यूजीसी नियम: भेदभाव की तरफ़ से आंख मूंद लेने से सौहार्द नहीं, कड़वाहट पैदा होती है

सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसी नियमावली पर रोक लगाई है जो उसी के आदेश के कारण बनाई और घोषित की गई थी. लेकिन इसके ख़िलाफ़ जिस तरह ‘सवर्ण’ समुदायों का एक हिस्सा भड़क उठा. संख्या में कम होने पर भी इस समुदाय की ताक़त कितनी अधिक है और वह कितना प्रभावी है, सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश से पता लगता है.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय जनता पार्टी को सवर्णों के कोप और दलित समुदाय और पिछड़ी जातियों के रोष से बचा लिया है. उसने भिन्न-भिन्न प्रकार के भेदभाव के ख़िलाफ़ विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की नई नियमावली के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी है. उसको आशंका है कि कहीं इस तरह के कदम से समाज में विभाजन और गहरा न हो जाए. कहीं पुराने अमेरिका जैसी हालत न हो जाए जहां गोरे और काले अलग-अलग स्कूलों में जाते थे.

सर्वोच्च न्यायालय का यह आदेश आख़िरी नहीं है. उसने ऐसी नियमावली पर रोक लगाई है जो उसी के आदेश के कारण बनाई और घोषित की गई थी. लेकिन इसके ख़िलाफ़ जिस तरह ‘सवर्ण’ समुदायों का एक हिस्सा भड़क उठा, संभवतः उसके दबाव में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्थगन आदेश दिया है. संख्या में कम होने पर भी सवर्ण समुदाय की ताक़त कितनी अधिक है और वह कितना प्रभावी है, सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश से यह भी पता लगता है.

‘ब्रह्मकोप इस जनतंत्र में सबसे विकट कोप है’

अदालत ने जिस नियमावली पर अभी जो रोक लगाई है, उसे समझने के लिए एक कहानी से बात शुरू की जा सकती है. घटना बिल्कुल सच्ची है और लेखक उसका गवाह है. नाम जानबूझकर नहीं दिए गए हैं.

एक विश्वविद्यालय में अध्यापक की नियुक्ति के लिए उम्मीदवारों के इंटरव्यू के बाद चयन समिति के सदस्य उनकी सूची बनाने बैठे जिन्हें वे पद के लिए योग्य मानते थे. हम दो विशेषज्ञों की सूची में जिस उम्मीदवार का नाम सबसे ऊपर था, उसके उल्लेख से ही समिति के तीसरे सदस्य हत्थे से उखड़ गए. वे किसी भी क़ीमत पर उस नाम के नीचे अपना दस्तख़त नहीं कर सकते थे. कारण यह था कि इंटरव्यू के दौरान उस उम्मीदवार ने ब्राह्मणवाद की आलोचनात्मक तरीक़े से चर्चा की थी.

विशेषज्ञ महोदय का कहना था कि यह अध्यापक होने योग्य नहीं क्योंकि अगर वह इंटरव्यू में ऐसी बात कर सकता है तो अपनी कक्षा में तो विष वमन ही करेगा. हम उन्हें समझाते रहे कि ब्राह्मणवाद एक विचारधारा है और वह किसी भी जाति समुदाय के लोगों में पाई जा सकती है. इसके विरोध का मतलब हर उस व्यक्ति का विरोध नहीं जो खुद को ब्राह्मण कहता है या ब्राह्मण समुदाय में पैदा हुआ है. लेकिन वे किसी भी तरह मानने को तैयार नहीं थे. आम सहमति के चक्कर में नतीजा क्या रहा होगा, आप अनुमान कर सकते हैं.

मैंने आख़िर में उन्हें कहा कि साबित हो गया कि इस कलियुग में भी ब्रह्मकोप से कोई बचाव नहीं है. अदालत ने भी यही साबित किया है. ब्रह्मकोप इस जनतंत्र में सबसे विकट कोप है.

यह संयोग था कि इंटरव्यू बोर्ड में तीनों विशेषज्ञ ब्राह्मण थे. उनमें से एक ने ब्राह्मणवाद के लिए दंड उठाया. लेकिन सज़ा किसे मिली? क्या इसे भेदभाव का एक उदाहरण मान सकते हैं? या क्या इसे जातिगत भेदभाव का नहीं, विचार के भेद का मामला समझें?

