अरावली परिभाषा: सुप्रीम कोर्ट की रोक बरक़रार, एमिकस क्यूरी चार सप्ताह में रिपोर्ट दाखिल करेंगे

अरावली पहाड़ियों की परिभाषा को लेकर जारी विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को सुनवाई करते हुए अपने पुराने फैसले पर लगाई रोक को बरक़रार रखा है, जिसमें पर्यावरण मंत्रालय द्वारा 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को ही अरावली मानने की सिफ़ारिश की गई थी.

फाइल तस्वीर: 27 दिसंबर, 2025 को नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अरावली पहाड़ियों के संरक्षण के लिए विरोध प्रदर्शन के दौरान छात्रों ने बैनर प्रदर्शित किए. (फोटो: पीटीआई)

बेंगलुरु: अरावली पहाड़ियों की विवादास्पद नई परिभाषा से संबंधित मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (21 जनवरी) को सुनवाई करते हुए अपने 20 नवंबर के उस पुराने फैसले पर लगी रोक को जारी रखा है, जिसमें 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को ही अरावली मानने की सिफारिश की गई थी.

मालूम हो कि सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ कर रही है. इस मामले को लेकर अदालत ने कहा कि नई परिभाषा के संबंध में अभी भी कुछ स्पष्टीकरण आवश्यक हैं, तभी वह इस पर कोई निर्णय ले पाएगी.

मुख्य न्यायाधीश ने कोर्ट के एमिकस क्यूरी के. परमेश्वर को अरावली की परिभाषा के मुद्दे पर एक विस्तृत नोट तैयार करने को कहा है.

बार एंड बेंच ने मुख्य न्यायाधीश के हवाले से कहा, ‘हमने प्रख्यात पर्यावरणविदों, वन विशेषज्ञों आदि के नाम भी सुझाने को कहा है, ताकि एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया जा सके, जो सभी पहलुओं पर विचार करे और अदालत की सहायता करे. ऐसी समिति इस अदालत के सीधे नियंत्रण और पर्यवेक्षण में काम करेगी.’

अदालत ने एमिकस क्यूरी को अरावली पहाड़ियों की परिभाषा पर चार सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया है.

हालांकि, पीठ ने यह भी कहा कि वह अरावली पहाड़ियों से संबंधित इस मामले पर कोई नई याचिका स्वीकार नहीं करेगी, क्योंकि इससे कार्यवाही में बाधा उत्पन्न होती है.

मुख्य न्यायाधीश ने अरावली पहाड़ियों में हो रहे अवैध खनन के ख़िलाफ़ सख्त कार्रवाई करने के अपने पूर्व रुख को दोहराते हुए इसे ‘अपराध’ करार दिया.

उन्होंने इस संबंध में साफ निर्देश दिया कि अरावली क्षेत्र में किसी भी प्रकार का अवैध खनन बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, क्योंकि इसके ‘अपूर्णीय और दूरगामी’ परिणाम होते हैं, जिन्हें बाद में सुधारना संभव नहीं होता.

वन बनाम अरावली?

इंडिया टुडे के एक लाइव ब्लॉग के अनुसार, पीठ ने बुधवार को सुनवाई के दौरान यह भी कहा कि वन और अरावली की परिभाषा के प्रश्न पर अलग-अलग विचार किया जाएगा.

न्यायालय ने कहा कि ये दोनों मुद्दे अलग-अलग चिंताएं पैदा करते हैं और इन पर स्वतंत्र रूप से विचार करने की आवश्यकता होगी.

हालांकि, यह कोर्ट के खुद के 1996 के उस आदेश के विपरीत है, जिसे अक्सर गोदावर्मन आदेश के नाम से जाना जाता है. इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया था कि वनों को – केवल शब्दकोशीय अर्थ में नहीं बल्कि कार्यप्रणाली के आधार पर – संरक्षित किया जाना चाहिए, भले ही उन्हें आधिकारिक तौर पर वन के रूप में वर्गीकृत न किया गया हो.

केरल की पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक प्रकृति श्रीवास्तव के अनुसार, ‘1996 के गोदावर्मन आदेश में स्वामित्व की परवाह किए बिना, सरकारी अभिलेखों और शब्दकोशों के अर्थ के अनुसार वन भूमि की पहचान करने का निर्देश दिया गया था. इन वनों में अधिसूचित वन; अवर्गीकृत वन; माने गए वन; पंजाब भूमि संरक्षण अधिनियम (पीएलपीए), 1900 की धारा 4 और 5 के तहत अधिसूचित हरियाणा और राजस्थान की भूमि; और अरावली पहाड़ियों में स्थित हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के ‘गैर मुमकिन पहाड़’ शामिल थे.’

यहां ‘गैर मुमकिन पहाड़’ का मतलब भारतीय राजस्व अभिलेखों में, विशेष रूप से हरियाणा और राजस्थान में पथरीले और खड़ी ढलान वाले भूभाग के कारण कृषि के लिए अनुपयुक्त पहाड़ियों या पर्वतों के रूप में वर्गीकृत भूमि से है, जिन्हें वन के रूप में पहचाना जाता है.

उल्लेखनीय है कि गोदावर्मन आदेश में अरावली पहाड़ियों में प्रचुर मात्रा में मौजूद सभी निम्नीकृत वनों की पहचान भी शामिल थी.

