1947 में भारत से पाकिस्तान का अलग होना सिर्फ़ ज़मीन के लिए लड़ी गई लड़ाई नहीं थी, यह औरतों के शरीर और समुदाय की 'इज़्ज़त' के लिए भी उतनी ही बड़ी लड़ाई थी. यह टकराव आज भी दक्षिण एशियाई मूल के लोगों के बीच जारी है. इस स्त्री-द्वेषी दृष्टि की वजह से महिलाओं को आज भी यह चुनने की आज़ादी नहीं है कि वे किससे दोस्ती करें, किससे प्रेम या किसके साथ संबंध बनाएं और किससे शादी करें.
भारत और इज़रायल, दोनों ही देश की सुरक्षा की चिंताओं को अल्पसंख्यक आबादी से जोड़ते हैं. मुसलमानों पर शक करते हैं और संभावित ख़तरा बताते हैं. सरकार के कामकाज के तरीक़े में इसके नतीजे साफ़ दिखते हैं. इज़रायल में आरोपी फ़िलिस्तीनियों के घर गिरा दिए जाते हैं; भारत में अपराध, विरोध प्रदर्शन आदि से जुड़ी घटनाओं के आरोपी मुस्लिम व्यक्तियों के परिवारों को भी इसी तरह तबाही का सामना करना पड़ता है.
योगी आदित्यनाथ की पहचान भारत के सबसे ज़्यादा आबादी वाले राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर इस वजह से विशेष रही कि उन्होंने एक अभियान चलाकर नफ़रती भाषण और नफ़रती अपराधों के सभी आरोपियों को बरी कर दिया- और इस अभियान की शुरुआत मुख्यमंत्री ने ख़ुद से ही की. वे देश के सबसे ज़्यादा ध्रुवीकरण करने वाले, लेकिन साथ ही बेहद लोकप्रिय कट्टरपंथी हिंदुत्ववादी नेताओं में से एक हैं.
ध्वस्तीकरण के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर 2024 को आदेश दिया था कि कार्यपालिका बिना क़ानूनी प्रक्रिया- जिसमें पहले से नोटिस देना और सुनवाई करना शामिल है- संपत्ति को न गिराए. इस प्रक्रिया के उल्लंघन पर अदालत की अवमानना के तहत कार्रवाई की जा सकती है. हालांकि, बार-बार देखा गया है कि कई राज्य सरकारों द्वारा शीर्ष अदालत के इस आदेश का खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है.
बीते कुछ सालों में भाजपा शासित राज्यों ने जेसीबी बुलडोज़र को बदले की कार्रवाई के एक साधन में बदल दिया है. इसकी शुरुआत 2020 में उत्तर प्रदेश से की गई और जल्द ही यह बीमारी अन्य भाजपा के नेतृत्व वाली राज्य सरकारों तक तेज़ी से फैल गई. जेसीबी हिंदू राष्ट्रवाद का प्रतीक बन गई, जिसका इस्तेमाल भाजपा और उसके समर्थक मुसलमानों को डराने और ख़ुद को विजेता साबित करने के लिए करते हैं.
2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के छह साल बाद अगर पीछे मुड़कर देखा जाए, तो यह सांप्रदायिक नरसंहार सबसे अलग है. केंद्र और प्रदेश सरकारों ने अपने नागरिकों को हिंसा से बचाने, उनकी ज़िंदगी फिर से पटरी पर लाने और न्याय दिलाने में मदद करने की अपनी ज़िम्मेदारियों से ख़ुद को अलग कर लिया.
योगी आदित्यनाथ के शासन काल में उत्तर प्रदेश में बुलडोज़र निर्माण कार्य में इस्तेमाल होने वाले औज़ार से बदलकर मुसलमानों को सामूहिक रूप से दंडित करने वाला हथियार और राजनीतिक नाटक का हिस्सा बन गया. यह तरीका एक राष्ट्रीय मॉडल बन गया, जिसे भाजपा ने सराहा और दूसरे भाजपा शासित राज्यों तथा कांग्रेस शासित कर्नाटक में भी अपनाया गया.
