28 जनवरी, 1948 की बात है. महात्मा गांधी की शहादत से दो दिन पहले की. महात्मा की सचिव राजकुमारी अमृत कौर ने अचानक उनसे पूछा, ‘आपकी आज की प्रार्थना सभा में भी कोई शोरगुल तो नहीं हुआ?’ उत्तर में महात्मा ने उनसे कहा, ‘नहीं, परंतु इस सवाल का मतलब यह तो नहीं कि तुम मेरे लिए चिंता कर रही हो?’
दरअसल, महात्मा के दिल्ली में रहते हर रोज शाम को बिड़ला हाउस के बगीचे में होने वाली प्रार्थना सभा में उन दिनों उनके जीवन के लिए अंदेशे पैदा करने वाली एक के बाद एक कई घटनाएं हो चुकी थीं और राजकुमारी व महात्मा के प्रश्न व प्रतिप्रश्न उन्हीं के संदर्भ में थे.
लेकिन महात्मा तो महात्मा! राजकुमारी की चिंता को दरकिनार करते हुए अगले ही पल उन्होंने कुछ ऐसी बातें कहीं, जिनके मद्देनजर अब कहा जाता है कि उनको अगली तीस जनवरी को घटित हुए अघटनीय का पूर्वाभास हो चला था.
उनके कहे का लब्बोलुआब यह था:
यदि मैं किसी लंबी बीमारी से मरूं, यहां तक कि एक फोड़े या फुंसी से भी, तो तुम्हारा कर्तव्य होगा कि तुम दुनिया को बताओ कि मैं ईश्वर का वैसा बंदा नहीं था, जैसा होने का दावा करता था. … हां, कोई मुझे गोली मार दे और मैं बिना किसी आह या शिकायत के, अपने होठों पर भगवान का नाम लेते हुए अंतिम सांस लूं, तभी मैं अपने वैसा बंदा होने के अपने दावे को सिद्ध कर पाऊंगा…
अगर मुझे किसी पागल आदमी की गोली से ही मरना है तो (मैं चाहूंगा कि) मेरे दिल में भगवान हों और मुंह पर मुस्कराहट. और तुम मुझे वचन दो कि अगर कहीं ऐसा हुआ तो तुम्हारी आंखों से एक भी आंसू नहीं टपकेगा.
हम जानते हैं कि इसके दो ही दिन बाद उनकी नश्वर काया पर तीन गोलियां दागकर उनकी जान ले ली गई, तो एक भी आंसू न टपकने की उनकी नसीहत के बावजूद उनके बिछोह का दुख इतना दारुण हो गया था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को ऑल इंडिया रेडियो पर आकर देशवासियों से कहना पड़ा था कि ‘द लाइट हैज गान आउट ऑफ अवर लाइव्ज एंड देयर इज डार्कनेस एवरीह्वैर (हमारे जीवन से रौशनी चली गई है और चारों तरफ अंधेरा छा गया है).’
उन्होंने यह भी कहा था कि अब हम सलाह व सांत्वना के लिए उन (महात्मा) के पास नहीं जा पाएंगे, जो न केवल उनके लिए बल्कि देश के करोड़ों लोगों के लिए एक बहुत बड़ा झटका है.
लेकिन हमारी आज की पीढ़ी को शायद ही विश्वास हो कि उस स्थिति में भी देश ने खुद को उतना असहाय अनुभव नहीं किया था, जितना उसे आज करने के षड्यंत्र किए जा रहे हैं.
कारण यह है कि अभूतपूर्व हिंसा के बीच देश के विभाजन और आजादी की पहली बरसी से पहले ही महात्मा के रूप में उस सदी की सबसे बड़ी शख्सियत की हत्या के बावजूद देशवासियों का यह विश्वास काफी हद तक सुरक्षित था कि हत्यारा हमसे महात्मा की देह ही छीन पाया है और उनके द्वारा दी गई सत्य व अहिंसा की शक्तियां हमारे साथ वैसी ही बनी हुई हैं, जैसे उनके इस संसार में रहते हुए थीं.
इसलिए वे हमारे बीच नहीं होंगे तो भी इन शक्तियों (जिनके अमोघ होने का विश्वास अभी भी असंदिग्ध है) की बदौलत हम अपने भविष्य का अभीष्ट रास्ता सफलतापूर्वक तय कर लेंगे, किंचित भी विचलित हुए और मंजिल से जरा-सा भी भटके बगैर.
