हमारे देश के लिए – जो अभी भी नफ़रत और शिकायत की ज़हरीली गर्म हवाओं से लगातार घिरा हुआ है – साल 2025 फिर से तबाही लेकर ही आया. देश से मुस्लिम आबादी का सफ़ाया करने का नफ़रत से भरा आह्वान हवा में गूंजता रहा. बुलडोज़र मुस्लिम घरों और धार्मिक स्थलों को गिराते रहे. मध्ययुगीन मस्जिदों के नीचे मंदिर मिलते रहे या उनकी कल्पना की जाती रही. चर्चों और चैपलों में ग़ुस्साई भीड़ तोड़फोड़ करती रही.
भीड़ यह दावा करते हुए लोगों को पीट-पीटकर और पत्थर मारकर मारती रही कि उन्होंने गाय काटी है या किसी हिंदू लड़की से रोमांस किया है. सुरक्षा बल गोलियों से असहमति और विद्रोह को दबाते रहे. हमारे कुछ बेहतरीन दिल और दिमाग़ जेल की बैरकों में बंद रहे.
हम सभी जिस नफ़रत, अन्याय और डर के ज़हरीले धुंध में घिरे हुए हैं, उसे चीरते हुए 2025 में कुछ बेहतरीन फिल्में आईं, जिन्होंने मानवता का संदेश दिया. इन फिल्मों ने अन्याय, दुख तथा विरोध का प्रतिकार किया और जोखिम उठाते हुए सच बोलने की हिम्मत दिखाई. इन फिल्मों ने दया की कल्पना करने की हिम्मत दिखाई. ये फिल्में उम्मीद से भरी थीं.
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पंजाब 95
इस साल की सबसे ज़रूरी फिल्मों की मेरी लिस्ट में सबसे ऊपर एक ऐसी फिल्म है जिसे ज़्यादातर भारतीयों को देखने का मौक़ा नहीं मिला है. मैंने इसे अपने लैपटॉप पर देखा क्योंकि डायरेक्टर ने मुझे एक प्राइवेट लिंक भेजा था. उनका बहुत शुक्रिया. यह है पंजाब 95. बेहद परेशान करने वाली और दिल को छू लेने वाली, हनी त्रेहान की यह फिल्म आज़ाद भारत के महान नायकों में से एक जसवंत सिंह खालरा को श्रद्धांजलि है. बहुत दुख की बात है कि पंजाब के बाहर बहुत कम लोग उन्हें जानते हैं.
त्रेहान की फिल्म हमें हमारे गणतंत्र की यात्रा के सबसे काले, सबसे दर्दनाक दौर की तरफ़ वापस लेकर जाती है, लेकिन जिसे ज़्यादातर लोग पूरी तरह से भूल चुके हैं. यह 1980 के दशक के मध्य का समय था जब पंजाब उग्रवाद की चपेट में था.
यह फिल्म हमें एक ऐसे शासन की याद दिलाती है जिसमें पुलिस को न सिर्फ़ खुली छूट दी गई थी, बल्कि निर्दोष लोगों की हत्या करने के लिए उन्हें प्रोत्साहित भी किया गया था. जो पुलिसवाले निहत्थे पुरुषों और महिलाओं को बेरहमी से मारते थे, उन्हें नियमों के विरुद्ध जाकर प्रमोशन दिया जाता था.
यह आतंक का समय था, जब पंजाब में कोई भी परिवार सुरक्षित नहीं था. जवान लड़के बड़ी संख्या में ग़ायब हो रहे थे, और उनके शवों को गुपचुप तरीक़े से सामूहिक रूप से जला दिया जाता था या राज्य से गुज़रने वाली नहरों में फेंक दिया जाता था. पुलिसवाले माता-पिता से पैसे ऐंठते थे और धमकी देते थे कि अगर पैसे नहीं दिए तो उनके बेटों को मार दिया जाएगा. किसी को नहीं पता था कि अगला नंबर किसका होगा.
ख़ूनी आतंक के इस दौर में, एक बैंक ऑफ़िसर जसवंत सिंह खालरा ने इस बात का पता लगाना शुरू किया कि उनके कुछ साथियों के साथ क्या हुआ था जो ग़ायब हो गए. उनकी लगन से उन्हें कुछ गोपनीय दस्तावेज़ मिले, जिसे देखकर उन्हें बहुत हैरानी हुई और वो ग़ुस्से के भर गए. उस दस्तावेज़ में सिर्फ़ एक ज़िले तरन तारन से ग़ायब हुए लगभग 2000 लोगों के नाम थे, जिन्हें मारने के बाद जला दिया गया था.
