छत्तीसगढ़ सरकार के ग्रीन केव को पर्यटकों के लिए खोलने के फैसले पर पर्यावरणविदों का कड़ा विरोध

छत्तीसगढ़ सरकार ने बस्तर ज़िले के कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान में स्थित दुर्लभ और पर्यावरण की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील ग्रीन केव को पर्यटकों के लिए खोलने का फैसला किया है. वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने इस पर विरोध जताते हुए कहा कि इस प्रकार की गुफा पारिस्थितिकी दुनिया की सबसे नाज़ुक प्रणालियों में से एक होती है. ये बंद और स्थिर प्रणालियां होती हैं, जहां मामूली हस्तक्षेप भी अपूरणीय क्षति का कारण बन सकता है.

बस्तर जिले के कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान में स्थित दुर्लभ और पर्यावरण की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील ग्रीन केव. (फोटो साभार: Chhattisgarh Tourism)

नई दिल्ली: कभी माओवादी प्रभावित रहे बस्तर जिले के कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान में स्थित दुर्लभ और पर्यावरण की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील ग्रीन केव को पर्यटकों के लिए खोलने के छत्तीसगढ़ सरकार के फैसले पर वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने कड़ा विरोध जताया है.

क्षेत्र में माओवादी गतिविधियों में उल्लेखनीय कमी आने के बाद राज्य सरकार बस्तर के अधिक से अधिक स्थलों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर लाने के विकल्प तलाश रही है. इसी क्रम में ग्रीन केव को संभावित पर्यटन स्थल के रूप में देखा जा रहा है.

न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य के वन मंत्री केदार कश्यप ने कहा, ‘इस गुफा को शामिल करने से स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और क्षेत्रीय विकास को गति मिलेगी. इससे घाटी में पर्यटन को एक नया आयाम मिलेगा.’

कोटुमसर क्षेत्र में स्थित प्राकृतिक रूप से बनी ग्रीन केव हजारों से लेकर लाखों वर्षों में भूवैज्ञानिक और जल-वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के जरिए विकसित हुई है.

विशेषज्ञों के अनुसार यह गुफा केवल अत्यंत विशिष्ट प्राकृतिक परिस्थितियों में ही जीवित रह पाती है – जैसे प्रतिदिन सीमित समय के लिए सूर्य प्रकाश का संपर्क, स्थिर तापमान, अत्यधिक आर्द्रता और पोषक तत्वों की बहुत कम उपलब्धता.

नाज़ुक पारिस्थितिकी

इसी बीच, वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी कि इस प्रकार की गुफा पारिस्थितिकी दुनिया की सबसे नाज़ुक प्रणालियों में से एक होती है. ये बंद और स्थिर प्रणालियां होती हैं, जहां मामूली हस्तक्षेप भी अपूरणीय क्षति का कारण बन सकता है.

लखनऊ स्थित बिरबल साहनी पुराजीव विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रो. महेश जी. ठक्कर ने कहा, ‘पर्यटकों की आवाजाही से धूल, शोर, कंपन और आर्द्रता में बदलाव गुफा के पर्यावरण पर तात्कालिक और दीर्घकालिक दोनों तरह के दुष्प्रभाव डाल सकते हैं.’

उन्होंने आगे कहा, ‘बिना व्यापक आधारभूत वैज्ञानिक, पारिस्थितिक और पर्यावरणीय प्रभाव आकलन के ग्रीन केव को आम लोगों के लिए खोलना अत्यंत जोखिम भरा और वैज्ञानिक दृष्टि से अविवेकपूर्ण है. इससे अपूरणीय क्षति हो सकती है. एक बार बाधित होने के बाद ऐसी प्रणालियां मानव समयसीमा में शायद ही कभी पुनः सामान्य हो पाती हैं.’

विशेषज्ञों के अनुसार गुफा पारिस्थितिक तंत्र को उबरने में सदियां लग जाती हैं और कई मामलों में नुकसान स्थायी होता है.

