प्रेमचंद को याद करते हुए…

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: जिस ‘महाजनी सभ्यता’ का प्रेमचंद ने विरोध किया था उस सभ्यता ने हमारे लोकतंत्र पर, कम से कम शासनतंत्र पर, कब्ज़ा कर लिया है. जिस साहित्य को प्रेमचंद ने कभी देशभक्ति और राजनीति के ‘आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सचाई’ कहा था, उस साहित्य का एक बड़ा हिस्सा राजनीति का पिछलगुआ होता जा रहा है.

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प्रेमचंद. (जन्म: 31 जुलाई 1880 – अवसान: 08 अक्टूबर 1936) (फोटो साभार: रेख्ता डॉट ओआरजी)

ग़ालिब इंस्टिट्यूट दिल्ली हर साल दिसंबर में एक अंतरराष्ट्रीय आयोजन करता है जो इस बार ‘प्रेमचंद: ज़हन ज़माना आर्ट’ विषय पर था जिसमें शामिल होने का मौक़ा मिला. यह लगा कि हम किसी बड़े पुरखे को दो कारणों से याद करते हैं. एक तो यह कि हमें लगता है कि उस पुरखे ने जो लिखा-किया उसे नए संदर्भों में आंकना-जांचना चाहिए. दूसरा यह कि वह आज भी हमसे कुछ ऐसा कह सकता है जो हमें अपनी आज की हालत समझने-बदलने में कुछ मदद कर सकता है.

‘गोदान’ अब 90 बरसों तक हमारे पास और साथ है. वह उस भारत में नौ दशक पहले प्रकाशित हुआ, जिस भारत में आज लगभग हर दिन गाय के नाम पर लोगों की हिंसा-हत्या होती है. अपने ज़माने के सबसे व्यापक स्वतंत्रता-संग्राम में प्रेमचंद शामिल थे, उस संग्रह को आजकल लगातार अवमूल्यित-अपमानित किया जा रहा है और जिन शक्तियों का आज वर्चस्व है वे उस संग्राम के बुनियादी मूल्यों पर रोज़ हमला कर रही हैं.

जिस ‘महाजनी सभ्यता’ का प्रेमचंद ने विरोध किया था उस सभ्यता ने हमारे लोकतंत्र पर, कम से कम शासनतंत्र पर, कब्ज़ा कर लिया है. जिस साहित्य को प्रेमचंद ने कभी देशभक्ति और राजनीति के ‘आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सचाई’ कहा था, उस साहित्य का एक बड़ा हिस्सा राजनीति का पिछलगुआ होता जा रहा है.

लेखक और ज़माने के, अदब और ज़माने के रिश्ते सीधे-सादे नहीं ख़ासे उलझे होते हैं हालांकि यह धारणा आम है साहित्य को ज़माना नियमित-प्रभावित करता है. असलियत यह है कि साहित्य भी ज़माने को प्रभावित करता है. प्रेमचंद स्वतंत्रता-संग्राम और महात्मा गांधी के ज़माने में थे. हम यह भी कह सकते हैं कि प्रेमचंद के ज़माने में स्वतंत्रता-संग्राम और गांधी थे.

प्रेमचंद के ज़माने में औपनिवेशिक शासन था, उसका दमन और क्रूरता, शोषण और लूटपाट थे और ये उस ज़माने के निर्णायक हिस्से थे. प्रेमचंद अपने ज़माने के इस हिस्से के विरोध में थे. आज भी, ऐसा वक़्त है कि हिंदुत्व-नफ़रत-झूठ-अन्याय-हिंसा का ज़माना है और साहित्य पहले भी अपने ज़माने के विरुद्ध रहा है. ग़ालिब की चीख़ याद आती है: ‘या रब ज़माना मुझको मिटाता है किसलिए’.

कई लेखक अपने ज़माने में मक़बूल होते हैं पर आगे जाकर हाशिये पर फिंक जाते हैं क्योंकि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं लिखा-कहा जो आगे जाकर भी सजीव रहे. ऐसे भी लेखक हुए हैं जो अपने ज़माने में हाशिये पर रहे पर आगे जाकर केंद्र में आ गए. ऐसे लेखक भी होते हैं, कम होते हैं जो हर ज़माने में सजीव और प्रासंगिक बने रहते हैं- उन्हें कालजयी, क्लासिक कहा जाता है. उनको अपने ज़माने की रोशनी में पढ़ने पर नए अर्थ और आशय खुलते हैं.

यह नहीं भूलना चाहिए कि बड़ा लेखक अपना समय खुद भी गढ़ता है जो उसका भी होता है और हमारा भी. भौतिक समय न तो उसे समो पाता है, न क़ैद कर सकता है, न ही महदूद.

हिंदी-उर्दू में प्रेमचंद का ज़माना नई शुरुआत, नई पहल का था. साहित्य में साधारण की खोज, उसकी संघर्षशीलता, गरिमा को, उसकी निपट मानवीयता को केंद्र में लाने का. ऐतिहासिक-पौराणिक नायकों को, एक तरह से, बेदख़ल करके, साधारण को, अनायक को साहित्य के केंद्र में लाने का. साधारण की साहित्य में केंद्रीयता और प्रतिष्ठा आज तक साहित्य में एक सशक्त और व्यापक प्रवृत्ति बनी हुई है.