भारतीय वन सेवा की पूर्व अधिकारी ने 16 जनवरी को ‘डाउन टू अर्थ‘ पत्रिका में लिखा था कि न्यायालय ‘अपने ही आदेशों के साथ-साथ वन कानूनों के उल्लंघन को बढ़ावा दे रहा है.’

उन्होंने इस संबंध में कहा है, ‘यह अस्वीकार्य है कि अरावली पहाड़ियों को ऊंचाई के आधार पर परिभाषित किया जाए. यह भूलकर कि इसके वनों, धारा 4 और 5 के अंतर्गत अधिसूचित पीएलपीए भूमि और ‘गैर मुमकिन पहाड़ों’ की पहचान और संरक्षण पहले किया जाना चाहिए. यदि अरावली पहाड़ियों को 100 मीटर से अधिक की ऊंचाई के आधार पर परिभाषित करने का प्रयास किया जाता है, तो अरावली में स्थित हमारे वन इस परिभाषा के अंतर्गत आ जाएंगे और उनकी पहचान, सीमांकन, संरक्षण और अवस्था  में सुधार करने के बजाय खनन के लिए उन्हें बेच दिया जाएगा.’

सुप्रीम कोर्ट के पिछले आदेश में क्या कहा गया था?

इससे पहले 29 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने अपने पिछले आदेश (20 नवंबर का) पर रोक लगा दी थी, जिसमें अरावली पहाड़ियों की एक समान परिभाषा को स्वीकार किया गया था. यह परिभाषा केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय द्वारा अदालत को सुझाई गई थी.

हालांकि, पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों ने बताया था कि यह नई परिभाषा – जिसमें यह निर्दिष्ट किया गया था कि केवल 100 मीटर से अधिक ऊंची पहाड़ियां ही अरावली पहाड़ियों की श्रेणी में आएंगी – इस क्षेत्र के विशाल भूभाग को खनन के लिए खोल सकती है.

इसके बाद बड़े पैमाने पर नागरिक विरोध प्रदर्शन हुए, खासकर राजस्थान में, जो अरावली पहाड़ियों का अधिकांश हिस्सा वाला राज्य है.

विरोध प्रदर्शनों का स्वतः संज्ञान लेते हुए, न्यायालय ने 29 दिसंबर को अपने उस आदेश (जिसमें नई परिभाषा को स्वीकार किया गया था और जिसकी तिथि 20 नवंबर थी) को स्थगित कर दिया था.

इस आदेश में न्यायालय ने निर्देश दिया था कि अरावली पर्वत श्रृंखला का अध्ययन और सर्वेक्षण करने के लिए एक नई समिति गठित की जाए.

न्यायालय ने चिंता व्यक्त की थी कि उसके पिछले आदेश में स्वीकृत नई परिभाषा का ‘गलत अर्थ’ निकाला जा सकता है, जिससे उन क्षेत्रों में खनन को बढ़ावा मिल सकता है जिन्हें अरावली के अंतर्गत वर्गीकृत नहीं किया गया है.

न्यायालय ने यह भी कहा था कि 21 जनवरी को मामले की पुन: सुनवाई होने तक अरावली के संबंध में कोई कार्रवाई न की जाए.

ख़बरों के अनुसार, न्यायालय ने कहा था कि कार्यान्वयन से पहले, निष्पक्ष, तटस्थ और स्वतंत्र विशेषज्ञ राय पर विचार किया जाना चाहिए ताकि निश्चित मार्गदर्शन प्राप्त किया जा सके.

कोर्ट का कहना था कि यह जांच करना आवश्यक है कि क्या अरावली पहाड़ियों और पर्वत श्रृंखलाओं की परिभाषा ने एक ‘संरचनात्मक विरोधाभास’ उत्पन्न किया है, और क्या इसने गैर-अरावली क्षेत्रों के दायरे को विपरीत रूप से विस्तारित किया है, जिससे अनियमित खनन जारी रखने में सुविधा हो रही है.

लाइव लॉ के अनुसार, पीठ ने यह भी कहा था कि कुछ अन्य पहलुओं पर गहन विचार-विमर्श की आवश्यकता है– जैसे कि क्या पहाड़ियों के बीच 500 मीटर के गैप में विनियमित खनन की अनुमति दी जाएगी, और यदि हां, तो पारिस्थितिक निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए किन सटीक संरचनात्मक मापदंडों का उपयोग किया जाएगा.

अदालत ने कहा था कि यह निर्धारित किया जाना चाहिए कि क्या यह चिंता तथ्यात्मक और वैज्ञानिक रूप से सही है कि 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 पहाड़ियां ही 100 मीटर की ऊंचाई की सीमा को पूरा करती हैं, और क्या भूवैज्ञानिक जांच आवश्यक है.

द हिंदू के अनुसार, इस संबंध में मुख्य न्यायाधीश का कहना था कि ‘गैर-अरावली’ पहाड़ियों में आने वाले क्षेत्रों की विस्तृत पहचान करनी होगी.

सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली पहाड़ियों की परिभाषा को लेकर पहले बनी सभी समितियों की सिफारिशों का आकलन करने के लिए एक नई उच्चस्तरीय समिति गठित करने का प्रस्ताव भी दिया था.

(इस ख़बर को अंग्रज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)