14 महीने से अडानी तक अमेरिकी समन नहीं पहुंचने दे रही मोदी सरकार, अब ईमेल से नोटिस भेजने को तैयार एजेंसी

अमेरिकी सिक्योरिटीज़ एंड एक्सचेंज कमीशन ने एक संघीय अदालत को बताया है कि भारत सरकार के सहयोग न करने के कारण अडानी समूह को 14 महीनों से समन तामील नहीं हो सका है. अब एजेंसी ने अदालत से ईमेल के ज़रिए नोटिस भेजने की अनुमति मांगी है. मामला कथित रिश्वतखोरी से जुड़ा है.

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अडानी ग्रुप के चेयरमैन गौतम अडानी. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: अमेरिकी प्रतिभूति और विनिमय आयोग (सिक्योरिटीज़ एंड एक्सचेंज कमीशन-एसईसी) ने भारत द्वारा समन जारी करने के उसके अधिकार को चुनौती दिए जाने के बाद, एक संघीय अदालत का रुख किया है. आयोग ने अदालत से अनुरोध किया है कि वह कूटनीतिक माध्यमों को दरकिनार करते हुए गौतम अडानी और सागर अडानी को उनके अमेरिकी वकीलों और ईमेल के ज़रिए नोटिस तामील करने की अनुमति दे.

एसईसी ने बुधवार (21 जनवरी) को न्यूयॉर्क के ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट की अमेरिकी जिला अदालत में दायर एक याचिका में कहा, ‘एसईसी को उम्मीद नहीं है कि हेग कन्वेंशन के तहत नोटिस की तामील पूरी हो पाएगी.’ इसके साथ ही एजेंसी ने फरवरी 2025 से जिस संधि-आधारित प्रक्रिया का पालन किया जा रहा था, उसे प्रभावी रूप से छोड़ दिया है.

यह कदम एजेंसी की उस 14 महीने लंबी कोशिश में एक अहम बदलाव को दर्शाता है, जिसके तहत भारतीय अरबपतियों को औपचारिक रूप से उन आरोपों की सूचना देने का प्रयास किया जा रहा था, जो 75 करोड़ डॉलर के बॉन्ड इश्यू से जुड़े हैं. इस बॉन्ड पेशकश के जरिए अमेरिकी निवेशकों से लगभग 17.5 करोड़ डॉलर जुटाए गए थे.

यह कदम इस बात का भी संकेत है कि भारत के विधि और न्याय मंत्रालय के साथ करीब एक साल तक चली पत्राचार और बातचीत अब किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाई है.

अदालत में दाखिल अपने मेमोरेंडम में एसईसी ने कहा, ‘मंत्रालय के रुख और हेग कन्वेंशन के तहत पहली बार नोटिस तामील की कोशिश किए जाने के बाद बीते समय को देखते हुए, एसईसी को उम्मीद नहीं है कि हेग कन्वेंशन के माध्यम से नोटिस की तामील पूरी हो सकेगी.’ एजेंसी ने यह भी कहा, ‘एसईसी को भारतीय या अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत प्रतिवादियों को नोटिस तामील कराने का कोई वैकल्पिक तरीका ज्ञात नहीं है.’

‘ऐसा लगा कि एसईसी के पास अधिकार ही नहीं है’

14 दिसंबर, 2025 को एसईसी को भारत के विधि और न्याय मंत्रालय की ओर से पत्र मिले, जिनकी तारीख 4 नवंबर थी. इन पत्रों में एक नया और अप्रत्याशित आपत्ति दर्ज की गई थी. इन पत्रों को एसईसी की याचिका के साथ सबूत (एग्ज़िबिट) के तौर पर भी संलग्न किया गया है.

इन पत्रों में अमेरिका के एक नियम का हवाला दिया गया था, एसईसी की आंतरिक प्रक्रियाओं का नियम 5(b), जो यह तय करता है कि एजेंसी प्रवर्तन कार्रवाई कैसे शुरू करती है या मामलों को न्याय विभाग और स्व-नियामक संस्थाओं को कैसे भेजती है.