पर्यावरणविदों ने कहा कि, ‘गुफा की दीवारों को अनजाने में छूना भी हजारों वर्षों में बने सूक्ष्मजीवी परतों और बायोफिल्म्स को नष्ट कर सकता है. कृत्रिम रोशनी से आक्रामक शैवाल (‘लैम्पन-फ्लोरा’) पनप सकते हैं, जो गुफा की पारिस्थितिकी को मूल रूप से बदल देते हैं.’

डेक्कन क्रॉनिकल ने भारत के प्रसिद्ध गुफा अन्वेषक और वैज्ञानिक डॉ. जयंत विश्वास के हवाले से कहा, ‘कांगेर घाटी की अब तक खोजी गई लगभग 27 गुफाओं में यह एकमात्र गुफा है जिसमें दोपहर के समय, वह भी केवल एक घंटे के लिए सूर्य की रोशनी पहुंचती है. इसमें स्टैलेक्टाइट्स हैं, जिन पर शैवाल की परत जमी हुई है, जिससे यह बारीक हरे रंग की ऑयल पेंटिंग जैसी बनावट देती है.’

‘ग्रीन केव’ का नाम गुफा की दीवारों और छत से लटकी चूना-पत्थर की संरचनाओं (स्टैलेक्टाइट्स) पर मौजूद सूक्ष्म हरी माइक्रोबियल परतों के कारण पड़ा है. अपनी विशिष्ट भूवैज्ञानिक विशेषताओं के कारण इसे राष्ट्रीय उद्यान की दुर्लभ गुफाओं में गिना जाता है.

अखबार के अनुसार, यह आकर्षक गुफा कुटुमसर गुफा समूह के कम्पार्टमेंट नंबर 85 में स्थित है, जो पार्क के भीतर एक प्राकृतिक चूना-पत्थर की संरचना है. ग्रीन केव के भीतर एक बड़ा कक्ष है, जिसमें हरे रंग के विशाल स्टैलेक्टाइट्स और बहते पानी से बनी पत्थर की परतें (फ्लो-स्टोन) मौजूद हैं. गुफा के दाहिनी ओर लगभग 70 मीटर लंबी एक अंधेरी सुरंग है, जिसमें सफेद स्टैलेक्टाइट्स पाए जाते हैं.

डॉ. विश्वास के अनुसार, कुटुमसर गुफाएं पृथ्वी की गहराइयों में नदियों के बहाव से बनी हैं.

गुफाओं के भीतर तापमान पूरे वर्ष लगभग समान रहता है और यहां मेंढक, टिड्डे, केकड़े तथा अन्य सरीसृप पाए जाते हैं. ग्रीन केव स्थानीय आदिवासियों के लिए एक धार्मिक स्थल भी है. गुफा की आयु निर्धारण (डेटिंग) अभी तक नहीं की गई है.

विडंबना यह है कि गुफा के मुहानों के पास पर्यटन को सुविधाजनक बनाने के लिए कुछ नागरिक निर्माण कार्यों को पहले ही मंजूरी दिए जाने की खबरें हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि इससे पर्यटन औपचारिक रूप से शुरू होने से पहले ही गुफा पारिस्थितिकी को अपूरणीय नुकसान हो सकता है.

विशेषज्ञों ने जोर देकर कहा कि यदि भविष्य में कभी पर्यटन की अनुमति दी भी जाए, तो वह अत्यंत सीमित, कड़ाई से नियंत्रित और विज्ञान-आधारित होनी चाहिए, जिसमें मनोरंजन से पहले संरक्षण को प्राथमिकता दी जाए.

पर्यावरण प्रेमी नितिन सिंहवी ने अतिरिक्त मुख्य सचिव (वन) को शिकायत भेजकर चेतावनी दी है कि पर्यटन से अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड, गर्मी, नमी, धूल और कंपन उत्पन्न होगा, जिससे गुफा की आंतरिक रसायनिकी प्रभावित होगी और उसकी हरी सूक्ष्मजीवी परतों को गंभीर नुकसान पहुंचेगा.