शिक्षा संस्थानों की सच्चाई

पिछले कुछ वर्षों से चयन समितियों में अब हर समुदाय के पर्यवेक्षक बैठने लगे हैं इसलिए इसकी संभावना कम हो गई है कि चयन में भेदभाव जाति के आधार पर किया जा सके. लेकिन इन पर्यवेक्षकों की आवश्यकता ही क्यों पड़ी?

क्या इसका कारण यह नहीं कि आज़ादी के 78 साल बाद भी अधिकतर समितियों में उच्च जाति के लोग ही ज़्यादा होते हैं? और यह भी उनमें अगर विरोध नहीं तो अनुसूचित जाति, जनजाति या पिछड़े समुदायों के बारे में एक सामान्य पूर्वाग्रह होता ही है? इसलिए ही ‘सामान्य श्रेणी’ के विशेषज्ञों पर निगरानी की ज़रूरत पड़ती है. क्या यह उनके लिए अपमानजनक नहीं है? इसके ख़िलाफ़ कभी ‘उच्च जातियों ‘ के लोगों ने आवाज़ क्यों नहीं उठाई और क्यों उन्होंने इन समितियों का बहिष्कार नहीं किया?

वे कह सकते थे कि जहां हमारे विवेक और ईमानदारी पर भरोसा नहीं वहां हम नहीं जाएंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ है. वे भी इस व्यवस्था का तर्क समझते हैं. जाति के आधार पर भेदभाव हमारे समाज के स्वभाव में है. वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से काम करता रहता है. इसलिए उसका निराकरण आवश्यक है क्योंकि इसका नुक़सान अनुसूचित जाति और जनजाति समुदायों के लोगों को तो होता ही है, साथ ही यह समानता के विचार के विरुद्ध होने के कारण जनतंत्र कि भी कमजोर करता है.

हमारे शिक्षा संस्थानों की सच्चाई आज भी यही है कि वहां उच्च शैक्षणिक और प्रशासनिक पदों पर ‘उच्च जातियों’ के लोग ही हैं. इस वजह से कुछ जातीय पूर्वाग्रह बिना मुखर हुए काम करते रहते हैं. इनमें एक पूर्वाग्रह ‘सामान्य श्रेणी’ के बारे में है.

आज भी बार-बार समझाना पड़ता है कि सामान्य श्रेणी का मतलब उच्च जाति की श्रेणी नहीं है बल्कि एक तय सीमा के ऊपर अंक या ग्रेड लाने वाले सभी इस श्रेणी में जगह के हक़दार हैं. प्रायः देखा गया है कि अनुसूचित जाति,जनजाति या पिछड़ी जाति समूहों के अभ्यर्थियों को समान या अधिक अंक आने पर भी आरक्षित श्रेणियों में डालने की कोशिश की जाती है. इसे क्या कहेंगे? यह भेदभाव है या नहीं?

‘सामान्य श्रेणी’ या ‘उच्च जाति’

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फ़ैसले से ‘उच्च’ जातियों के क्रोध पर पानी डाला है. इन जातियों के लोगों का कहना है कि इस नियमावली की आड़ में ’उच्च जातियों’ के विद्यार्थियों या अध्यापकों या प्रशासकों को निशाना बनाया जा सकता है. ‘उच्च जातियों’ के लोग सड़क पर उतर आए .

दिलचस्प यह है कि ‘उच्च जातियों’ के लोग ख़ुद को ‘सामान्य श्रेणी’ कहकर बुला रहे हैं. यह क़ानूनी रूप से इसलिए ग़लत है कि ‘सामान्य श्रेणी’ में हर जाति-समुदाय के लोग शामिल हो सकते हैं, वह सिर्फ़ ‘उच्च जाति’ की श्रेणी नहीं है. अपना असली नाम, यानी ‘उच्च जाति’ छिपाकर खुद को सामान्य श्रेणी कहने से ही मालूम हो जाता है कि सच कुछ ऐसा है जिससे ‘उच्च जातियों’ के लोगों को झेंप का अनुभव हो रहा है.

जो पारंपरिक रूप से विशेषाधिकार का उपभोग करता आया है, वह तो खुद को सामान्य कहना चाहता है और जो अधिकारों से वंचित रहे हैं और अब उन पर दावा पेश कर रहे हैं, उन्हें ‘विशेष’ कहना चाहता है. वंचित समुदायों को ही वह विशेषाधिकार प्राप्त ठहरा रहा है.