उन्होंने अंदाज़ा लगाया कि पंजाब में सुरक्षा बलों ने शायद 25000 लोगों को ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से मार डाला था. वे अपनी जान और परिवार को जोखिम में डालकर इन बड़े पैमाने पर हुए नरसंहार जैसे अपराधों को उजागर करने में लगे रहे.
एक सुबह, सादे कपड़ों में आए पुलिसवालों ने उन्हें उनके घर के बाहर से किडनैप कर लिया और बिना नंबर वाली गाड़ी में बैठाकर ले गए. उनकी पत्नी और ग़ायब हुए अन्य सैकड़ों लोगों के परिवार वालों ने खालरा के लिए न्याय की लंबी लड़ाई लड़ी. आख़िरकार, स्वतंत्र पुलिस जांच में पता चला कि पंजाब पुलिस ने उनकी हत्या कर दी थी.

खालरा की ही कहानी को त्रेहान ने पंजाब 95 में फिर जीवंत कर दिया है. दिलजीत दोसांझ ने खालरा का रोल निभाने के लिए कोई पैसा नहीं लिया, और उन्होंने खालरा की अनोखी ज़िद, बहादुरी और दया को बहुत अच्छे से अभिनीत किया है.
त्रेहान की स्क्रिप्ट पूरी तरह से सच्ची घटनाओं और गवाहियों पर आधारित है. उनकी कहानी संयमित और बेबाक है, फिर भी यह उन भयानक सच्चाइयों को सामने लाती है कि जब पुलिस को निहत्थे बेगुनाहों को मारने की शक्ति दी जाती है और उन्हें प्रोत्साहित किया जाता है तो क्या होता है.
मानवता के ख़िलाफ़ किए गए इन अपराधों के लिए कुछ ही लोगों को ज़िम्मेदार ठहराया गया, और जिन पुलिस अधिकारियों ने इन ऑपरेशन्स का नेतृत्व किया, उन्हें राष्ट्रीय हीरो के तौर पर सम्मानित किया गया. सालों बाद, मैंने कई पंजाबी घरों का दौरा किया जो आज भी अपने उन प्रियजनों की ख़बर का इंतज़ार कर रहे हैं जो ग़ायब हो गए थे और फिर कभी लौटकर नहीं आए.
यह एक ऐसी फिल्म है जिसे हर भारतीय को देखना चाहिए. उग्रवाद और ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से की गई सामूहिक हत्याओं द्वारा उसे बेरहमी से कुचलने की कहानी सिर्फ़ पंजाब की नहीं है. यह कश्मीर की, कई उत्तर-पूर्वी राज्यों की, आदित्यनाथ के शासन वाले उत्तर प्रदेश की, और मध्य भारत की भी कहानी है.
यह एक ऐसे राज्य के भयानक चेहरे की कहानी है जो अपने सुरक्षा बलों द्वारा मासूमों की सामूहिक हत्याएं करवाता है और उन्हें ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करता है. त्रेहान की फिल्म हमारी सामूहिक अंतरात्मा से एक ज़रूरी अपील है. लेकिन भारत सरकार ने यह सुनिश्चित करने के लिए इस फिल्म पर कड़ी रोक लगा दी है कि इसे भारत और दुनिया भर के दर्शक न देख सकें.
सेंसर बोर्ड ने 120 कट लगाने का आदेश दिया, जिन्हें अगर मान लिया जाता तो फिल्म की आत्मा ही मर जाती. इंटरनेशनल रिलीज़ आख़िरी मिनट में रद्द कर दी गई. इसके लिए आधिकारिक तौर पर कोई कारण नहीं बताया गया.
पंजाब 95 मुझे लंबे समय तक परेशान करेगी. एक सीन में, खालरा अपनी पत्नी को समझा रहे हैं कि उन्हें यह लड़ाई क्यों जारी रखनी चाहिए, भले ही वे अपनी जान और परिवार की असुरक्षा के प्रति पूरी तरह से अवगत हैं.
वह कहते हैं…
‘मुझमें अन्याय को देखकर नज़रअंदाज़ करने की हिम्मत नहीं है.’ उनकी पत्नी जवाब देती हैं कि वह उनके बारे में जानती है, और इसलिए वह उनके रास्ते में नहीं आएंगी.