‘सत्य केवल सच बोलने तक सीमित नहीं’
महात्मा और साथ ही उनके साथ पले-बढ़े स्वतंत्रता संग्राम के दूसरे नायकों के जाने के कुछ दशकों बाद दुनिया भर में फैला पोस्ट ट्रुथ इरा (उत्तर सत्य युग) के आगाज का शोर हमारे देश में पहुंचकर हमारे कानों के पर्दे फाड़ने लगा तो भी ‘सत्यमेव जयते’ का हमारा विश्वास इतना आक्रांत नहीं ही हुआ था कि हम उसकी चिंता में ही घुलते रह जाते. लेकिन आज?
इस प्रश्न के उत्तर तक पहुंचने से पहले महात्मा की सत्य की परिकल्पना को ठीक से समझ लेना चाहिए. उनके निकट सत्य न सिर्फ जीवन का मूल मंत्र और दर्शन बल्कि ईश्वर भी है. उनके ही शब्दों में कहें तो वही ईश्वर है.
सत्य में उनके इस विश्वास का एक दो दिन या वर्ष में अथवा अकस्मात नहीं बल्कि धीरे-धीरे और क्रमिक विकास हुआ था, जिसके तहत उन्होंने अपने शुरुआती जीवन की ‘ईश्वर सत्य है’ की मान्यता को आगे के अनुभवों के आधार पर ‘सत्य ही ईश्वर है’ में बदल दिया था और मानने लगे थे कि ईश्वर को लेकर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन ‘सत्य’ की सत्ता को कोई नहीं नकार सकता.
वह भी नहीं, जो अपने को नास्तिक कहता हो. क्योंकि सत्य केवल सच बोलने तक सीमित नहीं है – उसमें विचार, वाणी और कर्म की शुद्धता भी शामिल है, जो अहिंसा के पालन के बगैर संभव नहीं है. साफ है कि उनके निकट अहिंसा सत्य यानी ईश्वर तक पहुंचने का एकमात्र और अपरिहार्य साधन या कि साधना, दूसरे शब्दों में कहें तो ‘परम धर्म’ थी.
उनके मतानुसार अहिंसा का परम धर्म भी खुद को हिंसा से विरत कर लेने भर से नहीं निभ जाता और कोई उससे जुड़े अपने कर्तव्यों को इतने भर से पूरा हुआ मान लेता है कि उसने स्वयं को हर तरह की हिंसा से विरत कर लिया है, तो ग़लती करता है. यह कर्तव्य तो वास्तव में तब पूरा होता है, जब वह हिंसा न होने देने की अपने हिस्से की जिम्मेदारी भी निभाए.
सवाल है कि क्या हमारी आज की सत्ता या समाज व्यवस्थाएं वैसी स्थितियों के निर्माण के प्रति अपनी जिम्मेदारी को लेकर किंचित भी गंभीर हैं, जिनमें उनके और उनके घटक के रूप में देशवासियों के लिए हिंसा न होने देने और परम सत्य तक पहुंचने की अपनी जिम्मेदारी निभाना दुश्वार न हो?
इसका सीधा-सा जवाब है: नहीं, उल्टे इन व्यवस्थाओं ने इस जिम्मेदारी के निर्वाह की राह दुश्वार करने को ही अपना लक्ष्य बना लिया है.
इसकी परख के लिए व्यतीत में बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है. हाल की कुछ घटनाओं के आईने में देखकर ही इसे समझा जा सकता है:
छत्तीसगढ़ के एक हिंदी बोलने वाले प्रवासी मजदूर को ‘बांग्लादेशी घुसपैठिया’ होने के शक में पीट-पीटकर मार दिया जाता है, जबकि त्रिपुरा के एक आदिवासी छात्र को उत्तराखंड में उसके कथित ‘चीनी लुक’ के कारण. इतना ही नहीं, क्रिसमस समारोहों पर हमला किया जाता है और मुसलमानों को घर पर नमाज पढ़ने तक के ‘अपराध’ के लिए गिरफ्तार कर लिया जाता है.
