दिसंबर 2011 में आंध्र प्रदेश सरकार ने घोषणा की थी कि वह उन 70 युवा मुस्लिम पुरुषों को मुआवज़ा देगी, जिन्हें 2007 के मक्का मस्जिद धमाका मामले में ग़लत तरीक़े से फंसाया गया, पुलिस हिरासत में जिन्हें यातनाएं दी गईं, और आख़िरकार अदालत ने जिन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया. बाद में सीबीआई और राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने 10 आरोपियों के ख़िलाफ़ चार्जशीट दायर की, जो सभी अभिनव भारत संगठन के सदस्य थे.
21वीं सदी के पहले दशक में कई ऐसे आतंकी हमले हुए जिनमें मुस्लिम धार्मिक या सांस्कृतिक सभाओं या आम नागरिकों को निशाना बनाकर धमाके किए गए. पुलिस ने शुरू में मुस्लिम पुरुषों पर आरोप लगाए और उन्हें जेल में डाल दिया, लेकिन समय के साथ- कभी-कभी तो दशकों बाद- इन्हें बरी और रिहा किया गया. इसके बाद नई जांच शुरू हुई, जिसमें 'हिंदुत्व' संगठनों के सदस्यों के ख़िलाफ़ आरोप दायर किए गए.
एक औरत अपने परिवार और समाज की महज़ एक जायदाद है, उससे ज़्यादा कुछ नहीं है- एक ऐसी 'ट्रॉफ़ी' जो उनकी इज़्ज़त की निशानी है. इस 'इज़्ज़त' की हिफ़ाज़त के नाम पर उसकी अपनी इच्छाओं, उसकी अपनी पसंद और उसकी अपनी ख़ुशियों की बलि चढ़ाई जा सकती है. और, कभी-कभी तो उसकी जान की भी.
पिछले बारह वर्षों से देश में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा-शासित कई राज्य सरकारों ने न केवल धर्म परिवर्तन विरोधी क़ानूनों को अधिक कठोर बनाया है, बल्कि इन क़ानूनों को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया गया है, ताकि मुस्लिम पुरुषों और हिंदू महिलाओं के बीच होने वाली शादियों- और यहां तक कि लिव-इन संबंधों-को प्रभावी ढंग से हतोत्साहित कर उन्हें अपराध की श्रेणी में रखा जा सके.
जहां एक तरफ़ हिंदुत्व से जुड़े संगठन और भाजपा सरकारें 'लव जिहाद' के नफ़रती नैरेटिव का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करके मुस्लिम पुरुषों के ख़िलाफ़ नफ़रत और कभी-कभी हिंसा भड़का रही हैं, वहीं दूसरी तरफ़ इसका असर दूसरे धार्मिक कट्टरपंथी समुदायों- सिख और ईसाई पर भी पड़ रहा है. इन सभी के बीच समानता यह है कि इन्हें भरोसा नहीं है कि संविधान के अनुसार वयस्क महिलाएं अपनी पसंद से साथी चुन सकती हैं और उससे विवाह कर सकती
1947 में भारत से पाकिस्तान का अलग होना सिर्फ़ ज़मीन के लिए लड़ी गई लड़ाई नहीं थी, यह औरतों के शरीर और समुदाय की 'इज़्ज़त' के लिए भी उतनी ही बड़ी लड़ाई थी. यह टकराव आज भी दक्षिण एशियाई मूल के लोगों के बीच जारी है. इस स्त्री-द्वेषी दृष्टि की वजह से महिलाओं को आज भी यह चुनने की आज़ादी नहीं है कि वे किससे दोस्ती करें, किससे प्रेम या किसके साथ संबंध बनाएं और किससे शादी करें.
भारत और इज़रायल, दोनों ही देश की सुरक्षा की चिंताओं को अल्पसंख्यक आबादी से जोड़ते हैं. मुसलमानों पर शक करते हैं और संभावित ख़तरा बताते हैं. सरकार के कामकाज के तरीक़े में इसके नतीजे साफ़ दिखते हैं. इज़रायल में आरोपी फ़िलिस्तीनियों के घर गिरा दिए जाते हैं; भारत में अपराध, विरोध प्रदर्शन आदि से जुड़ी घटनाओं के आरोपी मुस्लिम व्यक्तियों के परिवारों को भी इसी तरह तबाही का सामना करना पड़ता है.
