आम धारणा है कि समय कवियों को निर्णायक रूप से प्रभावित करता, रचता है लेकिन उसमें यह अक्सर नहीं जोड़ा जाता कि कवि भी समय को प्रभावित करते, रचते हैं- वे बिरले होते हैं पर होते हैं- ऐसे कवि जो समय की बंदिशों से बाहर भी जीवित-सक्रिय-उपस्थित रहते हैं. श्रीकांत वर्मा उनमें से एक हैं जिन पर, ‘श्रीकांत वर्मा का वर्तमान’ शीर्षक से एक आयोजन इसी सप्ताह दिल्ली में हुआ जिसमें अरुण कमल, मदन सोनी, विजय कुमार आदि ने भाग लिया.
ऐसे कवि भी होते हैं, भले कम, जो समय का प्रतिरोध करते हैं- उससे अलग अपनी राह बनाते हैं, उनमें से कुछ अपने समय को रौंद डालते हैं: यह रौंदना सिर्फ़ समय का नहीं, अपने आप का भी रौंदना होता है. मुक्तिबोध और उनके नज़दीकी श्रीकांत वर्मा ऐसे ही कवि थे.
बीसवीं शताब्दी श्रीकांत वर्मा का बेचैन सरोकार थी- न सिर्फ़ भारत की, बल्कि समूची दुनिया की. वे उसकी संतान तो थे पर ज़्यादातर उसके विरोध में थे. उन्होंने अपनी शताब्दी का गुणगान नहीं, उसकी व्यापक क्रूरता-हिंसा-युद्धों-नरसंहारों के लिए तीख़ी-सख़्त आलोचना की. वैचारिक भर नहीं, सर्जनात्मक आलोचना भी. यह किसी अतीत के महिमामंडन या भविष्य के स्वर्ण स्वप्न से प्रेरित नहीं थी: यह बीसवीं शताब्दी को उसी के घोषित प्रचारित मूल्यों-प्रतिमानों पर उसे कसने-जांचने की एक कोशिश थी.
बीसवीं शताब्दी में सचाई, समय, समाज, व्यक्ति, आत्म, मुक्ति, स्वतंत्रता का गहरा बहुविध प्रश्नांकन हुआ; बहुलता का स्वीकार-अस्वीकार हुआ; लोकतंत्र और क्रांति आदि की अवधारणाएं और विकट और बीहड़ यथार्थ सामने आए. इन सबका श्रीकांत पर गहरा प्रभाव है.
बेघरबारी, विस्थापन, प्रकृति का क्षरण, बहुत ऊंचे तापमान पर दिमाग़ और बहसें, व्यापक संसार में अपने निजी संसार को विलीन न होने देने की ज़िद, विचारों के नाम पर नरसंहार और विचारहीनता का खोखलापन आदि श्रीकांत वर्मा की कविता के अभिप्राय बने. इनमें से कोई भी, हमारे वर्तमान में, आज, अप्रासंगिक नहीं हुआ है.
इस दौरान जीवन, अस्तित्व, कर्म, साहित्य, कलाओं, दर्शन आदि में अर्थ-अनर्थ-व्यर्थ, सार्थकता-निरर्थकता आदि के प्रश्न भी उभरे. इनसे भी श्रीकांत वर्मा की काव्यचेतना रूपायित हुई. उन्होंने अस्तित्व, संसार, संघर्ष, सत्ता आदि की अंततः व्यर्थता-विफलता के प्रश्न भी अपनी कविता में उठाए.
अपने कविता संग्रह ‘मगध’ के लोकार्पण के अवसर पर 1985 में उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा, ‘… वैसे तो कहते हैं, सब कुछ है. मगर सच्चाई यह है कि कुछ भी नहीं है. एक मकड़ी का जाला है जिसे एक मकड़ी अपनी अनंत ऊब में बुनती है और कविता है जिसे कवि अपनी अंतरात्मा के विराट् सन्नाटे से घबराता, थरथराता, कांपता, रचता है, न जाने किसे समर्पित.’
हमारे वर्तमान में हमारी अंतरात्मा का विराट् सन्नाटा, और गहरा, सघन और असह्य हो गया है. आज भी कविता, कहीं न कहीं, घबराहट, थरथराहट और कंपन है. श्रीकांत वर्मा गहरे क्षोभ, बेबाक नाराज़ी, अदम्य असंतोष और आत्मप्रताड़न के भी कवि हैं. पर साथ-साथ वे जीवन में अब भी बच पाई कोमलता, लालित्य, सुंदरता, प्रेम और करुणा के भी कवि रहे हैं.
श्रीकांत वर्मा की कविता एक अनवरत घमासान है, जिसे कवि शब्दों और अंतःकरण के अलावा निहत्था लड़ रहा है, जिसे कवि हार रहा है पर आत्मसमर्पण से इनकार कर रहा है- उनकी कविता में विजय की चकाचौंध नहीं, पराजय की आभा है, अर्थ का आतंक नहीं, व्यर्थता की टिमटिमाहट है, समय में लिप्ति नहीं, काल का चौकन्ना बोध है.
यह कविता एक तरह की थोड़ी उत्तेजित जिरह है, एक सदा-उत्तप्त की- अपने आप से, दूसरों से, समय और काल से, समाज और शताब्दी से. इस संदर्भ में विजय देव नारायण साही उनके सहचर कवि हैं.
