जस्टिस यशवंत वर्मा: सुप्रीम कोर्ट ने याचिका ख़ारिज की, संसद प्रस्ताव पर कहा- सदन अध्यक्ष को निर्णय लेने दें

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा को हटाने के प्रस्ताव पर राज्यसभा के महासचिव की भूमिका पर गंभीर चिंता व्यक्त की. अदालत ने कहा कि उचित होगा कि सचिवालय संयम बरते और प्रस्ताव पर फैसला लोकसभा स्पीकर या राज्यसभा के सभापति पर (जो भी मामला हो) छोड़ दे, न कि संभावित कार्रवाई का निष्कर्ष निकाले.

जस्टिस यशवंत वर्मा (इलस्ट्रेशन: द वायर)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (16 जनवरी) को इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा को हटाने के प्रस्ताव पर राज्यसभा के महासचिव की भूमिका पर गंभीर चिंता व्यक्त की.

रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत द्वारा ये चिंताएं जस्टिस वर्मा की उस याचिका को खारिज करते हुए व्यक्त की गईं, जिसमें उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष द्वारा उनके ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए गठित संसदीय समिति की वैधता को चुनौती दी थी.

मालूम हो कि यह घटनाक्रम जस्टिस वर्मा से जुड़े उस व्यापक विवाद से संबंधित है, जो मार्च 2025 में उनके आधिकारिक आवास के क्षतिग्रस्त हुए कमरे से कथित तौर पर भारी मात्रा में नकदी बरामद होने के आरोपों से जुड़ा है. इस विवाद के चलते 21 जुलाई 2025 को संसद के दोनों सदनों में समानांतर रूप से उन्हें हटाने के प्रस्ताव पेश किए गए थे.

द हिंदू में प्रकाशित एक ख़बर के अनुसार, महासचिव ने अपने प्रशासनिक दायित्व से आगे बढ़कर एक ‘ड्राफ्ट फैसला’ (draft decision) तैयार किया था, जिसमें राज्यसभा सांसदों द्वारा प्रस्तुत नोटिस को अस्वीकार्य बताया गया था. इसी मसौदे के आधार पर राज्यसभा के उपसभापति ने प्रस्ताव को यह कहते हुए खारिज कर दिया था.

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस वर्मा ने समिति के गठन पर इस आधार पर सवाल उठाया था कि उन्हें हटाने का प्रस्ताव राज्यसभा के उपसभापति द्वारा खारिज कर दिया गया था.

इस पर जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एस.सी. शर्मा की पीठ ने टिप्पणी की कि महासचिव की भूमिका प्रशासनिक कार्यों तक ही सीमित है और इसमें अर्ध-न्यायिक कार्य शामिल नहीं हैं.

फैसले में जस्टिस दत्ता ने भविष्य में संसदीय सचिवालयों द्वारा ऐसे मामलों में संयम बरतने की बात करते हुए कहा, ‘हम आशा करते हैं कि किसी अन्य न्यायाधीश को कदाचार के आरोपों पर सेवा से हटाने की कार्यवाही का सामना न करना पड़े. लेकिन यदि दुर्भाग्यवश किसी न्यायाधीश के प्रथम दृष्टया दुर्व्यवहार में लिप्त पाए जाने की स्थिति उत्पन्न होती है और देश के प्रतिनिधि जांच की मांग करते हैं… तो यह उचित होगा कि सचिवालय संयम बरते और प्रस्ताव पर फैसला लोकसभा स्पीकर या राज्यसभा के सभापति पर (जो भी मामला हो) छोड़ दे, न कि संभावित कार्रवाई का निष्कर्ष निकाले.

राज्यसभा महासचिव के प्रति नाराजगी का जस्टिस वर्मा की याचिका पर कोई प्रभाव नहीं

हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि ये टिप्पणियां ‘सैद्धांतिक’ प्रकृति की हैं. और इसका जस्टिस वर्मा द्वारा दायर अलग याचिका, जिसमें उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष द्वारा जांच समिति के गठन को चुनौती दी है, के खारिज़ करने पर इसका कोई लाभ या प्रभाव नहीं होगा.

लाइव लॉ के मुताबिक़, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने इस मामले में 8 जनवरी को सुनवाई के बाद फ़ैसला सुरक्षित रख लिया था.

सुनवाई के दौरान जस्टिस वर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और लोकसभा सचिवालय की ओर से भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलीलें पेश की थीं.

याचिका में मुख्य तर्क यह दिया गया था कि एक ही दिन, 21 जुलाई को लोकसभा और राज्यसभा दोनों में महाभियोग नोटिस दिए जाने के बावजूद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने राज्यसभा के सभापति के फ़ैसले का इंतज़ार किए बिना ही जांच समिति का गठन कर दिया.

याचिका में यह भी कहा गया कि क़ानून के तहत अनिवार्य संयुक्त परामर्श की प्रक्रिया नहीं अपनाई गई. दलील दी गई कि यह प्रक्रिया न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 की धारा 3(2) के ख़िलाफ़ है.

इस संबंध में कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इस मामले में न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 की प्रक्रिया का उल्लंघन नहीं हुआ है. और जस्टिस वर्मा किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन साबित करने में नाकाम रहे हैं.

शीर्ष अदालत ने कहा कि लोकसभा अध्यक्ष को जांच समिति गठित करने का विधायी अधिकार है. और जिस सदन में प्रस्ताव स्वीकार किया गया होता है, उसके अध्यक्ष स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ सकते हैं.