योगी आदित्यनाथ की पहचान भारत के सबसे ज़्यादा आबादी वाले राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर इस वजह से विशेष रही कि उन्होंने एक अभियान चलाकर नफ़रती भाषण और नफ़रती अपराधों के सभी आरोपियों को बरी कर दिया- और इस अभियान की शुरुआत मुख्यमंत्री ने ख़ुद से ही की. वे देश के सबसे ज़्यादा ध्रुवीकरण करने वाले, लेकिन साथ ही बेहद लोकप्रिय कट्टरपंथी हिंदुत्ववादी नेताओं में से एक हैं.
ध्वस्तीकरण के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर 2024 को आदेश दिया था कि कार्यपालिका बिना क़ानूनी प्रक्रिया- जिसमें पहले से नोटिस देना और सुनवाई करना शामिल है- संपत्ति को न गिराए. इस प्रक्रिया के उल्लंघन पर अदालत की अवमानना के तहत कार्रवाई की जा सकती है. हालांकि, बार-बार देखा गया है कि कई राज्य सरकारों द्वारा शीर्ष अदालत के इस आदेश का खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है.
बीते कुछ सालों में भाजपा शासित राज्यों ने जेसीबी बुलडोज़र को बदले की कार्रवाई के एक साधन में बदल दिया है. इसकी शुरुआत 2020 में उत्तर प्रदेश से की गई और जल्द ही यह बीमारी अन्य भाजपा के नेतृत्व वाली राज्य सरकारों तक तेज़ी से फैल गई. जेसीबी हिंदू राष्ट्रवाद का प्रतीक बन गई, जिसका इस्तेमाल भाजपा और उसके समर्थक मुसलमानों को डराने और ख़ुद को विजेता साबित करने के लिए करते हैं.
2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के छह साल बाद अगर पीछे मुड़कर देखा जाए, तो यह सांप्रदायिक नरसंहार सबसे अलग है. केंद्र और प्रदेश सरकारों ने अपने नागरिकों को हिंसा से बचाने, उनकी ज़िंदगी फिर से पटरी पर लाने और न्याय दिलाने में मदद करने की अपनी ज़िम्मेदारियों से ख़ुद को अलग कर लिया.
योगी आदित्यनाथ के शासन काल में उत्तर प्रदेश में बुलडोज़र निर्माण कार्य में इस्तेमाल होने वाले औज़ार से बदलकर मुसलमानों को सामूहिक रूप से दंडित करने वाला हथियार और राजनीतिक नाटक का हिस्सा बन गया. यह तरीका एक राष्ट्रीय मॉडल बन गया, जिसे भाजपा ने सराहा और दूसरे भाजपा शासित राज्यों तथा कांग्रेस शासित कर्नाटक में भी अपनाया गया.
हिमंता बिस्वा शर्मा भाजपा में शामिल होने के बाद कई कट्टर आरएसएस कार्यकर्ताओं से भी ज़्यादा आक्रामक और मुस्लिम विरोधी हो चले है. उन्होंने अपने संवैधानिक पद का इस्तेमाल नफ़रती भाषणों के लिए किया है.
बीते कुछ सालों में बुलडोज़र को दंडात्मक तौर पर इस्तेमाल करने की घटनाओं में वृद्धि हुई है. इस कार्रवाई में अधिकतर मुसलमानों को निशाना बनाया गया है. साल 2022 और 2023 में गिराए गए घरों में से 44% घर मुसलमानों के थे. यह पैटर्न बन गया है कि लगातार क़ानूनी प्रक्रिया को नज़रअंदाज़, और संवैधानिक सुरक्षा का उल्लंघन करके ऐसी कार्रवाई की जाती है.
उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रयागराज के एक एक्टिविस्ट के परिवार के घर को गिरा दिया, जिन्होंने बिना किसी जुर्म के 21 महीने जेल में बिताए. जब वे पुलिस हिरासत में अस्पताल में थे, तब बुलडोज़र से उनका वो घर तोड़ा गया, जो असल में उनकी पत्नी के नाम पर था.