नई दिल्ली: असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा द्वारा ‘मिया मुसलमानों’ – यानी बांग्ला भाषी मुसलमानों – पर की गई विवादास्पद टिप्पणियों के बाद उनके खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज की गई है.
इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस गोविंद माथुर ने भी इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि ‘डर, बहिष्कार या नफ़रत फैलाकर’ शर्मा ‘भारतीय गणराज्य की बुनियाद को कमजोर करने के दोषी हो सकते हैं.’
शांति और न्याय के कार्यकर्ता तथा लेखक हर्ष मंदर ने कहा कि उन्होंने मंगलवार (27 जनवरी) को दिए गए मुख्यमंत्री के सार्वजनिक बयानों के खिलाफ पुलिस शिकायत दर्ज कराई है. मंदर के अनुसार, ये बयान ‘असम में बांग्ला भाषी मुसलमानों के खिलाफ नफरत, उत्पीड़न और भेदभाव को बढ़ावा देते हैं.’
मंदर ने बताया कि उन्होंने भारतीय न्याय संहिता, 2023 की प्रासंगिक धाराओं के तहत त्वरित कार्रवाई और एफआईआर दर्ज करने की मांग की है. इनमें धारा 196 (समूहों के बीच वैमनस्य फैलाना और सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचाने वाले कृत्य), 197 (राष्ट्रीय एकता के प्रतिकूल बयान), 299 (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के उद्देश्य से किए गए दुर्भावनापूर्ण कृत्य), 302 (धार्मिक भावनाओं को आहत करने के इरादे से बोले गए शब्द) और 353 (सार्वजनिक उपद्रव को बढ़ावा देने वाले बयान) शामिल हैं.
उन्होंने यह भी अनुरोध किया है कि उचित जांच की जाए और असम में चल रही विशेष पुनरीक्षण (एसआर) प्रक्रिया के दौरान भविष्य में इस तरह के बयानों को रोकने के लिए तत्काल कदम उठाए जाएं.
मंदर द्वारा जारी प्रेस नोट के अनुसार, यह शिकायत दिल्ली के हौज़ खास थाने में दर्ज कराई गई है. हालांकि, अब तक यह स्पष्ट नहीं है कि शिकायत पर आगे कोई कार्रवाई हुई है या नहीं.
मंदर ने कहा कि मंगलवार को तिनसुकिया जिले के डिगबोई में एक सरकारी कार्यक्रम के दौरान शर्मा ने बांग्ला भाषी मुसलमानों को ‘मिया’ कहकर संबोधित किया और उनके उत्पीड़न, उनके खिलाफ भेदभाव तथा मतदाता सूची से उनके नाम हटाने को प्रोत्साहित करने वाले बयान दिए.
उन्होंने यह भी याद दिलाया कि शर्मा ने स्वीकार किया था कि उन्होंने भाजपा कार्यकर्ताओं को मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान इस समुदाय के लोगों के खिलाफ शिकायतें और आपत्तियां दर्ज करने का निर्देश दिया था.
बता दें कि शर्मा ने इसी हफ्ते मंगलवार को कहा था, ‘कांग्रेस मुझे जितना चाहे गाली दे, मेरा काम मिया लोगों की ज़िंदगी मुश्किल बनाना है.’ उन्होंने लोगों से समुदाय को किसी भी तरह परेशान करने का आह्वान किया. उन्होंने कहा था, ‘रिक्शा में अगर किराया 5 रुपये है, तो उन्हें 4 रुपये दीजिए. जब तक उन्हें परेशानी नहीं होगी, वे असम नहीं छोड़ेंगे… ये कोई मुद्दे नहीं हैं.’
मंदर ने यह भी कहा कि ‘हिमंता बिस्वा शर्मा और भाजपा सीधे तौर पर मिया समुदाय के खिलाफ हैं,’ और लोगों से मिया समुदाय को ‘परेशान करने’ की अपील की. उनका कहना था कि ‘जब तक उन्हें परेशानी नहीं होगी, वे असम नहीं छोड़ेंगे.’
