओं को अपने संबोधन में, उन्होंने चेतावनी दी कि ‘उद्देश्य के बिना जुनून अराजकता में बदल सकता है.’ उन्होंने छात्रों से बुद्धि, साहस और सेवा भाव विकसित करने का आग्रह किया. उनके लिए, छात्र राजनीति व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के बारे में नहीं, बल्कि एक न्यायपूर्ण और मानवीय व्यवस्था बनाने के बारे में थी.
आज जब हम विरोध करते हैं, तो हम इसी विरासत के वारिस हैं. हमारे नारे ‘अराजकता’ नहीं हैं; वे वही ‘उद्देश्यपूर्ण कार्रवाई’ हैं जिसकी बात नेहरू ने की थी.
दो विरोधों की कहानी: इलाहाबाद बनाम जेएनयू
असहमति के प्रति हमारी सहनशीलता कितनी गिर गई है, यह देखने के लिए हमें इतिहास के एक भूले हुए अध्याय को देखना होगा जिसमें इंदिरा गांधी और इलाहाबाद विश्वविद्यालय शामिल थे.
एक समय था जब इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग के प्रमुख, दिग्गज प्रो. जीआर शर्मा ने विश्वविद्यालय संग्रहालय का उद्घाटन करने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को आमंत्रित किया. आज के जेएनयू की तरह वह परिसर भी छात्र राजनीति का गढ़ था. जब इंदिरा गांधी वहां पहुंचीं, तो उनका स्वागत चापलूसी से नहीं हुआ. इसके बजाय, उन्हें उस चीज़ का सामना करना पड़ा जिसे रिपोर्टों में ‘भयंकर विरोध’ बताया गया.
छात्रों ने काले झंडे दिखाए. उनकी सरकार के खिलाफ नारे लगाए गए. यहां तक कि पत्थरबाजी भी हुई. यह देश की सबसे शक्तिशाली महिला के खिलाफ छात्र आक्रोश का एक अराजक और हिंसक प्रदर्शन था.
लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण अंतर यह है: किसी ने उन छात्रों को ‘देशविरोधी’ नहीं कहा.
किसी न्यूज़ एंकर ने स्टूडियो में बैठकर विश्वविद्यालय को बंद करने की मांग नहीं की. पुलिस ने लाइब्रेरी में घुसकर परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों को नहीं पीटा. उस विरोध को उसी रूप में देखा गया जो वह था, युवाओं और सत्ता के बीच एक तीखा राजनीतिक मतभेद. यहां तक कि जेपी आंदोलन के दौरान भी, जब छात्रों ने कांग्रेस सरकार के खिलाफ विद्रोह किया, तो जयप्रकाश नारायण को देशभक्त माना गया और छात्रों को ‘दूसरी आजादी की लड़ाई’ का अग्रदूत.
तो, मैं फिर पूछता हूं: नियम कब बदले? नरेंद्र मोदी ‘भारत’ कब बन गए? अमित शाह ‘राज्य’ (State) कब बन गए?
अगर 1970 के दशक में इंदिरा गांधी पर सवाल उठाना लोकतंत्र था, तो 2026 में नरेंद्र मोदी पर सवाल उठाना राजद्रोह कैसे हो गया?
झूठी समानता
आज जो कहानी गढ़ी जा रही है, वह एक खतरनाक भ्रम पर टिकी है. सत्ताधारी पार्टी भाजपा और उसके वैचारिक संरक्षक आरएसएस को ‘राष्ट्र’ के बराबर रखकर, मीडिया सरकार को आलोचना से बचाने की कोशिश कर रहा है. यदि आप आरएसएस की आलोचना करते हैं, तो आप पर भारतीय संस्कृति पर हमला करने का आरोप लगाया जाता है. यदि आप पीएम की आलोचना करते हैं, तो आप पर भारत के गौरव पर हमला करने का आरोप लगाया जाता है.
यह एक धोखा है. आरएसएस एक गैर-सरकारी संगठन है. भाजपा एक राजनीतिक दल है. नरेंद्र मोदी संविधान के एक निर्वाचित सेवक हैं. इनमें से कोई भी ‘देश’ नहीं है. देश संविधान, लोग, ज़मीन और स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे के मूल्यों से बनता है.
जब हम ‘संघ’ के खिलाफ नारे लगाते हैं, तो हम उस विचारधारा की आलोचना कर रहे होते हैं जो हमें लगता है कि इस देश के बहुलवादी ताने-बाने के लिए खतरा है. जब हम गृह मंत्री की आलोचना करते हैं, तो हम राज्य तंत्र की नीतियों पर सवाल उठा रहे होते हैं. यह गद्दारी नहीं है; यह एक नागरिक द्वारा किया जाने वाला सबसे बड़ा देशभक्ति का कार्य है.
हम, जेएनयू के छात्र, भारत के खिलाफ नहीं लड़ रहे हैं. हम भारत के लिए लड़ रहे हैं. हम उस देश को बचाने के लिए लड़ रहे हैं जहां एक युवा शोध छात्र प्रधानमंत्री को ‘नहीं’ कह सके और उसे जेल में न डाला जाए या आतंकवादी न कहा जाए.
हम नेहरू द्वारा बनाई गई उस विरासत के वारिस हैं, वे ‘जागृत दिमाग और करुणामयी दिल’ जो स्वतंत्रता के प्रहरी हैं. हम इलाहाबाद विश्वविद्यालय के उन छात्रों की विरासत हैं जो किसी सत्ता से नहीं डरते थे. हम ‘कोयले की खान में वह कनारी’ हैं, जो जोर से चिल्ला रही है क्योंकि हम गैस को रिसते हुए देख रहे हैं, भले ही बाकी देश सो रहा हो.
मोदी-आरएसएस का विरोध देश विरोध नहीं है. यह एक जीवित लोकतंत्र के सांस लेने की आवाज़ है.
(लेखक जेएनयू के सेंटर फॉर हिस्टॉरिकल स्टडीज के शोधार्थी हैं और एनएसयूआई से जुड़े हैं.)