प्रेमचंद ने सिर्फ़ अपने समय और समाज का यथार्थ चित्रित नहीं किया, उन्होंने अपना और नया यथार्थ रचा भी. उनके सामाजिक यथार्थ का बहुत ज़िक्र और विश्लेषण हुआ है पर इसका कम, जैसा कि निर्मल वर्मा ने उनकी कहानी ‘कफ़न’ के हवाले से बताया है, कि उनके यहां आधुनिकता में व्यक्ति का जन्म भी हुआ. उनके यहां साहित्य की भाषा, बखान की भाषा और बोलचाल की भाषा के नज़दीक आने की गद्य में शुरुआत भी हुई.

प्रेमचंद बाक़ायदा चिंतक नहीं पर एक विचारशील लेखक थे: रचनात्मक गद्य से अलग उन्होंने कई निबंधों-लेखों-टिप्पणियों आदि में सभ्यता-समीक्षा, समाज-समीक्षा और साहित्य-समीक्षा की है.

उन्होंने लिखा कि ‘पुराने ज़माने में सभ्यता का अर्थ आत्मा की सभ्यता और आचार की सभ्यता होता था. वर्तमान युग में सभ्यता का अर्थ है स्वार्थ और आडंबर. उसका नैतिक पक्ष छूट गया. उसकी सूरत बदलकर आज वह हो गई है जिसे हमारे पुराने लोग असभ्यता कहते….’

वे साफ़ कहते हैं कि ‘संसार आदि काल से लक्ष्मी की पूजा करता चला आता है. जिस पर वह प्रसन्न हो जाए, उसके भाग्य खुल जाते हैं. उसकी सारी बुराइयां मुआफ़ कर दी जाती हैं, लेकिन संसार का जितना अकल्याण लक्ष्मी ने किया है, उतना शैतान ने नहीं किया. यह देवी नहीं, डायन है’.

सांप्रदायिकता के प्रश्न पर उनका विचार है:

‘फिर हमारी समझ में नहीं आता कि वह कौन सी संस्कृति है, जिसकी रक्षा के लिए सांप्रदायिकता इतना ज़ोर बांध रही है? वास्तव में संस्कृति की पुकार केवल ढोंग है, निरा पाखंड. और इसके जन्मदाता भी वही लोग हैं, जो सांप्रदायिकता की शीतल छांह में बैठे विहार करते हैं. यह सीधे-सादे आदमियों को सांप्रदायिकता की ओर घसीट लाने का एक ही मंत्र है, और कुछ नहीं. हिंदू और मुसलिम संस्कृति के रक्षक वही महानुभाव और वही समुदाय हैं, जिनको अपने ऊपर और सत्य के ऊपर कोई भरोसा नहीं, इसलिए अनन्त तक एक ऐसी शक्ति की ज़रूरत समझते हैं, जो उनके झगड़ों में सरपंच का काम करती रहे.’

आचरण को लेकर प्रेमचंद का मत है कि ‘नम्रता और सहिष्णुता, शर्म और हया, सदाचार और मुरव्वत- इन गुणों का सब आदर करते थे चाहे वे मुग़ल हों या तुर्क, ब्राह्मण हों या शूद्र…. दया और प्रार्थना, संयम और नर्मी को कायरता और पस्तहिम्मती समझा जाता है. अब डींग मारने और शेखी बघारने का ज़माना है. गुस्सा, नफ़रत, घमण्ड जबान का कडुआपन- ये मर्दाना खूबियां हैं.’ ये सब बातें, हालांकि लगभग सौ बरस पहले प्रेमचंद ने कही थीं, आज पर बल्कि आज की बातें लगती हैं.

प्रेमचंद्र ने यह भी लिखा था कि ‘…. राज्य अब केवल एक गुट बनाकर ग़रीबों से कर वसूल करने और ऐश उड़ाने अथवा उस ऐश में बाधा देने वालों से लड़ने का नाम नहीं रहा, जिसका प्रजा के प्रति अधिक-से-अधिक यही धर्म था कि उनके जानमाल की रक्षा करे. आज का राज्य ऐसी विषमताओं का समर्थक नहीं. आज का राज्य वह संस्था है, जिसका आधार-स्तम्भ है समता. उसका धर्म है प्रजामात्र के लिए समान अवसर, समान सुविधा और समान सत्ता की व्यवस्था करना, और जो राज्य इस सत्य को स्वीकार नहीं करता, वह बहुत दिन टिक नहीं सकता.’

साहित्य को लेकर प्रेमचंद के विचार जाने-माने हैं. फिर भी याद कर सकते हैं कि उनके अनुसार ‘साहित्य का सबसे ऊंचा आदर्श वह है जबकि उसकी रचना केवल कला की पूर्ति के लिए की जाए. ‘आर्ट्स फॉर आर्ट्स सेक’ के सिद्धांत पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती. वह साहित्य चिरायु हो सकता है जो मनुष्य की मौलिक प्रवृत्तियों पर अवलंबित हो… बिना उद्देश्य के तो कोई रचना हो ही नहीं सकती. जब साहित्य की रचना किसी सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक मत के प्रचार के लिए की जाती है, तो वह ऊंचे पद से गिर जाती है, इसमें कोई संदेह नहीं. लेकिन आजकल परिस्थितियां इतनी तीव्र गति से बदल रही हैं, इतने नए-नए विचार पैदा हो रहे हैं कि शायद अब कोई लेखक साहित्य के आदर्श को ध्यान में नहीं रख ही नहीं सकता.’

उन्होंने यह भी इसरार किया था कि ‘मगर हम साहित्य को केवल मनोरंजन और विलासिता की वस्तु नहीं समझते. हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौन्दर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सचाइयों का प्रकाश हो- जो हमें गति और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं, क्योंकि अब और ज़्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है.’

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)