मंत्रालय ने कहा कि ‘दस्तावेज़ों की जांच की गई है और सिक्योरिटीज़ एंड एक्सचेंज कमीशन (एसईसी) की अनौपचारिक एवं अन्य प्रक्रियाओं के नियम 5(b), 17 C.F.R. § 202.5(b) को देखते हुए यह पाया गया है कि उपर्युक्त समन इन श्रेणियों में शामिल नहीं है.’

एसईसी ने 21 जनवरी को दाखिल अपनी अर्जी में इस आपत्ति को निराधार बताया.

एजेंसी ने लिखा, ‘इस आपत्ति का हेग कन्वेंशन से कोई संबंध नहीं है, क्योंकि हेग कन्वेंशन नोटिस तामील की प्रक्रिया को नियंत्रित करता है, न कि एसईसी के प्रवर्तन कार्रवाई शुरू करने के मूल अधिकार को.’ एसईसी ने यह भी कहा कि मंत्रालय का रुख ‘ऐसा प्रतीत होता है मानो एसईसी के पास हेग कन्वेंशन लागू करने या समन की तामील कराने का अधिकार ही नहीं है,’ जबकि संबंधित नियम का ‘हेग कन्वेंशन की प्रक्रियाओं से कोई लेना-देना नहीं है.’

यह दूसरी बार है जब भारत के विधि और न्याय मंत्रालय ने दस्तावेज़ों की तामील से इनकार किया है. पहली बार अप्रैल 2025 में इनकार किया गया था. तब मंत्रालय ने दस्तावेज़ों में मुहर और हस्ताक्षर न होने का हवाला दिया था, जबकि एसईसी का कहना है कि हेग कन्वेंशन के तहत इसकी कोई आवश्यकता नहीं होती.

अब फेडरल रूल्स ऑफ सिविल प्रोसीजर के नियम 4(f)(3) के तहत अदालत से अनुमति मांग रहा है, ताकि अडानी समूह के खिलाफ समन और शिकायत पत्र अमेरिका स्थित उनके वकीलों के माध्यम से और उनके व्यावसायिक ईमेल पतों पर ईमेल के ज़रिये भेजे जा सकें. एजेंसी का तर्क है कि इससे प्रतिवादियों को ‘प्रभावी सूचना’ मिलेगी, क्योंकि वे ‘इस मामले से अवगत हैं और अपनी प्रतिक्रिया को सक्रिय रूप से प्रबंधित कर रहे हैं.’

‘धोखाधड़ी’

20 नवंबर, 2024 को एसईसी ने अडानी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड के चेयरमैन गौतम अडानी और उनके भतीजे सागर अडानी, जो कंपनी के कार्यकारी निदेशक हैं, के खिलाफ एक सिविल शिकायत दायर की. इसमें आरोप लगाया गया कि उन्होंने भारतीय सरकारी अधिकारियों को सैकड़ों मिलियन डॉलर के भुगतान या भुगतान के वादों से जुड़ी एक रिश्वतखोरी योजना को अंजाम दिया.

ये आरोप सितंबर 2021 में अडानी ग्रीन द्वारा जारी बॉन्ड ऑफरिंग से जुड़े हैं, जिसके ज़रिये अमेरिकी निवेशकों से 175 मिलियन डॉलर से अधिक की राशि जुटाई गई थी. एसईसी की शिकायत के अनुसार, इस बॉन्ड ऑफरिंग से जुड़े दस्तावेज़ों में अडानी ग्रीन के भ्रष्टाचार-रोधी और रिश्वत-रोधी कार्यक्रमों को लेकर किए गए दावे गौतम और सागर अडानी के कथित आचरण के मद्देनज़र ‘महत्वपूर्ण रूप से झूठे या भ्रामक’ थे.

इसी दिन न्यूयॉर्क के ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट के लिए अमेरिकी अटॉर्नी कार्यालय ने एक समानांतर आपराधिक मामला भी दर्ज किया. इसमें अडानी बंधुओं और अन्य लोगों पर प्रतिभूति धोखाधड़ी की साज़िश, वायर फ्रॉड की साज़िश और प्रतिभूति धोखाधड़ी के आरोप लगाए गए.

