इंदौर दूषित पानी: हाईकोर्ट का मौत संबंधित ऑडिट रिपोर्ट पर सवाल, जांच के लिए न्यायिक आयोग का गठन

इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतों के मामले में हाइकोर्ट ने कड़ा रुख़ अपनाते हुए स्वतंत्र जांच के आदेश दिए हैं. अदालत ने कहा कि मामला अत्यंत गंभीर हैं और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार से सीधे जुड़ा है. कोर्ट ने जांच के लिए रिटायर जज जस्टिस सुशील कुमार गुप्ता की अध्यक्षता में एक सदस्यीय न्यायिक आयोग का गठन किया है.

(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतों के मामले में एक महीने बाद मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत ऑडिट रिपोर्ट पर कई सवाल उठाए हैं.

न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इस संबंध में मंगलवार (27 जनवरी) को इंदौर स्थित मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की दो न्यायाधीशों की खंडपीठ ने शासन-प्रशासन से मौत के वास्तविक आंकड़े को लेकर पूछा कि कुल 23 मौतों में से केवल 16 को ही दूषित पानी से हुई मौत क्यों माना जा रहा है.

मालूम हो कि हाईकोर्ट की जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने हाल ही में दूषित पानी की वजह से भागीरथपुरा के निवासियों की मौतों से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई फिर से शुरू की है.

लाइव लॉ के अनुसार, मामले में हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्वतंत्र जांच के आदेश दिए हैं. अदालत ने जांच के लिए रिटायर जज जस्टिस सुशील कुमार गुप्ता की अध्यक्षता में एक सदस्यीय न्यायिक आयोग का गठन किया.

कोर्ट ने कहा कि मामला अत्यंत गंभीर हैं और मामला संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार से सीधे जुड़ा है. इसलिए तथ्यों की निष्पक्ष जांच के लिए एक स्वतंत्र और विश्वसनीय प्राधिकरण द्वारा जांच जरूरत है और इसी को ध्यान में रखते हुए रिटायर जज को जांच आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया जा रहा है.

उल्लेखनीय है कि राज्य सरकार ने अपने वकील के माध्यम से इस मामले की प्रगति और स्थिति रिपोर्ट उच्च न्यायालय की खंडपीठ के समक्ष प्रस्तुत की.

सरकार के हवाले से अदालत में बताया गया कि इंदौर के महात्मा गांधी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज के एसोसिएट और असिस्टेंट प्रोफेसरों की पांच सदस्यीय मृत्यु ऑडिट समिति ने पाया कि 23 में से 16 मौतें दूषित जल से फैली महामारी के कारण हुई थीं, जबकि अन्य पांच मौतों पर रिपोर्ट अभी प्रतीक्षित है.

हालांकि, याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील अजय बगड़िया ने तर्क दिया कि सरकार द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट अस्पष्ट है और उसका कोई महत्व नहीं है.

अजय बगड़िया ने कहा, ‘रिपोर्ट अदालत में प्रस्तुत करने से पहले उन्हें (अधिकारियों को) थोड़ा और गंभीर, सतर्क और विचारशील होना चाहिए था. इसमें निष्पक्षता का कोई नामोनिशान नहीं है. सरकारी मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसरों की एक समिति ने जिले के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी और अन्य स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों द्वारा दी गई जानकारी और केस शीट के आधार पर मौतों का ऑडिट किया है. जब इस प्रक्रिया में शामिल सभी लोग सरकारी कर्मचारी हैं, तो हम निष्पक्षता की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?’

बगड़िया ने आगे तर्क दिया, ‘रिपोर्ट न केवल अस्पष्ट है, बल्कि रहस्य से घिरी हुई है और ऐसा लगता है कि जो कुछ हुआ है उसे छिपाने का प्रयास किया गया है. हालांकि सरकार ने बताया है कि 23 में से 16 मौतें दूषित पानी से फैली महामारी के कारण हुई हैं, लेकिन इन 16 मौतों के साथ-साथ शेष सात मौतों के संबंध में भी अनिश्चितता के तत्व मौजूद हैं. इन मौतों के संबंध में कुछ बहुत ही संदिग्ध चल रहा है.’

इस पर उच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश विजय कुमार शुक्ला ने कहा कि सरकार यह साबित करने में विफल रही है कि मौतों का ऑडिट किस आधार पर किया गया और क्या वे दूषित पानी से फैली महामारी से निर्णायक रूप से संबंधित थीं.

याचिकाकर्ताओं के वकील की दलीलों और उच्च न्यायालय की टिप्पणियों का जवाब देते हुए सरकारी वकील ने बताया कि अब तक हुई प्रत्येक मृत्यु के मामलों/तथ्यात्मक विवरणों को संक्षेप में प्रस्तुत करने वाली एक विस्तृत रिपोर्ट न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की जाएगी.

उन्होंने आगे कहा, ‘हम यह भी सुनिश्चित करेंगे कि भागीरथपुरा निवासियों की मृत्यु की जांच कर रही पांच सदस्यीय ऑडिट कमेटी के कम से कम एक विशेषज्ञ अगली सुनवाई में उच्च न्यायालय के समक्ष उपस्थित रहें, ताकि वे इस मुद्दे पर तकनीकी जानकारी प्रस्तुत कर सकें.’