और फिल्म के आख़िर में, पुलिस द्वारा हफ़्तों की यातना के बाद हिरासत में गोली मारे जाने से ठीक पहले, वह एक दयालु पुलिस वाले को अपना मक़सद फिर से समझाते हैं.
वह कहते हैं, ‘अंधेरा कितना भी गहरा क्यों न हो, हमें वह लौ बनना होगा जो उस अंधेरे से लड़ने के लिए अपना सिर उठाती है, भले ही वह लौ कितनी ही छोटी हो.’
होमबाउंड
एक और फिल्म जो मेरे साथ अब भी बनी हुई है, वह है नीरज घेवान की शानदार फिल्म होमबाउंड, जो द न्यूयॉर्क टाइम्स में बशारत पीर द्वारा लिखे गए एक लेख पर आधारित है, जिसका टाइटल था ‘A Friendship, a Pandemic and a Death Beside the Highway.‘
पीर और घेवान दो दोस्तों की कहानी सुनाते हैं, एक मुस्लिम और दूसरा दलित, दोनों प्रवासी मज़दूर जो सूरत स्थित अपनी फ़ैक्ट्री से घर लौट रहे हैं, जो महामारी के कारण अचानक बंद हो गई थी.
रास्ते में एक दर्दनाक सफ़र के दौरान (एक ऐसा सफ़र जो 30 मिलियन प्रवासी मज़दूरों को बेरहम, सज़ा देने वाले लॉकडाउन की वजह से करना पड़ा), उनमें से एक की मौत हो जाती है. उसका दुखी दोस्त उसे छोड़ने से इंकार कर देता है, और जब उसकी जान निकल रही होती है, तो वह उसका सिर अपनी गोद में रख लेता है.
फिल्म का यह अंतिम दृश्य सबसे असरदार और दिल को छू लेने वाला है. बहुत लंबे समय बाद मैंने ऐसी कोई फिल्म देखी है. मैं कारवां-ए-मोहब्बत के अपने सभी साथियों को यह फिल्म दिखाने थिएटर लेकर गया, और मुझे यह स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं है कि फिल्म देखने के दैरान ज़्यादातर समय मेरी आंखों में आंसू थे.
इस फिल्म के यथार्थवादी मानववाद को देखकर मुझे अकीरा कुरोसावा के सिनेमा की याद दिला आ गई. दोनों नौजवान ऐसी नौकरियां पाने के लिए बेताब हैं जो उन्हें इज़्ज़त और सम्मान दिला सकें. लेकिन वे सिर्फ़ ग़रीब नहीं हैं. एक मुस्लिम है, और दूसरा दलित. फिल्म करुणा और अंतरदृष्टि के साथ उस अपमान और शर्म को दिखाती है जिससे उन्हें रोज़ाना जूझना पड़ता है, जो न सिर्फ़ उनके सपनों को तोड़ता है बल्कि लगातार उनके आत्म-सम्मान पर भी हमला करता है.
वे सूरत की एक फ़ैक्ट्री में काम करने लगते हैं, और अपने जैसे दूसरे ग़रीब नौजवानों के साथ एक ही डॉरमेट्री में रहते हैं. और फिर महामारी आती है और लॉकडाउन लगता है. चिलचिलाती गर्मी में सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर अपने गांव लौटने के अलावा उनके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता है. इसके बाद उनके जीवन की त्रासदी शुरू होती है.
सबसे बढ़कर, होमबाउंड दोस्ती को एक शानदार मिसाल पेश करता है. दो नौजवान, जिनके सपने और इज़्ज़त को अक्सर कुचला जाता है, उनके पास एक-दूसरे का सहारा है. वे एक दूसरे से बात किए बिना ही अच्छी तरह से एक दूसरे के दिल का हाल जान लेते हैं. विपत्ति, दुख, अपमान के समय में वे एक दूसरे के साथ खड़े रहते हैं. फिल्म में ग़ुस्सा है, आक्रोश है, लेकिन गहरा प्यार भी है.
सबर बोंडा
मेरी लिस्ट में तीसरी फिल्म एक प्यारी लव स्टोरी है, मराठी फिल्म सबर बोंडा (‘कैक्टस नाशपाती’), जो प्रतिभाशाली निर्देशक रोहन परशुराम कनावाडे की पहली फिल्म है. यह बेहद कोमल प्रेम कहानी पूरी तरह से अप्रत्याशित भी है. जिन दो लोगों को महाराष्ट्र के एक गांव में एक साथ प्यार मिलता है, वे तीस साल के दो आदमी हैं.