अगर उनकी आरंभिक कविताओं को छोड़ दें तो श्रीकांत वर्मा, कुल मिलाकर, गुणग्राहक कवि नहीं, आलोचक-कवि रहे हैं. उनकी महत्वपूर्ण कविता, जब शांत लगती है तब भी, ऊंचे तापमान में लिखी कविता है- ‘बुखार में कविता’. उन्हें सांसत में फंसे कवि के रूप में भी देखा जा सकता है- ऐसी सांसत जिसमें फंसकर वे राजनीति, समाज, सत्ता, व्यक्ति, आधुनिकता, विचार सभी को सांसत में फंसा देख पाते हैं. आधुनिक हिंदी में इतनी बेराहत कविता कम है.
कभी मैंने उनकी कविता को ‘समकालीन नरक का भूगोल’ कहा था और कभी अपने एक संस्मरण में उन्हें ‘अपने नरक में नाराज़’. वे अपने समय की सचाई, दबाव-प्रभाव, विडंबनाओं-विद्रूपों के गवाह हैं और उनमें हिस्सेदार भी. वे अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी से कभी विरत-विमुख नहीं होते.
उन्होंने लिखा था कि ‘मुक्ति और ‘स्वतंत्रता’ मनुष्य की नियति को दो अलग-अलग स्तरों पर परिभाषित करने का प्रयत्न है. एक भारतीय कवि पर अपनी नियति को इन दोनों ही स्तरों पर परिभाषित करने की दोहरी ज़िम्मेदारी है. वह दोनों में से किसी भी एक से पलायन नहीं कर सकता. वास्तव में उसका द्वंद्व एक पश्चिमी लेखक के द्वंद्व से कहीं तीख़ा, उसका संशय कहीं गहरा है.’
अंततः श्रीकांत वर्मा मानवीय विडंबना, मानवीय यातना, मानवीय करुणा, मानवीय व्यर्थता के कवि- कविता में फिर भी बची हुई आस्था के कवि हैं. आज जब लोकतंत्र लोक से राजनीति नीति से, समाज अंतःकरण से, भाषा भद्रता से लगातार पलायन करते दूर जा रहे हैं तब श्रीकांत वर्मा की कविता की प्रश्नवाचकता, आत्मविडंबना, हिंसा की शिनाख़्त, क्षोभ और करुणा, व्यंग और प्रतिरोध को हम कविता के कालातीत इसरार और सत्यापन की तरह पढ़-गुन सकते हैं. हम यह भी पहचान सकते हें कि वह हमारे भीषण वर्तमान के पूर्वाभास की कविता है- ऐसी कविता जिसे उस समय अग्रिम ज़मानत मिल गई थी!
मोहन राकेश की कहानियां
कथाकार-नाटककार मोहन राकेश की जन्मशती समाप्त होने की पूर्वसंध्या पर दिल्ली की संस्था ‘रसचक्र’ ने, जिसे पूर्वा भारद्वाज चलाती हैं, उनकी तीन कहानियों की पाठ-प्रस्तुति ‘फ़ौलाद का आकाश’ शीर्षक से आयोजित की. हिंदी में कवितापाठ की तो लंबी परंपरा है पर कहानीपाठ की नहीं. इधर ऑनलाइन ऐसे कहानीपाठ के कुछ आयोजन हो रहे हैं, जैसे सुमन केशरी का ‘कथानटी’ जो ख़ासे लोकप्रिय हैं.
इस प्रस्तुति में चार पाठक थे जिनमें पूर्वा के अलावा अपूर्वानंद, रज़ा हैदर, अलका रंजन थे. यह देखना प्रीतिकर था कि इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली का सभागार ठसाठस भरा था और बहुतों को सीट नहीं मिल सकी.
तीन कहानियां थीं और हर कहानी चारों ने मिलकर पढ़ीं: एक कुछ पढ़ता था तो दूसरा आगे का हिस्सा उठाता था. चूंकि एक से दूसरे पाठक तक जाने में ज़रा भी देर या चूक नहीं थी, सुनने-देखने में भी प्रस्तुति की सुगठित और मोहक लय बन गई. स्थिति या दृश्य के शाब्दिक बखान बहुत सजीव होते रहे. कई बार यह लगा कि आम तौर पर कविता तो प्रायः सुनी जाती है, कहानी भी ऐसे थोड़े और बहुत संयमित नाटकीय ढंग से पढ़कर सुनाई जाए तो नए क़िस्म का रस पैदा होता है.
शायद इसका एक बड़ा कारण कहानी का आवाज़ में बदलना हो- चार लोग आपके सामने मिलकर अपनी आवाज़ में जब कुछ कहते हैं तो आपका ध्यान कहे जा रहे पर सीधे जाता है और आपको आवाज़ें घेर लेती हैं. आप चाहे-अनचाहे आवाजों के इस नाटक में शामिल हो जाते हैं. आपको यह भ्रम होता रहता है कि आपसे ही कहा जा रहा है.
ऐसे कहानी-पाठ निश्चय ही और अधिक होना चाहिए. तरह-तरह के श्रोता इस तरह साहित्य से जुड़ सकते हैं और उसमें कई कथाकारों की कहानियां बारी-बारी से ली जा सकती हैं. भले मंच और श्रोताओं के बीच सभागार के स्थापत्य के कारण दूरी थी पर पाठ के दौरान एक चौपाल सा बन गया जिसमें, एक दूसरे क़िस्म की, नज़दीकी थी. साहित्य के सच्चे रसास्वादन के लिए ऐसी नज़दीकी ज़रूरी होती है- यह सहृदयता का रोचक-प्रेरक विस्तार है.
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
