जब हमारी पुण्यप्रसू वसुधा तरह-तरह के झूठों से हर रोज़ पाटी जा रही है और एक बड़ा परिवर्तन हमारी जलवायु में यह हो रहा है कि हम पर झूठ एक पर्यावरण या आच्छादन के रूप में छाता जा रहा है और अब हम झूठ में ही सांस ले रहे हैं तो यह सवाल उठना लाज़िमी है कि ऐसे दमघोंटू और ‘असत्यविषमूर्च्छित’ परिस्थिति में सच की जगहें कहां हैं; वह अब भी कहां सजीव और सक्रिय है.
यह तो स्पष्ट है कि जहां पहले उसकी कुछ जगह या घुसपैठ थी वहां से वह निकाला-हकाला जा चुका है. वह राजनीति में, धर्म में, शिक्षा में, मीडिया में, बाज़ार में अब नहीं पाया जाता. वहां उसकी कोई ज़रूरत या जगह नहीं रह गई है. उसकी चिंता भी इन क्षेत्रों में नहीं बची है. शिक्षा और विद्वत्ता के क्षेत्र भी इस क़दर तेज़ी से दूषित-विकृत हुए हैं कि वहां से भी उसका लगभग देशनिकाला हो चुका है.
थोड़े बहुत दार्शनिक, इतिहासकार, समाजशास्त्री, साहित्य और भाषा के विशेषज्ञ और उनके शिष्य बचे हैं जिन्हें अब भी सच की चिंता है. वे अब भी सच की जटिलताओं को समझने-बूझने की कोशिश कर रहे हैं. उनकी यह कोशिश कोई व्यापक सामाजिक उपस्थिति नहीं बन पा रही है और न ही उन्हें प्रतिरोधक के रूप में देखा-सुना जा रहा है.
सच की जगह कम हो गई है और उसकी आवाज़ धीमी पड़ गई है. यह अहसास गहराता जाता है कि पूरे समाज में सच के लिए धीरज भी बाक़ी नहीं रहा.
हम लेखक तो हमेशा संशयशील होते हैं. हमें अपने माध्यम और उससे अर्जित किसी सच को कहने की हिम्मत और कई बार हिमाक़त हो भी तो उस पर हमें शक भी होता है. जब सारे झूठ भाषा में ही व्यक्त और फैलाए-बढ़ाए जा रहे हों तो हमारी यानी के साहित्य की भाषा उनसे अछूती रह जाएगी ऐसा कैसे हो सकता है?
भाषा में दुचित्तापन है- वह झूठ और सच दोनों की भाषा है. वह प्रेम और घृणा की, सद्भाव और विद्वेष की, समरसता और विखंडन की, सत्ता और प्रतिरोध की, प्रार्थना और गाली आदि की भाषा भी है.
ऐसे में यह दावा करना या कि अपेक्षा भी कि साहित्य और लेखक इस दुचित्तेपन से मुक्त होकर सच के पक्षधर हैं, कठिन और अव्यावहारिक है. जिस समाज और भाषा में यह सब हो रहा है, लेखक उसी में रहते हैं, वे किसी अरण्य या गुफा में बैठकर नहीं लिखते उनके घर भी उन्हीं मुहल्लों में जहां तरह-तरह की गंदगी इतनी फैल गई है कि उससे पाक-साफ़ रह पाना बहुत कठिन हो गया है.
इस समय ऐसे लेखक और ऐसा साहित्य है जो या तो इस गंदगी में लिपटे हुए है या कि उसी से पूरी तरह अविचलित और उदासीन हैं. उनमें से कई खुद झूठ न भी बोलते-बरतते हों, पर वे झूठ से बेचैन या विचलित नहीं हैं और जिन्हें ‘सब कुछ के साथ’ रहने की बहुत व्यावहारिक आदत है. उनका रचा-लिखा न तो गवाही है, न साहसी, न अंतःकरण का कोई आयतन उसमें है. नतीजन, उनमें न कोई सच की ताब है, न उसकी आंच और इसलिए न कोई महत्व. उनकी संख्या, हो सकता है, इस बीच बढ़ गई हो पर अंततः उनकी साहित्य में जगह नहीं बढ़ पाएगी.
ऐसे भी लेखक हैं जो सावधान हैं और उन्होंने सच को व्यक्त करने का ऐसा परोक्ष तरीका निकाल लियाा है कि कोई आपत्ति न हो सके. वे झूठ के लोकलुभावन झांसों में नहीं फंसे हैं और जो अपने सच को, और उस नाते व्यापक सच को, थोड़ा-बहुत बचाए हुए हैं. उनके यहां सच है पर थोड़ा पिछवाड़े है और खोजने पर मिल सकता है.