इस भाषाई बेईमानी को अगर हम नज़रअंदाज़ कर भी दें तो भी यह समझना मुश्किल है कि ‘उच्च जातियों’ का कोप किस बात पर फूट पड़ा है.

न नियम नए, न ही भेदभाव

परिसरों में भेदभाव समाप्त करने और समानता स्थापित करने के मक़सद से जो नियमावली यूजीसी ने घोषित की है, वह इस तरह की कोई बिल्कुल नई नियमावली नहीं है. 2012 में इसी उद्देश्य को हासिल करने के लिए यूजीसी ने एक नियमावली बनाई थी. नई नियमावली उसी का संशोधित रूप है. और अगर वे लोग इसे ध्यान से पढ़ें और दोनों में तुलना करें तो मालूम होगा कि नई नियमावली 2012 वाली नियमावली से कई मामलों में कमजोर है.

दूसरी बात यह कि नई नियमावली में संभावित रूप से भेदभाव से पीड़ित हो सकने वाले समूहों में ‘उच्च जातियों’ के लोग भी शामिल हैं. जिन श्रेणियों को असमान व्यवहार का सामना करना पड़ता या पड़ सकता है, उनमें विकलांग, औरतें, आर्थिक रूप से कमजोर समुदायों के लोग शामिल हैं. कहने की ज़रूरत नहीं कि इन श्रेणियों में ‘उच्च जाति’ के लोग भी शामिल होंगे. बल्कि, आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की श्रेणी तो पूरी तरह उच्च जातियों की ही है.

नियमावली के अनुसार, इन सारी श्रेणियों के लोगों को अगर किसी भी प्रकार असमान व्यवहार का अनुभव हो और उनकी अवस्था के कारण अगर उनके साथ भेदभाव हो रहा हो तो वे शिकायत कर सकते हैं और उस पर कार्रवाई की जानी होगी. इससे स्पष्ट हो जाता है कि इस नियमावली में उच्च जाति समूहों के ख़िलाफ़ पक्षपात नहीं है. अलग-अलग प्रकार के भेदभाव को पहचानकर उसका निराकरण करने के मक़सद से यह नियमावली बनाई गई है.

मेरे सहकर्मी राजनीतिशास्त्री डॉक्टर सुकुमार ने ध्यान दिलाया कि इस सूची में वे सारे समूह शामिल हैं जिन्हें ‘कोटावाले’ कहा जाता है. धर्म और क्षेत्र के आधार पर आरक्षण कम जगहों पर है. लेकिन बाक़ी सारे ‘कोटावाले’ ही हैं: विकलांग, आर्थिक रूप से कमजोर, अन्य पिछड़ा समुदाय,अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति. इनके अलावा समाज में जेंडर, यौन रुझान क्षेत्र, और धर्म के आधार पर भेदभाव होता रहा है, इसलिए परिसर में भी उसकी संभावना या आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता.

हम गौर करें कि इन श्रेणियों में भी ‘उच्च जाति’ के लोग शामिल हैं. यानी अगर किसी ‘उच्च जाति’ वाले को बिहारी कहकर उसके साथ भेदभाव किया जाता है तो वह भी पीड़ित है और उसकी शिकायत भी सुनी जाएगी. उत्तर पूर्वी राज्यों के लोगों को दिल्ली या बेंगलुरु में भेदभाव का सामना करना पड़ता है. उसी तरह मैंने बिहारियों से भी सुना है कि केरल जैसे राज्य में परिसर में उन्हें भेदभाव का अहसास होता है. इसके रूप सूक्ष्म हो सकते हैं.

या तो हम मान लें कि किसी भी प्रकार का भेदभाव शिक्षा संस्थानों में होता ही नहीं है, या अगर हम भेदभाव के तथ्य को स्वीकार करते हैं तो हमें उसके निराकारण का उपाय निकालना होगा. भेदभाव के अहसास के साथ शिक्षा का कारोबार चल नहीं सकता. वह मानसिक यंत्रणा का कारण है और वह विद्यार्थी या अध्यापक को कमजोर कर देता है. अपमान और हीनता के बोध के साथ शिक्षा में टिके रहना कठिन है. आत्महत्या इस अपमान की चरम प्रतिक्रिया है. क्या इसकी इजाज़त दे जा सकती है?

