नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा ज़िले में स्थित बैलाडीला आरक्षित वन (बीआरएफ) के भीतर राज्य-स्वामित्व वाली एनएमडीसी द्वारा लौह अयस्क खनन के विस्तार के लिए 874.924 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्ज़न को पर्यावरणीय मंज़ूरी (ईसी) देने की सिफारिश की है.
बता दें कि हाल ही में वहां के स्थानीय आदिवासी और विभिन्न संगठनों, राजनीतिक दलों ने बैलाडीला पहाड़ों में खनन विस्तार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था.
न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (ईएसी) की 57वीं बैठक में बैलाडीला लौह अयस्क खदान -डिपॉज़िट-11 – से जुड़े इस प्रस्ताव को मंज़ूरी दी गई. इस प्रस्ताव के तहत लौह अयस्क का वार्षिक उत्पादन 11.30 मिलियन टन प्रति वर्ष (एमटीपीए) से बढ़ाकर 14.50 एमटीपीए किया जाएगा, जबकि अपशिष्ट उत्खनन (वेस्ट एक्सकेवेशन) को 2.70 एमटीपीए से बढ़ाकर 15.39 एमटीपीए करने का प्रस्ताव है.
बैलाडीला आरक्षित वन एक पर्वतीय वन क्षेत्र है, जो उच्च गुणवत्ता वाले लौह अयस्क के विशाल भंडार के लिए जाना जाता है. इसकी पहचान बैल की कूबड़ जैसी विशिष्ट पर्वत चोटियों से होती है. इस क्षेत्र में 558.84 मिलियन टन (एमटी) हेमेटाइट (लौह अयस्क) के भूवैज्ञानिक भंडार मौजूद हैं, जिनमें से 351.32 एमटी को खनन योग्य भंडार के रूप में वर्गीकृत किया गया है.
एनएमडीसी को इससे पहले मार्च 2020 में इस भूमि के लिए वन स्वीकृति (फॉरेस्ट क्लीयरेंस) मिल चुकी थी, जो 17 वर्षों के लिए वैध है और सितंबर 2037 में समाप्त होगी.
खनन विस्तार के प्रस्ताव को लेकर पर्यावरणीय चिंताएं भी सामने आई हैं, विशेष रूप से प्राचीन पेड़ों और स्थानीय जल स्रोतों को लेकर. ईएसी की मंज़ूरी की आशंका को देखते हुए 5 जनवरी को दंतेवाड़ा में स्थानीय युवाओं और कई राजनीतिक संगठनों ने इस खनन प्रस्ताव के खिलाफ नए सिरे से विरोध प्रदर्शन शुरू किए.
उनका कहना है कि इससे जल स्रोतों, पुराने पेड़ों और दुर्लभ वन्यजीवों को गंभीर खतरा होगा. जैव विविधता और नाज़ुक पारिस्थितिकी तंत्र को होने वाला नुकसान अपूरणीय होगा.
खनन पट्टा क्षेत्र दक्षिण बस्तर के किरंदुल परिसर में स्थित बैलाडीला लौह अयस्क खदानों में आता है. यह आरक्षित वन अपनी समृद्ध जैव विविधता के लिए जाना जाता है, जहां विभिन्न प्रकार के पेड़, स्तनधारी, सरीसृप और पक्षी पाए जाते हैं.
ईएसी दस्तावेज़ों के अनुसार, बैलाडीला आरक्षित वन में कई स्तनधारी प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें स्लॉथ भालू, तेंदुआ, बाघ, सियार, सांभर, बंगाल लोमड़ी, ग्रे नेवला, भारतीय पैंगोलिन, भारतीय साही और बड़े आकार के गिलहरी शामिल हैं.
यहां सरीसृपों में बंगाल मॉनिटर, अजगर, भारतीय रैट स्नेक, कोबरा और रसेल्स वाइपर शामिल हैं. वहीं पक्षियों की प्रजातियों में बस्तर पहाड़ी मैना, मोर, यूरेशियन ईगल आउल, ब्राउन फिश आउल, कॉमन बार्न आउल और कॉटन पिग्मी गूज़ पाई जाती हैं.
ईएसी ने यह भी उल्लेख किया है कि कंपनी ने क्षेत्र-विशिष्ट संरक्षण योजना (साइट-स्पेसिफिक कंजरवेशन प्लान) तैयार की है और इसके लिए दंतेवाड़ा के वन मंडल अधिकारी (डीएफओ) के पास 10.25 करोड़ रुपये जमा किए हैं.
हाल ही में द वायर ने रिपोर्ट किया था कि कैसे बस्तर संभाग में बड़े पैमाने पर खनिज भंडारों को चिह्नित किया गया है और खनन के लिए सरकार पूरी तैयारी कर रही है. बस्तर को एक औद्योगिक केंद्र बनाने के लिए सरकार सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के साथ-साथ, बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) का विकास (जैसे रेलवे, सड़क, हवाई अड्डे) और उद्योगों को सिंगल-विंडो क्लीयरेंस जैसी सुविधाएं देने का दावा कर रही है, ताकि निजी निवेश को आकर्षित किया जा सके.