व्यवस्थाएं पहले तो ऐसी घटनाओं को रोकने को लेकर सर्वथा अनिच्छुक या उदासीन दिखाई देती हैं, फिर उन नागरिकों की राह में कांटे बिछाने पर उतर आती हैं जो इन घटनाओं के विरुद्ध रोष या क्षोभ प्रकट करना चाहते हों.
हाल के वर्षों में यह रिवाज सा बनता गया है कि सत्ता ऐसे हर अवसर पर अपने समर्थकों के समूहों को यत्र-तत्र हत्यारों व अन्य अपराधियों के पक्ष में और अनेक बार तो उनका महिमामंडन करने तक के लिए सक्रिय कर देती हैं. वह भी हाथ की ऐसी सफाई से कि दामन पे कोई छींट न ख़ंजर पे कोई दाग़!
भीड़ की सत्ता
गौर कीजिए कि इस देश के लोकतांत्रिक इतिहास में 1975 में भी नहीं हुआ था, जब एक डरी हुई सरकार ने देश पर इमरजेंसी थोप दी थी, नागरिकों के सारे मौलिक अधिकार छीन लिए थे और जिसके लिए वर्तमान सत्ताएं उसको कोसने में कुछ भी उठा नहीं रखतीं.
लेकिन बकौल नागार्जुन: उस वक्त भी कंकालों की हूकों को चांपकर नभ में विपुल विराट-सी खड़ी शासन की बंदूक के उस हिटलरी गुमान पर लोग थूक रहे थे जिसमें वह कानी हो गई थी. जली ठूंठ पर बैठकर निर्भय कूक गई कोकिला का तो वह बंदूक बाल भी बांका नहीं कर पाई थी.
भले ही बधिरता दस गुनी बढ़ गई थी, विनोबा मूक हो गए थे, सत्य स्वयं घायल हो गया था और अहिंसा चूकी हुई महसूस कर रही थी, तत्कालीन सत्ता नागरिकों के बीच ऐसा कोई ‘समूह’ नहीं पैदा कर पाई थी जो हर मौके पर निर्लज्ज होकर उसकी आक्रामक हिंसा का जयगान करते हुए सत्य व अहिंसा के पैरोकारों को बेशर्मी से आक्रांत करता और सत्यरूपी ईश्वर तक पहुंचने के उनके सारे मार्ग अवरुद्ध कर पूजा पद्धतियों में फर्क के सहारे ईश्वर तक को फसाद की जड़ बताता रहे.
कोई हिम्मत करके विभेदकारी व हिंसक सत्ता से पूछे कि वह उस अहिंसा को, जिसे महात्मा गांधी सत्य (यानी ईश्वर) तक पहुंचने का अपरिहार्य मार्ग बता गए हैं, छोड़कर कुपथ पर क्यों चल पड़ी है, जबकि खुद भी महात्मा को अपनाने के फेर में दिखती है, तो उस सत्ता की आड़ बनकर पूछने वालों के सामने आ खड़ा हो, उनसे उलझनें और हिंसक होकर उन्हें आंखें दिखाने लगे. साथ ही सत्ता के अनुकूलित सत्यों व अर्धसत्यों को ही सत्य बताने पर उतर आए.
लेकिन आज की सत्ताओं ने ऐसी अनेक भीड़ें पैदा करने में सफलता पा ली हैं, जो सिर्फ और सिर्फ उनकी शुभचिंतक, कहना चाहिए, अंध समर्थक हैं – इस सीमा तक कि किसी भी उदात्त, मानवीय या लोकतांत्रिक मूल्य के मानमर्दन से परहेज़ नहीं करतीं.
सत्ताएं ऐसे सारे मूल्यों के बुलडोजरीकरण के रास्ते पर चल पड़ें और दिन-रात अपने अहंकारों व असत्यों को ही सनातन बनाने में लगी रहने लग जाएं तो भी इन भीड़ों को इसमें कुछ भी बुरा या कि काबिल-ए-एतराज नहीं लगता. उनको महज अपने स्वार्थ ही सनातन लगते हैं और उनकी रक्षा के लिए वे किसी भी सत्य के चीरहरण से परहेज़ नहीं करतीं.