‘वर्बल आटोप्सी’

इस संबंध में अदालत को इंदौर जिले के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) डॉ. माधव हसनी ने बताया कि प्रत्येक मृत्यु का ऑडिट समिति द्वारा मीडिया और अन्य स्रोतों से प्राप्त जानकारी, मामले की स्थिति और वर्बल आटोप्सी के आधार पर किया गया है.

हालांकि, जब उच्च न्यायालय ने जब उनसे वर्बल आटोप्सी के बारे में पूछा, तो सीएमएचओ ने कहा कि यह उन रोगियों की मृत्यु से संबंधित है जिनकी मृत्यु घर पर हुई या जिनके पर्याप्त अस्पताल रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं.

हालांकि, कोर्ट इस मुद्दे पर सीएमएचओ और सरकारी वकील के जवाब से संतुष्ट नहीं हुआ और स्थिति को चिंताजनक बताया. मंगलवार को लंबी सुनवाई के बाद दो जजों की बेंच ने फैसला सुरक्षित रख लिया.

हाईकोर्ट ने कहा कि भागीरथपुरा क्षेत्र में पेयजल आपूर्ति के दूषित होने का मामला अत्यंत गंभीर है, जिससे बच्चों और बुजुर्गों सहित बड़ी आबादी के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है.

कोर्ट ने यह भी कहा कि जहां एक ओर याचिकाकर्ता और मीडिया में आई खबरें मृतकों की संख्या लगभग 30 बता रही हैं, वहीं सरकारी रिपोर्ट में केवल 16 मौतें दर्शाई गई हैं, वह भी बिना ठोस आधार और रिकॉर्ड के. प्रस्तुत की गई तस्वीरें, मेडिकल रिपोर्ट और अधिकारियों को दी गई शिकायतें प्रथम दृष्टया इस बात का संकेत देती हैं कि यह मामला तत्काल न्यायिक जांच की मांग करता है.

इस दौरान वरिष्ठ हाईकोर्ट जज विजय कुमार शुक्ला ने कहा, ‘इस मामले (भागीरथपुरा में हुई मौतों) की सुनवाई के बाद हमारी पहली प्रतिक्रिया यह पता लगाना था कि हाईकोर्ट की पानी की टंकी की सफाई कौन करता है. संबंधित ठेकेदार को बुलाया गया, उसकी जांच की गई और हमने तुरंत टंकी की सफाई करवाई. यहां (इंदौर में) किसी को भी सुरक्षित पीने का पानी मिलने की गारंटी नहीं दी जा सकती. पीने के पानी की स्थिति वाकई बेहद चिंताजनक है.’

भागीरथपुरा में पाइपलाइन और दूषित जल आपूर्ति

सुनवाई के दौरान उपस्थित इंदौर नगर निगम (आईएमसी) के वकील ने कहा कि पानी का दूषित होना केवल कुछ स्थानों पर पीने के पानी और सीवर लाइनों के समानांतर चलने के कारण ही नहीं हुआ, बल्कि संभवतः भागीरथपुरा के मुख्य ओवरहेड जल ​​आपूर्ति टैंक से पानी की आपूर्ति करने वाली मुख्य पाइपलाइन के दूषित होने के कारण भी हुआ है.

बताया गया कि भागीरथपुरा क्षेत्र के कुल 26 किलोमीटर पाइपलाइन नेटवर्क में से लगभग 9.5 किलोमीटर पाइपलाइन को नई पाइपलाइन से बदला जा चुका है, जबकि शेष लगभग 70% पाइपलाइन को बदलने का काम जारी है.

आईएमसी के वकील ने बताया, ‘नई पाइपलाइनों के माध्यम से आपूर्ति किए जा रहे पानी के नमूनों का प्रयोगशालाओं में परीक्षण किया गया है और परिणाम बताते हैं कि यह पीने योग्य है. भागीरथपुरा के शेष निवासियों को अब पानी के टैंकरों के माध्यम से पानी की आपूर्ति की जा रही है, और हमने उन पानी की टंकियों के नमूनों का परीक्षण करके पानी की सुरक्षा भी सुनिश्चित की है जिनसे टैंकर भागीरथपुरा में आपूर्ति के लिए पानी ले रहे हैं.’

10 लाख रुपये के मुआवजे की मांग

याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे एक अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता ने रेड क्रॉस सोसाइटी के माध्यम से अधिकारियों द्वारा प्रत्येक 21 पीड़ित परिवारों को दिए गए 2 लाख रुपये के प्रारंभिक मुआवजे पर असंतोष व्यक्त किया.

वरिष्ठ अधिवक्ता ने मांग की, ‘कुछ साल पहले इंदौर के एक अन्य हिस्से में कुआं धंसने से अपने प्रियजनों को खोने वाले प्रत्येक परिवार को 5 लाख रुपये का मुआवजा दिया गया था. तो फिर यहां प्रत्येक परिवार को केवल 2 लाख रुपये का मुआवजा क्यों दिया जा रहा है, जिसने अधिकारियों की लापरवाही के कारण अपने सदस्यों को खो दिया? सरकार को 10 लाख रुपये का मुआवजा देना चाहिए और दोषी अधिकारियों के खिलाफ गैर इरादतन हत्या का मामला भी दर्ज करना चाहिए.’

गौरतलब है कि प्रदेश में इसी सप्ताह दूषित पानी से तीन दिनों के भीतर चार नई मौतों का मामला सामने आया है, जिसे लेकर कांग्रेस ने राज्य की भाजपा सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि ये सब भाजपा की अनदेखी, भ्रष्टाचार और घमंड का नतीजा है.