पाठ्यपुस्तकों से मुग़लों जैसे राजवंशों को पूरी तरह से हटाना बेतुका: इतिहासकार रोमिला थापर

प्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर ने पाठ्यपुस्तकों से मुग़लों और दिल्ली सल्तनत जैसे राजवंशों को हटाने की प्रथा को ‘बेतुका’ बताते हुए कहा कि इतिहास एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है और इसे टुकड़ों में नहीं पढ़ाया जा सकता. थापर ने सोशल मीडिया पर ‘लोकप्रिय इतिहास’ के बढ़ते प्रभाव पर चिंता जताते हुए कहा कि यह अक्सर शोध-आधारित इतिहास और व्यक्तिगत राय के बीच की रेखा को धुंधला कर देता है.

इतिहासकार रोमिला थापर. (फोटो: द वायर)

नई दिल्ली: प्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर ने पाठ्यपुस्तकों से मुग़लों जैसे राजवंशों के उल्लेख को पूरी तरह हटाने की प्रथा को ‘बेतुका’ बताते हुए कहा कि इतिहास एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है और इसे टुकड़ों में नहीं पढ़ाया जा सकता. 

पीटीआई के मुताबिक, केरल लिटरेचर फ़ेस्टिवल (केएलएफ) के नौवें संस्करण में शनिवार (25 जनवरी) को ऑनलाइन संबोधन करते हुए थापर ने सोशल मीडिया पर लोकप्रिय इतिहास के बढ़ते प्रभाव, नारीवादी इतिहास के महत्व और मौजूद जानकारी पर सवाल उठाने में शिक्षा की केंद्रीय भूमिका जैसे मुद्दों पर बात की.

उन्होंने कहा, ‘जो कुछ हो रहा है, जैसे पाठ्यक्रम से इतिहास के बड़े हिस्सों को हटा देना या यह कहना कि हमें उन्हें पढ़ने की ज़रूरत नहीं है, वह बेतुका है. इतिहास एक प्रक्रिया है. यह लोगों, संस्कृतियों, व्यवहार और सोचने के तरीकों का विकास है.’ 

थापर ने कहा, ‘इस निरंतरता को यह कहकर नहीं तोड़ा जा सकता कि ‘ठीक है, हम इस राजवंश को हटा देते हैं, मुग़लों को हटा देते हैं.’ ऐसा करने से इतिहास खंडित हो जाता है और इसका कोई अर्थ नहीं रह जाता.’ 

ज्ञात हो कि राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने 2025-26 शैक्षणिक सत्र के लिए कक्षा 7 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में संशोधन करते हुए दिल्ली सल्तनत और मुग़लों से जुड़े अध्याय हटा दिए हैं.

इसके साथ ही पाठ्यपुस्तक में अब मौर्य, शुंग और सातवाहन जैसे प्राचीन भारतीय राजवंशों के साथ-साथ विभिन्न धार्मिक परंपराओं की सांस्कृतिक परंपराओं और पवित्र स्थलों पर ज़ोर दिया गया है.

थापर ने यह टिप्पणी उन्होंने ‘वीमेन राइटिंग हिस्ट्री: थ्री जेनरेशन्स’ सत्र के दौरान बोलते हुए की. थापर 25 से अधिक शैक्षणिक पुस्तकों की लेखिका हैं.

चार दिन तक चले इस साहित्यिक महोत्सव में 400 से अधिक वक्ता शामिल हुए. इनमें नोबेल पुरस्कार विजेता अब्दुलराज़ाक गुरनाह और अभिजीत बनर्जी, अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स, लेखिका किरण देसाई, निबंधकार पिको अय्यर, ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता प्रतिभा राय, खेल जगत के दिग्गज रोहन बोपन्ना और बेन जॉनसन, तथा विकिपीडिया के संस्थापक जिमी वेल्स शामिल हैं. केएलएफ 2026 का नौवां संस्करण रविवार (25 जनवरी) को समाप्त हो गया.

लोकप्रिय इतिहास और पेशेवर इतिहासकारों द्वारा लिखे गए इतिहास के बीच अंतर

94 वर्षीय इतिहासकार ने सोशल मीडिया पर ‘लोकप्रिय इतिहास’ के बढ़ते प्रभाव पर भी चिंता जताई और कहा कि यह अक्सर शोध-आधारित इतिहास और व्यक्तिगत राय के बीच की रेखा को धुंधला कर देता है. उन्होंने लोगों से अतीत की घटनाओं को समझने के लिए पेशेवर इतिहासकारों के लेखन पर भरोसा करने की अपील की.

उन्होंने कहा, ‘लोकप्रिय इतिहास और पेशेवर इतिहासकारों द्वारा लिखे गए इतिहास के बीच अंतर है, और उस अंतर को समझना ज़रूरी है. किसी ऐतिहासिक कथन का ज़िक्र करते समय यह जानना चाहिए कि वह पेशेवर इतिहास लेखन से आया है या सोशल मीडिया पर फैलाया गया कोई बयान है.’

उन्होंने यह भी ज़ोर दिया कि पेशेवर क्षेत्रों में महिलाओं के लिए अपनी स्वायत्तता पर ज़ोर देना और सम्मान की मांग करना बेहद ज़रूरी है. उनके अनुसार, नारीवादी इतिहास लिखना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही ज़रूरी है ‘नारीवादी की तरह व्यवहार करना,’ यानी स्वतंत्रता, आलोचनात्मक सोच और बौद्धिक आज़ादी के लिए खड़े होना.

थापर ने कहा, ‘मुझे लगता है कि एक स्वायत्त महिला अत्यंत आवश्यक है. इसलिए मेरा रुख यह रहा है कि हां, हमें नारीवादी इतिहास लिखना चाहिए, यह तो तय है. लेकिन अगर मैं नारीवादी इतिहास नहीं भी लिख रही हूं, तो कम से कम नारीवादी की तरह व्यवहार कर रही हूं. मैं यह विचार आगे बढ़ा रही हूं कि किसी भी समाज के लिए एक स्वायत्त महिला बेहद जरूरी है.’