ऐसे में क्या आश्चर्य कि जिन सत्य व अहिंसा के बल से महात्मा ने हमारे स्वतंत्रता संग्राम की अगुवाई की, उसे लड़ा व जीता और जिसकी पृष्ठभूमि में देश का संविधान बना और लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना हुई, सत्ताओं द्वारा उनको उनकी धुरी पर सर्वथा विपरीत दिशा में घुमाकर लोकतंत्र व संविधान से दुश्मनी साधी जा रही है.
साथ ही लोकतांत्रिक मूल्यों को विखंडन के कगार तक पहुंचाकर इस भरोसे को भी छिन्न-भिन्न कर दिया जा रहा है कि यह फिसलन कुछ समय के लिए या कि समय का फेर है और एक दिन चीजें फिर पटरी पर आ जाने दी जाएंगी.
दूसरी ओर घृणा से बजबजाती कट्टरताओं की बाढ़ में महात्मा के इस सौजन्य तक के लिए कोने अंतरे में भी जगह नहीं रहने दी जा रही कि उनको सत्य का जब कभी जहां कहीं जिस भी रूप में दर्शन होता था, उसे तत्काल ग्रहण कर अपने आचरण-व्यवहार में शामिल कर लेते थे.
इतना ही नहीं, अपने को सबसे ऊपर मानने वाले सत्ताधीशों को यह समझने से भी परहेज़ है कि महात्मा मानते थे कि उनमें दूसरों की अपेक्षा कोई खास बात नहीं और वे जो कुछ भी कर रहे हैं, वैसा हर कोई कर सकता है. ऐसा कहकर वे प्रत्येक मनुष्य की छिपी शक्तियों को जगा देते थे तथा झूठी प्रतिष्ठा के भ्रम में पड़े लोगों को उनकी मर्यादा का भान करा देते थे. उनके विपरीत आज के सत्ताधीश खुद तो कोई मर्यादा रखते नहीं हैं, दूसरों को भी मर्यादाहीन बनाने के फेर में रहते हैं.
ऐसे में उनसे यह अपेक्षा तो बेकार ही है कि महात्मा द्वारा पोषित जिस हिंदू धर्म का इस्तेमाल कर वे सत्ता की सीढ़ी चढ़े हैं, उसकी बाबत महात्मा द्वारा कही गई इस बात को अपने आचरण में उतारने की सोचेंगे:
यह अभिलाषा तो मुझे बिल्कुल ही नहीं है कि किसी महान धर्म मत की ओट में मैं चुपके-चुपके कोई सुधार या बिगाड़ करूं. यों तो मैंने कई दफा अपने को सनातनी हिंदू कहा है… छुआछूत के प्रश्न की चर्चा करते समय पहले से भी ज्यादा जोर और दावे के साथ… लेकिन अस्पृश्यता सचमुच हिंदू धर्म का अंग हो तो मैं हिंदू धर्म में बना नहीं रह सकता. …मैं देखता हूं कि लोग हिंदू धर्म के नाम पर कितनी ही ऐसी बातें आमतौर पर करते हैं, जिनका मैं कायल नहीं हूं… मैं हिंदू शास्त्र के इस वचन का सोलहों आना कायल हूं कि जिसने अहिंसा, सत्य और ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन नहीं किया, वह वस्तुत: शास्त्रों का मर्म नहीं समझ सकता.
स्वाभाविक ही महात्मा का यह शहादत दिवस सत्य और अहिंसा के लिए कहीं ज्यादा चिंतित होने का वक्त है- नए सिरे से चिंतन करने का.
बकौल रामधारी सिंह ‘दिनकर’: यह समझने का भी कि हमारी क्षण-क्षण की चिंता से, दूर-दूर तक के भविष्य का मनुज जन्म लेता है! इसलिए कि सारे खतरों को सत्य और अहिंसा के नाम कर देने की सत्ताधीशों की कोशिशों की बदगुमानियां लगातार बढ़ती जा रही हैं.
(इस आलेख में दिए गए महात्मा गांधी के उद्धरण गांधीवादी विचारक स्मृतिशेष हरिभाऊ उपाध्याय की 1969 में गांधी जन्मशताब्दी के अवसर पर प्रकाशित कृति ‘बापूकथा (उत्तरार्ध)’ से लिए गए हैं.)
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