अब बचे वे लेखक जिनके यहां सच उनकी परछी में ही सीधे मिल सकता है. वे झूठ के बढ़ते आतंक का साहस और कल्पनाशीलता से सामना करते हुए, उसके सामने बिना झुके, दुष्परिणामों की चिंता किए बग़ैर, सच के मुखर पक्षधर हैं और इस कुसमय में मानवीय स्थिति, मानवीय विडंबना और मानवीय नियति को समझने और सच की आंच हम तक पहुंचाने का उद्यम कर रहे हैं. उनकी संख्या कम है और इस समय संख्याबल का इतना घटाटोप है कि उनकी आवाज़ अनसुनी, उनका शांत साहस अनदेखा, उनका सच उपेक्षित जा सकता है. पर वे हैं और उनका होना आश्वस्त करता है.
वे निहत्थे हैं पर अकेले नहीं हैं- अन्य क्षेत्रों जैसे ललित कलाओं, रंगमंच, पत्रकारिता, सोशल मीडिया, विद्वत्ता आदि क्षेत्रों में भी ऐसे लोग हैं जो निडर सच पर अड़े हुए हैं.
सच की पहुंच
सच सदियों से एक विवादास्पद धारणा रहा है. हमारे समय में झूठों का ऐसा भयानक और विकराल घटाटोप लगभग दैनिक रूप से हम पर थोपा जाता है कि यह शक होने लगता है कि सच है भी या कि वह मनुष्य द्वारा रचा गया एक स्थायी, लगभग कालातीत, गल्प है. वह एक साथ राजनीति, सामाजिक आचार और संवाद, धर्म और विज्ञान, दर्शन और संस्कृति, व्यावहारिक जीवन, संप्रेषण, साहित्य और कलाओं में उठता, विचलित और आक्रांत करता, हमेशा परिभाषा से परे रहता आया है. उसे लेकर हमारी निजी और सामाजिक बेचैनी इधर कुछ ज़्यादा ही बढ़ गई है.
साहित्य और कलाओं में यह धारणा प्रबल रही है कि सच या सत्य खोजा नहीं, रचा और आविष्कृत किया जाता है. यह भी कि छोटे से छोटे सब को ख़राब नहीं जाना चाहिए. एक लेखक के रूप में मेरा आग्रह, या कहें पूर्वाग्रह, यह रहा है कि साहित्य और कलाओं का सरोकार सचाई से अधिक रहा है सच से कम: सचाई अधिक बहुवचन, अराजक, लोकतांत्रिक होती है जबकि सच एकवचन, सर्वोपरि और अधिपति होता है.
ऐसा भी माना गया है कि भले औपनिषदिक उक्ति तो है कि ‘एकं सद् विप्राः बहुधा वदन्ति’, साहित्य का सच, संगीत का सच, चित्रकला का सच, स्थापत्य का सच, नृत्य का सच, रंगमंच का सच अलग-अलग, विविध और बहुल, होते हैं. फ्रेंच कवि-कलाविद् ईव बोनफुआ की तो एक पूरी पुस्तक है जिनका शीर्षक है ‘द ट्रूथ ऑफ पेंटिंग’. चित्रकार पिकासो ने कहा था कि ‘कला वह झूठ है जो सच कहता है.’ ‘स्वीडिश कवि टोमस ट्रांस्टामर की एक पंक्ति है- ‘सच को फर्नीचर की दरकार नहीं.’
ऐसा भी कहा गया है कि कोई परम सत्य नहीं होते, सारे सत्य अंतरिम सत्य हैं. प्रतिबद्ध बुद्धिजीवी यह मानते हैं कि साहित्य का काम सत्ता से सच बोलने का होता है. ज़ाहिर है कि सच या सत्य के आशय और संदर्भ बहुत गतिशील रहे हैं. आज जिन विपुल-विविध-बहुल झूठों का व्यापक-दुखद संदर्भ है, उसमें सच अल्पसंख्यक हो गया है, ऐसा अल्पसंख्यक, जिस पर यक़ीन करने वाले, तेज़ी से लगातार कम हो रहे हैं और जो लगातार हाशिये पर ढकेला जा रहा है.
यों तो हमारा राष्ट्रीय आप्तवाक्य है: ‘सत्यमेव जयते’. पर उसी राष्ट्र में झूठ एक दशक से अधिक दिग्विजय हासिल करता, अपने क्षेत्र-मान्यता-प्रतिष्ठा-लोकप्रियता सभी बढ़ाता रहा है और इस मुक़ाम पर यह उम्मीद करना कठिन लगता है कि सत्य अंततः जीतेगा.
ये सब बातें सूझीं प्रख्यात दार्शनिक अकील बिलग्रामी द्वारा दिए गए रज़ा व्याख्यान के अवसर पर जिसका विषय है ‘सत्य की पहुंच’. यह देखना आश्वस्तिकर था कि उन्हें सुनने बड़ी संख्या में युवा आए इससे यह नतीजा थोड़ी अधीरता में निकालने का मन होता है कि सच के लिए, थोड़ी सी सही, जगह बची हुई है.
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