उनमें से एक आनंद (जिसका किरदार भूषण मनोज ने निभाया है) है, जो शहर का रहने वाला है और अपने पिता के दस दिवसीय अंतिम संस्कार के लिए अपने गांव लौटता है. बेमन से अंतिम संस्कार की रस्मों में हिस्सा लेने आए आनंद की मुलाक़ात अपने बचपन के दोस्त बलया (सूरज सुमन) से होती है और वे दोनों क़रीब आते हैं. अपने परिवार और पड़ोसियों से छिपकर दोनों पुरुष रोमांटिक प्यार का अनुभव करते हैं.
फिल्म उस कलंक और भेदभाव को रेखांकित करती है जिससे भारतीय ग्रामीण समलैंगिक पुरुषों को जूझना पड़ता है, फिर भी इसमें बहुत कम द्वेष या कड़वाहट है. इन सब परिस्थितियों के बावजूद पुरुषों को प्यार मिल जाता है, इस बात की ख़ुशी दिखाई पड़ती है.
मैंने धर्मशाला फिल्म फेस्टिवल में इस फिल्म की स्क्रीनिंग देखी, जहांं निर्देशक कनावाडे भी माजूद थे. उन्होंने मुझे बताया कि फिल्म आंशिक रूप से उनके अपने अनुभवों पर आधारित है. वह भी अपने पिता की मृत्यु के बाद उनके अंतिम संस्कार के लिए अपने पैतृक गांव लौटे थे.
उन्होंने भी वही अलगाव और अकेलापन महसूस किया जो इस फिल्म में आनंद करता है. मगर काश उस समय उनके पास कोई दोस्त होता जिसे वह गले लगा सकते. यहीं से इस छोटी-सी मगर शानदार फिल्म का विचार उपजा.
फुल प्लेट
उसी फ़ेस्टिवल में मैंने एक और यादगार फिल्म को अपने बहुत क़रीब पाया, वह फिल्म थी तनिष्ठा चटर्जी की फुल प्लेट. इत्तेफ़ाक से, ठीक एक महीने पहले मैंने हाइडलबर्ग यूनिवर्सिटी में ‘सिनेमा के ज़रिए भारत’ विषय पर जो कोर्स पढ़ाना शुरू किया था, उसकी शुरुआत सत्यजीत रे की सबसे बेहतरीन फिल्म मानी जाने वाली महानगर की स्क्रीनिंग से की थी.
पचास साल बाद, फुल प्लेट भी लगभग इसी तरह की कहानी से शुरू होती है. क्या होता है जब परिवार का कमाने वाला आदमी काम करने में असमर्थ हो जाता है (महानगर में बैंक के अचानक दिवालिया हो जाने से ऐसा होता है और फुल प्लेट में पैर के टूट जाने से), और घर संभालने वाली पत्नी को घर से बाहर निकलकर परिवार के लिए कमाना पड़ता है.
रे की फिल्म में, घरेलू संकट तब हल होता है जब एक नेक पति अपनी पत्नी की क़ाबिलियत का सम्मान करना और उस पर भरोसा करना सीख जाता है. चटर्जी की फिल्म में, यह संकट हिंसक है, और आख़िर में जानलेवा भी.
फुल प्लेट की पृष्ठभूमि महानगर से बहुत अलग है. हम कोलकाता के एक मध्यवर्गीय परिवार से मुंबई के एक मुस्लिम मज़दूर वर्ग के परिवार में पहुंचते हैं. घर संभालने वाली अमरीन एक टैलेंटेड कुक है, और इसी हुनर को लेकर काम की तलाश में घर से बाहर निकलती है.
वह ऐसे कई घरों के दरवाज़े खटखटाती है, जहांं हिजाब और उसकी मुस्लिम पहचान उसके रास्ते की रुकावट बन जाती है. पहला घर जहांं उसकी पहचान और हिजाब की वजह से उसे काम के लिए मना नहीं किया जाता है, वह एक अमीर कपल का घर है, जो वीगन हैं और ओपन मैरिज में हैं.
दो दोस्तों से लगातार सलाह लेकर, जो ख़ुद भी घरेलू काम करती हैं, और अपने प्यारे फ़ेमिनिस्ट टीनएजर बेटे की मदद से, वह अपने पंख फैलाना सीखती है. कहानी आगे बढ़ने के साथ हंसी मज़ाक़ का सिलसिला शुरू होता है.