इससे पहले भी शर्मा कह चुके हैं कि उनकी सरकार ‘मियाओं’ को ‘काबू में रखने’ के लिए उन्हें ‘परेशान’ करती रहेगी.
शर्मा ने मतदाता सूची पुनरीक्षण को लेकर किसी भी विवाद से इनकार किया और विपक्ष के उस आरोप को खारिज किया कि फॉर्म-7 (जिसके जरिए कोई मौजूदा मतदाता किसी अन्य व्यक्ति के नाम को सूची में शामिल करने पर आपत्ति कर सकता है या मृत्यु अथवा निवास परिवर्तन के कारण अपना या किसी और का नाम हटाने का अनुरोध कर सकता है) का दुरुपयोग कर राज्य में वास्तविक नागरिकों को परेशान किया जा रहा है.
शर्मा ने विशेष पुनरीक्षण का जोरदार बचाव करते हुए कहा कि नोटिस केवल ‘मिया’ मुसलमानों को दिए जा रहे हैं, न कि राज्य के स्वदेशी समुदायों को.
गोलाघाट, असम में गुरुवार को शर्मा ने अपनी टिप्पणियों का बचाव करते हुए कहा कि जो लोग बांग्लादेश से आए हैं, वे खुद को ‘मिया’ कहते हैं और यह शब्द उन्होंने नहीं गढ़ा है.
चुनाव आयोग 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कर रहा है, लेकिन असम में विशेष पुनरीक्षण (एसआर) किया जा रहा है, जो नियमित अद्यतन जैसा है. शर्मा ने मंगलवार को कहा कि ‘यह (एसआर) तो शुरुआती है. जब असम में एसआईआर होगा, तब चार से पांच लाख मिया वोट असम में हटाने होंगे.’
चुनाव आयोग की ओर से अब तक मुख्यमंत्री के इस बयान पर कोई टिप्पणी नहीं आई है कि वे जानबूझकर आबादी के एक वर्ग को मतदाता सूची से बाहर कर रहे हैं.
नफरत फैलाने वाले मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग का समय आ गया है: सेवानिवृत्त न्यायाधीश
इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस (सेवानिवृत्त) गोविंद माथुर ने एक बयान में कहा कि शर्मा के बयान धर्म के आधार पर नागरिकों को विभाजित करने का प्रयास हैं और भारत के संवैधानिक ढांचे के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं.
उन्होंने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है, अनुच्छेद 15 धर्म के आधार पर भेदभाव पर रोक लगाता है और अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करता है.
पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने कहा, ‘मुख्यमंत्री के रूप में शर्मा ने संविधान की रक्षा की शपथ ली है, और उनके शब्द राज्य की सत्ता का प्रतिनिधित्व करते हैं.’
उन्होंने चेतावनी दी कि डर, बहिष्कार या नफरत को बढ़ावा देने वाली भाषा संवैधानिक नैतिकता को कमजोर करती है और भारतीय गणराज्य की नींव को हिलाती है.
जस्टिस माथुर ने यह भी कहा कि सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों द्वारा की गई सांप्रदायिक टिप्पणियां समाज में पूर्वाग्रह को सामान्य बनाती हैं और नफरत को बढ़ावा देती हैं, जिसका संवैधानिक लोकतंत्र में कोई स्थान नहीं है. उन्होंने कहा कि धर्म के आधार पर नागरिकों को बांटने वाले नेता भारत की बहुलतावादी भावना और संघीय जिम्मेदारी के खिलाफ काम करते हैं.
संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की उपयुक्तता पर सवाल उठाते हुए, जो निष्पक्षता और समानता के सिद्धांतों से हटकर आचरण करता है, जस्टिस माथुर ने कहा, ‘भारत की ताकत एकता, विवेक और कानून के शासन में है, न कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण में.’ उन्होंने कहा कि सांप्रदायिक नफरत फैलाना कानूनन दंडनीय अपराध है और सत्ता में बैठे लोगों से जवाबदेही की मांग करने का समय आ गया है.
जस्टिस माथुर ने अंत में कहा कि ‘ऐसे मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग करने का यह सही समय है, जो सांप्रदायिक नफरत फैलाता है, जो हमारे कानून के तहत अपराध है.’