हिमंता बिस्वा शर्मा भाजपा में शामिल होने के बाद कई कट्टर आरएसएस कार्यकर्ताओं से भी ज़्यादा आक्रामक और मुस्लिम विरोधी हो चले है. उन्होंने अपने संवैधानिक पद का इस्तेमाल नफ़रती भाषणों के लिए किया है.
बीते कुछ सालों में बुलडोज़र को दंडात्मक तौर पर इस्तेमाल करने की घटनाओं में वृद्धि हुई है. इस कार्रवाई में अधिकतर मुसलमानों को निशाना बनाया गया है. साल 2022 और 2023 में गिराए गए घरों में से 44% घर मुसलमानों के थे. यह पैटर्न बन गया है कि लगातार क़ानूनी प्रक्रिया को नज़रअंदाज़, और संवैधानिक सुरक्षा का उल्लंघन करके ऐसी कार्रवाई की जाती है.
उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रयागराज के एक एक्टिविस्ट के परिवार के घर को गिरा दिया, जिन्होंने बिना किसी जुर्म के 21 महीने जेल में बिताए. जब वे पुलिस हिरासत में अस्पताल में थे, तब बुलडोज़र से उनका वो घर तोड़ा गया, जो असल में उनकी पत्नी के नाम पर था.
हम सभी जिस नफ़रत, अन्याय और डर के ज़हरीले धुंध में घिरे हुए हैं, उसे चीरते हुए 2025 में कुछ बेहतरीन फिल्में आईं, जिन्होंने मानवता का संदेश दिया. इन फ़िल्मों ने अन्याय, दुख तथा विरोध का प्रतिकार किया और जोखिम उठाते हुए सच बोलने की हिम्मत दिखाई. प्रस्तुत है हर्ष मंदर की 2025 की पसंदीदा भारतीय फिल्में.
जब संसद ने एक ऐसा क़ानून ख़त्म कर दिया जो दस साल से ज़्यादा समय तक मज़दूरी करने वाले लोगों के संघर्षों का नतीजा था, तो मुझे उस समय की याद आ गई जब मुझे एक दिन मनरेगा कार्यस्थल पर ख़ुद काम करने का अनोखा अनुभव मिला था. उन कुछ घंटों ने मुझे यह समझने में मदद की कि दुनिया का सबसे बड़ा सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम उन लाखों लोगों के लिए असल में क्या मायने रखता है, जो इसके अंतर्गत
प्रभात पटनायक की नई पुस्तक 'सोशलिज़्म एंड द इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन' के ज़रिए हर्ष मंदर भारत के उत्तर-औपनिवेशिक समाजवाद, नव-उदारवाद के संकट और नव-फ़ासीवाद के उभार का गहन विश्लेषण करते हैं. यह लेख संविधान में निहित समतावादी मूल्यों को पुनः हासिल करने की ज़रूरत पर ज़ोर देता है.
नेल्ली के पीड़ितों का दर्द हमें याद दिलाता है कि जो लोग बड़े पैमाने पर हिंसा झेल चुके हैं, उनमें से कई लोग अब भी इंसाफ़ का इंतज़ार कर रहे हैं. लेकिन सरकार ने आज तक किसी को भी इस हद तक बेसहारा नहीं छोड़ा है, जैसा इन लोगों के साथ हुआ है.
इस बरस भारत सरकार ने देश में रह रहे रोहिंग्या शरणार्थियों को जबरन देश से बाहर करने के लिये उन्हें समुद्र में फेंक दिया. इस अमानवीय कृत्य की कथा कुछ बचे रह गये रोहिंग्या मुसलमानों ने हर्ष मंदर को सुनायी. पढ़िए इस त्रासदी की आपबीती...