एक प्यारे से सीन में, वह अपनी दोस्तों से पूछती है कि ‘ओपन मैरिज’ क्या होती है. वे आपस में सलाह करती हैं और इस नतीजे पर पहुंचती हैं कि यह किसी पर्यटन स्थल पर होने वाली शादी की रस्म है. फिर अमरीन अपने हैरान मालिक को बताती है कि वह सपना देखती है कि अपने बेटे का ‘ओपन मैरिज’ करवाए!
अमरीन का पति उसे बुरी तरह पीटता है, क्योंकि उसे उसके बढ़ते आत्मविश्वास और आज़ादी से बेचैनी और शक होता है. उसकी हिंसा महानगर फिल्म के पति की समझ से बिल्कुल अलग है, जो दिखाता है कि हमारे सामाजिक रिश्ते कितने ख़राब होते जा रहे हैं.
फिल्म तब भी अच्छी लगती है जब अमरीन उस घर की सुरक्षा छोड़कर, जहांं वह शादी के बाद आई थी, अपनी ज़िंदगी ख़ुद बनाती है. यह देखकर सुकून मिलता है कि फिल्म के मुख्य किरदार मुस्लिम हैं.
द ग्रेट शम्सुद्दीन फैमिली
एक और मज़ेदार फिल्म जो हल्के-फुल्के अंदाज़ में मुसलमानों की मुश्किलों को दिखाती है, इस बार हृषिकेश मुखर्जी की कॉमेडी जैसी शैली में, वह है द ग्रेट शम्सुद्दीन फैमिली, जिसे अनुषा रिज़वी ने लिखा और डायरेक्ट किया है.
शानदार कलाकारों की टोली – जिसमें फ़रीदा जलाल महत्वपूर्ण भूमिका में है – को साथ लेकर रिज़वी साउथ दिल्ली के एक अपार्टमेंट में एक मिडिल क्लास मुस्लिम परिवार को जीवंत बना देती हैं. किसी भी मिडिल क्लास परिवार की तरह, उनमें छोटी-मोटी नोकझोंक, झगड़े और मज़ाक-मस्ती होती रहती है. लेकिन परिवार पर कोई मुश्किल आती ही तो वे एकजुट हो जाते हैं.
एक युवा रिश्तेदार एक हिंदू लड़की के साथ घर आता है जिसके साथ वह भागकर शादी करना चाहता था, लेकिन सिविल मैरिज नहीं हो पाई क्योंकि मजिस्ट्रेट को हार्ट अटैक आ गया था. लड़की अपने माता-पिता के घर वापस नहीं जाना चाहती, जहांं से वह भागकर आई थी.
परिवार को पता है कि इस शादी से समाज में क्या हो सकता है, लेकिन वे एक मजिस्ट्रेट को रिश्वत देने के लिए पैसे इकट्ठा करने का फ़ैसला करते हैं ताकि वह उनके घर आकर शादी को क़ानूनी मान्यता दिला दे.
इस बीच, गुरुग्राम रोड पर सांप्रदायिक झड़प की ख़बर आती है, और एक शांत डर पैदा होता है कि क्या भीड़ ने जिस कार को जलाया था, वह बहनों में से किसी एक के पति की हो सकती है. सब कुछ ठीक हो जाता है, लेकिन इस इकजुट परिवार की हंसी के बीच, उनके दरवाज़े के बाहर जानलेवा भीड़ की संभावना का लगातार अनकहा डर बना रहता है.
शैडोबॉक्स
बिल्कुल अलग मूड की, थोड़ी उदास लेकिन गहरी सहानुभूति वाली बांग्ला फिल्म है शैडोबॉक्स (बक्शो बोंडी), जिसे तनुश्री दास और सौम्यनंद साही ने मिलकर डायरेक्ट किया है.
कोलकाता के एक अव्यवस्थित उपनगर में, एक महिला (माया, जिसका किरदार तिलोत्तमा शोम ने बहुत दमदार तरीक़े से निभाया है) अपने पति सुंदर और अपने टीनएज बेटे देबू की देखभाल के लिए कई छोटी-मोटी नौकरियां करते हुए सामाजिक बहिष्कार और अपमान का सामना करती है.
सुंदर, जो पहले एक सैनिक था, पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर से पीड़ित है, उसके वहम, शराब की लत और मेंढक इकट्ठा करने के जुनून के अलावा काम न करने की इच्छा की वजह से उसका मज़ाक़ उड़ाया जाता है. चंदन बिष्ट ने इस किरदार को असाधारण संवेदनशीलता और समझदारी के साथ निभाया है, जो भारतीय सिनेमा में मानसिक बीमारी के सबसे सहानुभूतिपूर्ण चित्रणों में से एक है.