अडानी समूह ने 21 नवंबर, 2024 को जारी अपने बयान में इन आरोपों को ‘निराधार’ बताया और कहा कि वह ‘सभी संभव कानूनी विकल्पों’ का सहारा लेगा.

‘कोई मुहर नहीं’

अडानी समूह को हेग कन्वेंशन (नागरिक या वाणिज्यिक मामलों में न्यायिक और गैर-न्यायिक दस्तावेज़ों की विदेशों में तामील से जुड़ा समझौता) के तहत नोटिस भेजने की एसईसी की कोशिशें 17 फरवरी 2025 को शुरू हुई थीं. इसी दिन एसईसी ने औपचारिक रूप से भारत के विधि एवं न्याय मंत्रालय को दस्तावेज़ भेजे थे, जो इस अंतरराष्ट्रीय संधि के तहत भारत की नामित ‘सेंट्रल अथॉरिटी’ है.

25 फरवरी 2025 की तारीख वाले पत्रों में – जिनकी प्रतियां 21 जनवरी को एसईसी द्वारा दायर याचिका के साथ संलग्न की गई थीं – मंत्रालय ने इन अनुरोधों को अहमदाबाद की जिला एवं सत्र न्यायालय को अग्रेषित किया. साथ ही निर्देश दिया गया कि ‘अनुरोध और मामले से जुड़े दस्तावेज़ों का एक सेट संबंधित पक्ष/पक्षों को तामील कराया जाए और तामील के प्रमाण से जुड़ी रिपोर्ट मंत्रालय को भेजी जाए.’

हालांकि, इसके कुछ हफ्तों बाद 16 अप्रैल 2025 को मंत्रालय ने इन अनुरोधों को बिना तामील किए वापस लौटा दिया. एसईसी के वकील क्रिस्टोफर एम. कोलोराडो को भेजे गए एक जैसे पत्रों में – जो याचिका के साथ संलग्न हैं – मंत्रालय ने लिखा कि ‘यह पाया गया है कि फॉरवार्डिंग लेटर पर न तो कोई मुहर है और न ही हस्ताक्षर, और मॉडल फॉर्म पर भी अनुरोध करने वाली प्राधिकरण की कोई मुहर नहीं है.’

इसके बाद एसईसी ने 27 मई 2025 को अनुरोध दोबारा भेजा. इसके साथ एक पत्र भी संलग्न किया गया, जिसमें कहा गया कि हेग कन्वेंशन के तहत न तो कवर लेटर और न ही मॉडल फॉर्म पर मुहर लगाना अनिवार्य है.

एसईसी ने उस पत्र में यह भी बताया कि उसके पास ऐसे कई पुराने रिकॉर्ड मौजूद हैं, जिनमें हेग सर्विस कन्वेंशन के तहत भारत की सेंट्रल अथॉरिटी को भेजे गए अनुरोध बिल्कुल इसी तरह के फॉर्मेट में थे और उन्हें बिना किसी समस्या के तामील कर दिया गया था. इसमें दिसंबर 2024 तक भेजे गए अनुरोध भी शामिल हैं, जिन पर कोई मुहर नहीं थी और कवर लेटर डिजिटल रूप से साइन किए गए थे.

एसईसी ने यह भी कहा कि वह अन्य देशों की सेंट्रल अथॉरिटीज़ को भी नियमित रूप से ऐसे ही अनुरोध भेजता है—बिना मुहर के और डिजिटल हस्ताक्षर वाले फॉरवार्डिंग लेटरों के साथ—और आमतौर पर उन पर कोई आपत्ति नहीं की जाती.

इसके बावजूद, भारतीय विधि एवं न्याय मंत्रालय की ओर से कोई जवाब नहीं आया. जब एसईसी के ऑफिस ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स ने 3 अप्रैल 2025 को स्थिति जानने के लिए एक फॉलो-अप पत्र भेजा, तब भी कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली. 12 सितंबर को भेजा गया दूसरा रिमाइंडर पत्र भी बिना जवाब के ही रह गया.