हर तरह के भेदभाव में जातिगत भेदभाव सबसे अधिक पाया जाता है और यह अखिल भारतीय समस्या है. जाहिरा तौर पर यह भेदभाव वे ही कर सकते हैं जो जातियों की दर्ज़ाबंदी में ऊपर के दर्जे में हैं. कोई दलित किसी ‘सवर्ण’ के साथ भेदभाव करने की स्थिति में शायद ही हो. उसके लिए मात्र उसका संस्था में ऊपरी स्तर पर होना काफी नहीं. इसलिए ख़ुद को सवर्ण कहने वालों की यह दलील की उनके साथ भी जाति आधारित भेदभाव हो सकता है, उस हर व्यक्ति को हास्यास्पद लगेगी जो इस समाज को जानता है.

दूसरे, ‘उच्च जातियों’ के लोग यह आरोप लगा रहे हैं कि यह नियमावली उन्हें स्वभावत: अपराधी मान रही है. यह निष्कर्ष इस नियमावली के किस अंश से निकाला जा सकता है?

विकलांगता, जेंडर, क्षेत्र, धर्म, नस्ल,जाति: किसी के कारण अगर किसी को भेदभाव का अनुभव होता है तो उसे शिकायत करने का अधिकार है. वह शिकायत तुरत सुनी जानी चाहिए और उस पर बिना देर किए कार्रवाई की जानी चाहिए. कार्रवाई का मतलब जांच है और इसमें दोनों पक्षों को अपनी बात रखने और सबूत देने का पूरा अवसर मिलेगा. शिकायत सुनने वाली समिति के निर्णय से ऐतराज को लोकपाल के पास भेजा जाएगा.

इस नियमावली पर अभी जिस तरह एक सामाजिक समुदाय भड़क उठा है मानो यूजीसी ने कोई अनहोनी कर डाली है, उससे यही मालूम होता है कि इस समुदाय को 2102 की नियमावली का पता ही न था. यह भी कि दरअसल, 2012 की भेदभाव विरोधी नियमावली के लागू होने के बाद उसके कारण कोई प्रभावी कार्रवाई भी हुई हो, इसकी भी खबर नहीं है. क्योंकि अगर उसके कारण कोई दंडात्मक कार्रवाई हुई होती तो यह नामुमकिन था कि उस पर कोई चर्चा ही न होती या हंगामा न हुआ होता.

2012 की नियमावली के बाद भी उच्च शिक्षा संस्थानों में जातीय स्थिति के कारण अपमान या उत्पीड़न के अहसास के कारण विद्यार्थियों ने आत्महत्या तक की है. उसकी पीड़ा ‘उच्च जाति’ के समुदायों में क्यों नहीं है? ऐसा क्यों हुआ कि रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद उच्च जाति समुदाय के सारे प्रभावी तबके साबित करने में जुट गए कि रोहित दलित थे ही नहीं और उनकी मां झूठ बोल रही हैं?

समाजशास्त्री सतीश देशपांडे ने लिखा कि 2026 की नियमावली पहली बार शिक्षा में भेदभाव के तथ्य को स्थापित करती है. थोड़ा सुधार करके कहा जा सकता है कि शिक्षा में भेदभाव का तथ्य 2012 में पहली बार दर्ज किया गया. 2012 की नियमावली ने भेदभाव के रूप की तो अधिक सटीक पहचान की लेकिन उसका निराकरण करने का कारगर तंत्र नहीं बना सकी. 2026 की नियमावली इस दिशा में आगे बढ़ी हालांकि उसने भेदभाव के रूपों को ठीक-ठीक परिभाषित नहीं किया.

जैसे 2012 की नियमावली भेदभाव को दूर करने में कुछ नहीं कर सकी, वैसे ही 2026 की नियमावली को निष्प्रभावी बनाए रखने की पर्याप्त क्षमता हमारे शिक्षा तंत्र में है. वह इसलिए कि उसका नेतृत्व अभी भी ‘उच्च जाति’ का है जो सामाजिक भेदभाव के तथ्य को स्वीकार करने से इनकार करता है.

यही नेतृत्व पिछले 11 वर्ष से प्रयास कर रहा है कि पाठ्यक्रमों से जाति या भेदभाव के उल्लेख को ही हटा दिया जाए. उसका तर्क यह है कि जाति के उल्लेख से समाज में विभाजन पैदा होता है जबकि शिक्षा का उद्देश्य सौहार्द क़ायम करना है. जब विभाजन मौजूद हो, भेदभाव हो रहा तो उसकी तरफ़ से आंख मूंद लेने से सौहार्द नहीं, कड़वाहट पैदा होती है.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)