उसका बेटा देबू उससे बहुत प्यार करता है और उसकी हरकतों से शर्मिंदा भी होता है. उसकी पत्नी बहुत ज़्यादा प्रोटेक्टिव है, वह अपने पति की इज़्ज़त बचाने के लिए अपने परिवार और पड़ोसियों से लड़ती है. इस फिल्म की कहानी भारत के हाशिये पर रहने वाले लोगों की मानवीय स्थिति पर केंद्रित है.
मिथ्या
एक मार्मिक कन्नड़ फिल्म है मिथ्या, जिसके निर्देशक है सुमंथ भट. अपनी लंबी और प्रभावशाली ख़ामोशी के लिए जानी जाने वाली यह फिल्म 11 साल के एक लड़के की दर्दनाक कहानी को बयान करती है जिसकी मां आत्महत्या कर लेती है.
आत्महत्या से कुछ दिन पहले, उसके पिता की रहस्यमय तरीक़े से मौत हो गई थी. ऐसी गंदी अफ़वाहें फैलती हैं कि उसकी मां ने अपनी जान लेने से पहले अपने पति को ज़हर दिया था. अचानक अनाथ हुए उस लड़के को उसकी मौसी मुंबई से निकालकर अचानक उडुपी ले जाती है.
लड़का अपनी मां से नाराज़ है कि उसने उसे दुनिया में अकेला छोड़ दिया, लेकिन आत्महत्या के बाद उसके बारे में फैल रही नफ़रत भरी अफ़वाहों से दुखी है. लड़के के पास इसका कोई समाधान नहीं है, लेकिन लड़का धीरे-धीरे अपनी स्थिति को स्वीकार करना सीखता है, और अपने चाचा-चाची पर भरोसा करने लगता है जो उसे अपने परिवार का हिस्सा बना लेते हैं.
फुले
अनंत महादेवन की फुले के बिना साल की फिल्मों की मेरी लिस्ट अधूरी रहेगी. मुझे फिल्म की कमियों का पता है: इसका शांत और नाटकीय अंदाज़ और जातिगत उत्पीड़न का कुछ हद तक हल्का चित्रण. फिर भी यह एक ऐसी फिल्म है जिसे देश के हर स्कूल और कॉलेज में दिखाया जाना चाहिए.
19वीं सदी के जाति-विरोधी सुधारक ज्योतिबा फुले ने बहादुरी से ब्राह्मणवादी जाति उत्पीड़न तथा छुआछूत, और विधवाओं पर होने वाले अत्याचारों के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी.
ईसाई मिशनरियों द्वारा लड़कियों की शिक्षा के लिए स्थापित स्कूलों से प्रभावित होकर, उन्होंने पहले अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले को शिक्षित किया, और फिर उनके और अपने मुस्लिम दोस्त की पत्नी फ़ातिमा शेख के साथ मिलकर देश में लड़कियों के लिए पहले स्वदेशी स्कूल की स्थापना की.
फुले दंपत्ति की कहानी, और जिस साहस के साथ उन्होंने सदियों पुराने जाति और लिंग के उत्पीड़न के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी, और देश में लड़कियों के लिए पहले भारतीय स्कूल स्थापित करने के लिए संघर्ष किया, यही वह प्रेरणादायक कहानी है जिसे महादेवन की फिल्म दिखाने की कोशिश करती है.
किसी महापुरुष की जीवनी पर फिल्म बनाने के लिए यह कैनवस छोटा ही पड़ जाएगा. फुले जिस चीज़ में सफल होती है वह यह है कि यह हमें उन जीवंत संघर्षों की याद दिलाती है जो अधिक समान और न्यायपूर्ण समाज बनाने के लिए लड़ी गईं. यह हमें याद दिलाती है कि हमने इन संघर्षों की विरासत को पीछे छोड़ दिया. यह हमें याद दिलाती है कि एक बेहतर दुनिया की दिशा में यात्रा करने के लिए अभी भी कितनी दूरी तय करनी है.
(लेखक मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं)
(मूल अंग्रेज़ी से ज़फ़र इक़बाल द्वारा अनूदित. ज़फ़र भागलपुर में हैंडलूम बुनकरों की ‘कोलिका’ नामक संस्था से जुड़े हैं.)
