नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जुलाई 2025 में की गई घाना यात्रा पर हुए खर्च को लेकर विदेश मंत्रालय मात्र 63 दिनों में अपने ही जवाब से पलट गया है.
पहले विदेश मंत्रालय ने यह कहकर खर्च का ब्योरा देने से इनकार कर दिया था कि प्रधानमंत्री घाना सरकार के ‘राजकीय अतिथि’ थे और इसलिए इस यात्रा से जुड़ा खर्च भारत सरकार ने वहन नहीं किया.
हालांकि, आरटीआई कार्यकर्ता अजय बासुदेव बोस द्वारा दायर अपील के बाद मंत्रालय को अपना रुख बदलना पड़ा. अपीलीय स्तर पर दिए गए जवाब में विदेश मंत्रालय ने स्वीकार किया है कि प्रधानमंत्री की घाना यात्रा पर भारत सरकार की ओर से 4 करोड़ 69 लाख 4 हजार 976 रुपये खर्च किए गए.
पहले इनकार, फिर स्वीकारोक्ति
26 नवंबर, 2025 को विदेश मंत्रालय के प्रोटोकॉल डिवीजन की ओर से दिए गए आरटीआई जवाब में कहा गया था कि प्रधानमंत्री ने घाना की यात्रा वहां की सरकार के अतिथि के रूप में की थी और उनके आवास, स्थानीय परिवहन और आधिकारिक कार्यक्रमों से जुड़ा खर्च मेज़बान देश ने उठाया.
इस जवाब पर सवाल उठाते हुए अजय बासुदेव बोस ने प्रथम अपील दायर की और विदेश मंत्रालय से यह पूछा कि अगर प्रधानमंत्री वास्तव में घाना सरकार के अतिथि थे, तो इसका दस्तावेज़ी प्रमाण उपलब्ध कराया जाए. साथ ही उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब जुलाई 2025 में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए प्रधानमंत्री की ब्राज़ील यात्रा के दौरान भारत सरकार ने करोड़ों रुपये खर्च किए थे, तो घाना यात्रा के मामले में ‘शून्य खर्च’ का दावा कैसे सही हो सकता है.
अपील में बोस ने विदेश मंत्रालय के जनसूचना अधिकारी पर भ्रामक, अधूरी और गलत जानकारी देने का आरोप लगाया और चेतावनी दी कि संतोषजनक जवाब न मिलने की स्थिति में वे केंद्रीय सूचना आयोग का रुख करेंगे.
अपील के बाद बदला जवाब
28 जनवरी 2026 को अपील का निपटारा करते हुए विदेश मंत्रालय ने संशोधित जानकारी दी. इसके तहत स्वीकार किया गया कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में गए आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल, साथ गए अधिकारियों, सुरक्षा व्यवस्था और मीडिया पर कुल 4 करोड़ 69 लाख 4 हजार 976 रुपये खर्च हुए.
हालांकि मंत्रालय की ओर से यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि पहले दिए गए जवाब और बाद में सामने आई जानकारी के बीच यह अंतर क्यों रहा, या शुरुआती पत्र में ‘घाना सरकार द्वारा पूरा खर्च उठाए जाने’ का दावा किस आधार पर किया गया था. बावजूद इसके, अपीलीय प्राधिकारी ने अपने आदेश में केंद्रीय जन सूचना अधिकारी के पहले दिए गए जवाब से सहमति जताई है.
पारदर्शिता पर सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर प्रधानमंत्री की विदेशी यात्राओं पर होने वाले खर्च और उस पर सरकार द्वारा दी जाने वाली जानकारी की पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं. आरटीआई कार्यकर्ता अजय बासुदेव बोस का कहना है कि यदि अपील न की जाती, तो वास्तविक खर्च कभी सामने नहीं आता.
बोस का कहना है कि यह मामला केवल एक यात्रा के खर्च तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि किस तरह आरटीआई के तहत मांगी गई सूचनाओं को पहले टालने या भ्रमित करने की कोशिश की जाती है.
प्रधानमंत्री कार्यालय या विदेश मंत्रालय की ओर से इस पूरे घटनाक्रम पर अभी तक कोई सार्वजनिक सफाई नहीं दी गई है.
पीएम की घाना यात्रा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2-3 जुलाई, 2025 को घाना की राजकीय यात्रा पर अक्रा पहुंचे थे. यह बीते तीन दशकों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की घाना की पहली यात्रा थी, और प्रधानमंत्री मोदी की पहली द्विपक्षीय घाना यात्रा भी थी.
अक्रा हवाई अड्डे पर प्रधानमंत्री का स्वागत स्वयं घाना के राष्ट्रपति जॉन ड्रामानी महामा ने किया और उन्हें औपचारिक राजकीय सम्मान दिया गया.
इस यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने घाना के राष्ट्रपति के साथ द्विपक्षीय वार्ता की, जिसमें भारत-घाना संबंधों की समीक्षा की गई और आर्थिक सहयोग, ऊर्जा, रक्षा तथा विकास साझेदारी को आगे बढ़ाने के तरीकों पर चर्चा हुई. भारत सरकार ने इसे अफ्रीका और ग्लोबल साउथ के साथ भारत की भागीदारी को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया.
सरकार के मुताबिक, यह यात्रा न केवल भारत-घाना द्विपक्षीय संबंधों को नई गति देने वाली थी, बल्कि पश्चिम अफ्रीकी देशों के संगठन ‘इकोनॉमिक कम्युनिटी ऑफ वेस्ट अफ्रीकन स्टेट्स’ (ECOWAS) और अफ्रीकी संघ के साथ भारत के जुड़ाव को भी सुदृढ़ करने के उद्देश्य से की गई थी.