ईमेल के ज़रिए नोटिस भेजने की तैयारी

अब एसईसी ने जज निकोलस जी. गरौफिस से अनुरोध किया है कि उसे अडानी को नोटिस उनके अमेरिका स्थित क़ानूनी फर्मों और उनके कारोबारी ईमेल पतों के ज़रिये भेजने की अनुमति दी जाए.

सागर अडानी ने हेक्कर फिंक एलएलपी (Hecker Fink LLP) को अपना वकील नियुक्त किया है. इस फर्म के एक वकील ने 4 दिसंबर, 2024 को इस मामले से जुड़े प्रतिनिधित्व की पुष्टि की थी. वहीं, गौतम अडानी ने किर्कलैंड एंड एलिस एलएलपी (Kirkland & Ellis LLP) और क्विन इमैनुएल उरक्वार्ट एंड सुलिवन एलएलपी (Quinn Emanuel Urquhart & Sullivan LLP) को नियुक्त किया है. इन फर्मों के वकीलों ने 28 फरवरी, 2025 को एसईसी से संपर्क कर खुद को ‘इस मामले के संबंध में’ गौतम अडानी का काउंसल बताया था.

एसईसी ने अपनी याचिका में दलील दी, ‘प्रतिवादियों के स्थापित काउंसल के माध्यम से नोटिस देना लगभग तय तौर पर प्रतिवादियों तक सूचना पहुंचा देगा.’

एसईसी यह भी चाहती है कि प्रतिवादियों को उनके कारोबारी ईमेल पतों पर ईमेल के ज़रिये नोटिस भेजा जाए. एजेंसी ने कहा कि शिकायत दायर करने से पहले की जांच के दौरान उसे 100 से अधिक दस्तावेज़ मिले, जिनसे पता चलता है कि सागर अडानी ने अडानी ग्रीन से जुड़े कारोबारी कामकाज के लिए अपने कॉर्पोरेट ईमेल का इस्तेमाल किया था. इनमें बॉन्ड ऑफरिंग से जुड़े दस्तावेज़ भी शामिल हैं, साथ ही मार्च 2024 तक के हालिया दस्तावेज़ भी हैं.

इसी तरह, एसईसी को ऐसे दस्तावेज़ भी मिले हैं, जिनसे पुष्टि होती है कि गौतम अडानी ने भी अपने कारोबारी ईमेल का इस्तेमाल व्यावसायिक संवाद के लिए किया था. इनमें अडानी ग्रीन से जुड़ी बैठकों के पत्राचार शामिल हैं. यही ईमेल पता भारत के प्रतिभूति नियामक को दी गई एक सबमिशन में उनके संपर्क ईमेल के रूप में भी दर्ज है.

एसईसी ने लिखा, ‘यह मानने के ठोस आधार हैं कि दोनों ईमेल पते अभी भी सक्रिय हैं और उन पर निगरानी रखी जाती है.’

एसईसी ने इस बात की ओर भी इशारा किया कि प्रतिवादी इस मुक़दमे से पूरी तरह अवगत हैं, जिसका प्रमाण उनके सार्वजनिक बयान, नियामकीय फाइलिंग्स और अमेरिकी वकीलों की नियुक्ति है.

एजेंसी ने नवंबर 2024 और जून 2025 में अडानी की सार्वजनिक टिप्पणियों का हवाला भी संलग्न किया, जिनमें कहा गया था कि ‘अडानी पक्ष की ओर से किसी भी व्यक्ति पर फ़ॉरेन करप्ट प्रैक्टिसेज़ एक्ट के उल्लंघन या न्याय में बाधा डालने की साज़िश का कोई आरोप नहीं लगाया गया है.’

एसईसी ने लिखा, ‘प्रतिवादियों ने सार्वजनिक बयानों, नियामकीय फाइलिंग्स और अमेरिकी काउंसल की नियुक्ति के ज़रिये इस कार्रवाई की वास्तविक जानकारी होने का स्पष्ट प्रदर्शन किया है.’ आगे कहा गया, ‘इन सभी तथ्यों को मिलाकर यह साफ़ होता है कि प्रतिवादी मुक़दमे से पूरी तरह वाक़िफ़ हैं और अपनी प्रतिक्रिया को सक्रिय रूप से संभाल रहे हैं.’

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